NEW English Version

विश्व में हिन्दी की बढ़ती साखः भारत में उपेक्षा क्यों?

विश्व हिंदी दिवस- 10 जनवरी 2026

हर वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाने वाला विश्व हिंदी दिवस केवल एक औपचारिक या प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हिंदी भाषा की वैश्विक यात्रा, उसकी बढ़ती प्रतिष्ठा, उसके सामने उपस्थित चुनौतियों और हमारे अपने राष्ट्रीय आचरण की विडंबनाओं पर गहन चिंतन का अवसर है। यह दिन हमें उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति कराता है जब पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी बोली गई थी और भारत की सांस्कृतिक आत्मा ने विश्व मंच पर अपनी मौलिक पहचान दर्ज कराई थी। आज स्थिति यह है कि हिंदी विश्व में सम्मान, स्वीकार्यता और लोकप्रियता की नई ऊँचाइयों को छू रही है, लेकिन अपने ही देश में वह अपेक्षा, उपेक्षा और संकोच के बीच झूलती दिखाई देती है।

विश्व में हिन्दी की बढ़ती साखः भारत में उपेक्षा क्यों?

यही विरोधाभास विश्व हिंदी दिवस को और अधिक प्रासंगिक बना देता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य दुनियाभर में फैले हिंदी जानकारों, हिन्दीभाषियों को एकजुट करना, हिन्दी को विश्व स्तर पर स्थापित एवं प्रोत्साहित करना और हिंदी की आवश्यकता से अवगत कराना है। अंग्रेजी भाषा भले ही दुनियाभर के कई देशों में बोली है और लिखी जाती है लेकिन हिंदी हृदय की भाषा है। विश्व हिन्दी दिवस विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये जागरूकता पैदा करने तथा हिन्दी को अन्तरराष्ट्रीय भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का प्रभावी उपक्रम है।

हिंदी मात्र संवाद की भाषा नहीं है, वह भारतीय सभ्यता, संस्कृति, संवेदना और सामूहिक चेतना की वाहक है। यह लोक से उपजी, लोक में पली और लोक के लिए ही जीने वाली भाषा है। हिंदी का सबसे बड़ा गुण उसकी सहजता, सरलता और वैज्ञानिक संरचना है। यह ध्वन्यात्मक भाषा है, जिसमें जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोला जाता है, जिससे इसे सीखना और अपनाना अपेक्षाकृत सरल हो जाता है। यही कारण है कि जिन देशों में भारतीय प्रवासी बसे हैं, वहां हिंदी ने सहज ही अपनी जड़ें जमा ली हैं। एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक हिंदी आज केवल भारतीयों की भाषा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद की भाषा बनती जा रही है। योग, आयुर्वेद, भारतीय दर्शन, बॉलीवुड, भक्ति साहित्य और डिजिटल माध्यमों ने हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह दुनिया की तीसरी या चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, अंग्रेजी और मंदारिन चीनी के बाद, और भारत के साथ-साथ नेपाल, मॉरीशस, फिजी जैसे देशों में भी इसका व्यापक उपयोग है और यह विश्व स्तर पर लोकप्रिय हो रही है।

विश्व में लगभग साठ-सत्तर करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते, समझते या किसी न किसी रूप में उससे जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी की उपस्थिति निरंतर बढ़ रही है। विश्व हिंदी सम्मेलन, जिसकी शुरुआत 1975 में नागपुर में हुई थी, आज एक वैश्विक वैचारिक आंदोलन का रूप ले चुका है। इन सम्मेलनों ने यह सिद्ध किया है कि हिंदी केवल भावनाओं या साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि विचार, विज्ञान, कूटनीति और वैश्विक संवाद की भी सक्षम भाषा है। हिंदी को वैश्विक मंच पर आत्मसम्मान और स्वाभिमान के साथ प्रस्तुत करने का श्रेय यदि किसी भारतीय नेता को जाता है, तो वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हैं। 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया गया उनका भाषण केवल भाषण नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक उद्घोषणा थी। अटल बिहारी वाजपेयी ने यह सिद्ध कर दिया कि हिंदी में भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, शांति, निरस्त्रीकरण और मानवता जैसे गहन विषयों पर प्रभावी संवाद संभव है। उनके लिए हिंदी भावुक आग्रह नहीं, बल्कि राष्ट्रबोध की सशक्त अभिव्यक्ति थी। उन्होंने हिंदी को सत्ता की भाषा बनाने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उसे संवाद और आत्मगौरव की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में हिंदी की यात्रा कुछ हद तक धीमी अवश्य हुई, विशेष रूप से शासन और उच्च प्रशासनिक स्तर पर। अंग्रेज़ी को आधुनिकता, सफलता और वैश्विकता का प्रतीक मान लिया गया, जबकि हिंदी को प्रायः भावनात्मक या घरेलू दायरे में सीमित कर दिया गया। शिक्षा, न्यायपालिका, कॉर्पाेरेट जगत और उच्च प्रशासन में हिंदी अपेक्षित स्थान नहीं बना सकी। हालांकि हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा ने इस दौर में भी अपनी सृजनात्मक ऊर्जा बनाए रखी, लेकिन नीतिगत स्तर पर हिंदी को वह प्राथमिकता नहीं मिल पाई जिसकी वह हकदार थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हिंदी ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ उपस्थिति दर्ज कराई है।

