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मानव जीवन के लिए पक्षियों का अस्तित्व क्यों अनिवार्य है

-5 जनवरी राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर विशेष-

पक्षियों का मानव सभ्यता और प्रकृति के साथ संबंध अत्यंत गहरा, पुराना और बहुआयामी रहा है। वे केवल आकाश में उड़ते सुंदर जीव भर नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के सबसे संवेदनशील संकेतक भी हैं। किसी क्षेत्र में पक्षियों की संख्या, विविधता और व्यवहार यह बताने के लिए पर्याप्त होते हैं कि वहां का पर्यावरण कितना स्वस्थ है। यही कारण है कि पक्षियों को पर्यावरणीय स्वास्थ्य का बैरोमीटर कहा जाता है। आज जब अवैध पालतू व्यापार, बीमारियां, जलवायु परिवर्तन और आवास के तेज़ी से नष्ट होने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं, तब पक्षियों की सुरक्षा और उनकी आवश्यकताओं के प्रति जागरूकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

पक्षियों ने सदैव मानव मन को आकर्षित किया है। उनके उड़ान भरने का दृश्य, झुंड में आकाश को चीरते हुए आगे बढ़ना या किसी पेड़ की डाल पर बैठकर मधुर कलरव करना, ये सब अनुभव मनुष्य को प्रकृति से जोड़ते हैं। तोते, कबूतर, गौरैया या मैना जैसे पक्षी कभी हमारे दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करते थे। दुर्भाग्य से आज शहरों और कस्बों में इनकी उपस्थिति लगातार कम होती जा रही है। पेड़ों की कटाई, कंक्रीट के जंगलों का विस्तार और प्राकृतिक जल स्रोतों का समाप्त होना इसके प्रमुख कारण हैं। इसके अतिरिक्त अवैध पालतू व्यापार ने भी अनेक प्रजातियों को संकट के कगार पर पहुंचा दिया है।

वैज्ञानिक दृष्टि से पक्षियों का महत्व और भी गहरा है। पक्षियों को अक्सर अतीत की जीवित कड़ियां कहा जाता है क्योंकि उनका विकास सीधे डायनासोर काल से जुड़ा हुआ माना जाता है। वे पारिस्थितिकी तंत्र में कीस्टोन प्रजातियों की भूमिका निभाते हैं। इसका अर्थ यह है कि उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति पूरे तंत्र को प्रभावित करती है। उदाहरण के तौर पर कठफोड़वा द्वारा पेड़ों में बनाए गए छेद केवल उसी पक्षी के लिए नहीं होते, बल्कि बाद में अनेक छोटे पक्षी, स्तनधारी और कीट उन्हीं छिद्रों को आश्रय के रूप में उपयोग करते हैं। यदि कठफोड़वा के लिए उपयुक्त पेड़ या भोजन का स्रोत समाप्त हो जाता है, तो उससे जुड़ा पूरा जीवन चक्र प्रभावित होता है।

राष्ट्रीय पक्षी दिवस हर वर्ष 5 जनवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत वर्ष 2002 में बोर्न फ्री यूएसए और एवियन वेलफेयर संगठनों के प्रयासों से हुई थी। प्रारंभ में यह दिवस सीमित दायरे में मनाया जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी प्रासंगिकता वैश्विक स्तर पर स्वीकार की गई। वर्ष 2023 के बाद से यह केवल किसी एक देश तक सीमित न रहकर कई देशों में मनाया जाने लगा है। आज लगभग पूरे विश्व में 5 जनवरी को राष्ट्रीय पक्षी दिवस के रूप में मनाया जाता है। भले ही यह दिवस अपेक्षाकृत नया हो, लेकिन पक्षियों को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वे दशकों से चली आ रही हैं।

दुनिया में लगभग 9,800 से अधिक पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से अनेक प्रजातियां पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं और सैकड़ों विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। आंकड़ों के अनुसार करीब 10,000 ज्ञात पक्षी प्रजातियों में से 1,480 से अधिक प्रजातियां गंभीर खतरे में हैं, जबकि लगभग 223 प्रजातियां अत्यंत संकटग्रस्त श्रेणी में आती हैं। यह स्थिति केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। शहरी क्षेत्रों में भी पक्षियों की संख्या में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है। गौरैया जैसे कभी सर्वसुलभ पक्षी आज दुर्लभ होते जा रहे हैं।

पक्षियों की घटती संख्या के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। जलवायु परिवर्तन ने उनके प्रवासन पैटर्न को प्रभावित किया है। आवास का विनाश, बढ़ती कृषि भूमि, वाणिज्यिक गतिविधियां, औद्योगिक और वायु प्रदूषण, जल स्रोतों की कमी तथा रसायन और कीटनाशक आधारित खेती ने उनके जीवन को असुरक्षित बना दिया है। इसके साथ ही अवैध शिकार और अवैध व्यापार ने स्थिति को और गंभीर कर दिया है। पक्षी न केवल कीट नियंत्रण में सहायक होते हैं, बल्कि वे परागण और बीज प्रसार के भी प्रमुख वाहक हैं। यदि वनों की कटाई इसी गति से जारी रही, तो प्राकृतिक बीज वितरण प्रणाली बाधित हो जाएगी, जिसका सीधा प्रभाव हमारे खाद्य तंत्र पर पड़ेगा।

मांसाहारी पक्षियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों और कृंतकों को नियंत्रित करते हैं। यदि ये पक्षी समाप्त हो गए, तो कीटों की संख्या अनियंत्रित हो जाएगी, जिससे न केवल खेतों की फसलें नष्ट होंगी, बल्कि भंडारण गृह भी सुरक्षित नहीं रहेंगे। इसका सीधा असर मानव खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। भारत में हाल के एक अध्ययन में यह पाया गया है कि गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट के कारण रेबीज के मामलों में वृद्धि हुई है। गिद्ध जैसे पक्षी प्रकृति के सफाईकर्मी होते हैं। वे मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर वातावरण को स्वच्छ रखते हैं और प्लेग, डेंगू, मलेरिया तथा हैजा जैसी बीमारियों के फैलाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी पक्षियों का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। साहित्य, लोकगीत, कहावतों और धार्मिक प्रतीकों में पक्षियों की उपस्थिति सर्वत्र दिखाई देती है। वे प्रेम, स्वतंत्रता, आशा और महत्वाकांक्षा के प्रतीक रहे हैं। उड़ान केवल ऊंचाइयों को छूने का रूपक नहीं है, बल्कि यह यह भी याद दिलाती है कि हर उड़ान के बाद धरती पर लौटना अनिवार्य है। पक्षी हमें हमारे स्थान, हमारी सीमाओं और हमारी जिम्मेदारियों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।

आज भी स्थिति पूरी तरह हाथ से नहीं निकली है। यदि हम समय रहते जागरूक हों, छोटे लेकिन ठोस कदम उठाएं और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की भावना को अपनाएं, तो पक्षियों का संसार बचाया जा सकता है। अपने आसपास पेड़ लगाना, जल स्रोतों को संरक्षित करना, रसायन मुक्त खेती को बढ़ावा देना और अवैध व्यापार के विरुद्ध सख्त कदम उठाना इस दिशा में आवश्यक प्रयास हैं। यह केवल पक्षियों की रक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का भी प्रश्न है।

यदि हम अब भी नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब आकाश सूना हो जाएगा। पक्षियों का मधुर कलरव इतिहास की स्मृति बनकर रह जाएगा और हमारा वातावरण निर्जीव तथा नीरस हो जाएगा। इसलिए राष्ट्रीय पक्षी दिवस केवल एक औपचारिक तिथि नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि पक्षियों की रक्षा करना वास्तव में मानवता और प्रकृति दोनों की रक्षा करना है।

चल, उड़ जा रे पंछी कि अब ये देस हुआ बेगाना चल, उड़ जा रे पंछी…
ख़त्म हुए दिन उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था, 
सदा रहा है इस दुनिया में किसका आब-ओ-दाना? 
तूने तिनका-तिनका चुनकर नगरी एक बसाई
 बारिश में तेरी भीगी पांखे, 
धूप में गर्मी खाई ग़म ना कर… 
जो तेरी मेहनत तेरे काम ना आई
अच्छा है कुछ ले जाने से, 
दे कर ही कुछ जाना चल,
 उड़ जा रे पंछी कि अब ये देस हुआ बेगाना चल, उड़ जा रे पंछी…! 

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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