वे विश्व के किसी भी मंच पर हिंदी में बोलने से संकोच नहीं करते। संयुक्त राष्ट्र महासभा, जी-20 सम्मेलन, शंघाई सहयोग संगठन या प्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम, हर जगह उनकी हिंदी यह संदेश देती है कि अपनी भाषा में बोलना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल का परिचायक है। नरेंद्र मोदी ने हिंदी को अनुवाद की बैसाखी के सहारे नहीं, बल्कि उसकी मौलिक शक्ति के साथ प्रस्तुत किया। डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया जैसे अभियानों में हिंदी को केंद्र में रखा गया, जिससे आम नागरिक का शासन से संवाद अधिक सुलभ और प्रभावी हुआ। सरकारी योजनाओं, मोबाइल ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी की बढ़ती उपस्थिति ने यह सिद्ध किया कि तकनीक और हिंदी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।

इसके बावजूद यह एक कटु सत्य है कि हिंदी आज विश्व में जितनी प्रतिष्ठित हो रही है, उतनी ही अपने ही देश में उपेक्षित होती जा रही है। अंग्रेज़ी को सामाजिक प्रतिष्ठा और बौद्धिक श्रेष्ठता का पैमाना बना दिया गया है। माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाकर गर्व महसूस करते हैं, जबकि हिंदी माध्यम को हीन दृष्टि से देखा जाता है। यह समस्या भाषा की नहीं, मानसिकता की है। यह मानसिक गुलामी है, जो हमें अपनी ही भाषा से दूर करती जा रही है। राजनीतिक दल हिंदी की बात तो करते हैं, लेकिन उसे शिक्षा, न्याय और प्रशासन की मुख्यधारा में स्थापित करने के लिए ठोस इच्छाशक्ति का अभाव दिखाई देता है। हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा भी है, यह तथ्य अक्सर उपेक्षित रह जाता है। इसकी वर्णमाला उच्चारण विज्ञान पर आधारित है। इसमें नए शब्द गढ़ने और विदेशी शब्दों को आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता है। संस्कृत से जुड़ी होने के कारण यह तकनीकी, दार्शनिक और वैज्ञानिक शब्दावली के निर्माण में पूरी तरह सक्षम है। हिंदी में भावनाओं की अभिव्यक्ति जितनी सहज है, उतनी ही तार्किक और बौद्धिक विमर्श की भी क्षमता है। यही कारण है कि हिंदी जनभाषा होते हुए भी वैश्विक संवाद की भाषा बनने की पूरी क्षमता रखती है।

सच्चाई तो यह है कि देश में हिंदी अपने उचित सम्मान को लेकर जूझ रही है। राजनीति की दूषित एवं संकीर्ण सोच का परिणाम है कि हिन्दी को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह स्थान एवं सम्मान आजादी के अमृत महोत्सव मना चुके राष्ट्र में अंग्रेजी को मिल रहा है। अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं की सहायता जरूर ली जाए लेकिन तकनीकी एवं कानून की पढ़ाई एवं राजकाज की भाषा के माध्यम के तौर पर अंग्रेजी को प्रतिबंधित या नियंत्रित किया जाना चाहिए। आज भी भारतीय न्यायालयों में अंग्रेजी में ही कामकाज होना राष्ट्रीयता को कमजोर कर रहा है। हिन्दी के बहुआयामी एवं बहुतायत उपयोग में ही राष्ट्रीयता की मजबूती है, जीवन है, प्रगति है और शक्ति है किन्तु इसकी उपेक्षा में विनाश है, अगति है और स्खलन है। एथनोलॉग के वर्ल्ड लैंग्वेज डेटाबेस के 22वें संस्करण में बताया गया है कि दुनियाभर की 20 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में 6 भारतीय भाषाएं हैं, इनमें हिंदी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन गयी है। हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन यह भविष्य तभी साकार होगा जब हम स्वयं अपनी भाषा पर विश्वास करेंगे। विश्व हिंदी दिवस इसी संकल्प का दिन है कि हिंदी को विश्व में प्रतिष्ठित करने के साथ-साथ अपने ही घर में उसका सम्मान और अधिकार लौटाया जाए, क्योंकि जब भाषा सशक्त होती है, तब राष्ट्र की आत्मा भी सशक्त होती है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »