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चुंबकीय क्षेत्र कैसे तय करते हैं तारों का जन्म: एल328 आणविक बादल पर भारतीय खगोलविदों का महत्वपूर्ण अध्ययन

तारों की उत्पत्ति को लेकर खगोल विज्ञान में लंबे समय से यह प्रश्न बना हुआ है कि गुरुत्वाकर्षण के साथ-साथ अन्य कौन से कारक नवजात तारों के निर्माण की दिशा और गति को नियंत्रित करते हैं। अब भारत के खगोलविदों द्वारा किए गए एक विस्तृत अध्ययन से यह स्पष्ट संकेत मिला है कि चुंबकीय क्षेत्र इस प्रक्रिया में केवल सहायक ही नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाते हैं। लगभग सात सौ प्रकाश वर्ष दूर स्थित एल328 आणविक बादल के सूक्ष्म अध्ययन से यह सामने आया है कि विभिन्न पैमानों पर चुंबकीय क्षेत्र आश्चर्यजनक रूप से सुसंगत बने रहते हैं और तारा निर्माण की पूरी प्रक्रिया को दिशा देते हैं।

चुंबकीय क्षेत्र कैसे तय करते हैं तारों का जन्म: एल328 आणविक बादल पर भारतीय खगोलविदों का महत्वपूर्ण अध्ययन
एल328 में मैप किए गए चुंबकीय क्षेत्र: (ए) निरंतर छवि पर व्यापक पैमाने पर क्षेत्र सदिश (विस्थापन या बल), (बी) आणविक बादल पैमाने पर क्षेत्र सदिश, (सी) आवरण पैमाने पर क्षेत्र सदिश (विभिन्न रंगों में विभिन्न एनआईआर बैंड), (डी) केंद्रीय कोर में क्षेत्र सदिश

आणविक बादल और तारा निर्माण की जटिल भौतिकी

तारों की जन्मस्थली माने जाने वाले आणविक बादल अत्यंत ठंडे और सघन होते हैं। इनका तापमान सामान्यतः 40 केल्विन से भी कम होता है, जो तरल नाइट्रोजन से कम है, जबकि घनत्व 10³ से 10⁴ कण प्रति घन सेंटीमीटर तक पाया जाता है। ऐसे वातावरण में तारा निर्माण गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र और गैसीय प्रवाह में उत्पन्न विक्षोभों के बीच जटिल परस्पर क्रिया का परिणाम होता है। यही कारण है कि तारा निर्माण को समझने के लिए केवल गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि गैस और धूल की गतिशीलता तथा चुंबकीय संरचना का विश्लेषण आवश्यक है।

एल328 आणविक बादल पर केंद्रित अध्ययन

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के खगोलविदों ने अपने नवीन शोध में एल328 आणविक बादल को अध्ययन के लिए चुना। यह बादल लगभग 700 प्रकाश वर्ष की दूरी पर स्थित है और इसमें तारा निर्माण की प्रारंभिक अवस्थाओं को समझने का दुर्लभ अवसर उपलब्ध होता है।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता शिवानी गुप्ता के अनुसार, टीम ने विशेष रूप से एल328 के S2 उप-कोर पर ध्यान केंद्रित किया क्योंकि यह अत्यंत कम दीप्तिमान है। इस कोर में एक प्रोटोस्टार मौजूद है, लेकिन उसका प्रकाश और उससे निकलने वाला द्विध्रुवीय प्रवाह कमजोर है। कमजोर प्रवाह का अर्थ यह है कि आसपास के माध्यम में न्यूनतम विक्षोभ उत्पन्न होता है, जिससे तारा निर्माण से पहले मौजूद आदिम चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन अधिक सटीक रूप से किया जा सकता है।

ध्रुवीकरण अध्ययन और आधुनिक उपकरण

एल328 कोर में चुंबकीय क्षेत्र की संरचना को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने हवाई, अमेरिका में स्थित James Clerk Maxwell Telescope पर लगे POL-2 उपकरण से प्राप्त ध्रुवीकरण डेटा का उपयोग किया। इस उपकरण ने 850 माइक्रोन तरंगदैर्ध्य पर धूल कणों से निकलने वाले ध्रुवीकृत विकिरण का अवलोकन किया। धूल कणों के ध्रुवीकरण की दिशा का विश्लेषण कर वैज्ञानिकों ने विभिन्न स्तरों पर चुंबकीय क्षेत्र की आकृति का विस्तृत मानचित्र तैयार किया।

यह अध्ययन व्यापक बादल स्तर से लेकर उप-प्रकाश वर्ष के कोर स्तर तक चुंबकीय क्षेत्रों को जोड़ने वाले ठोस अवलोकन साक्ष्य प्रस्तुत करता है।

व्यापक से सूक्ष्म स्तर तक सुसंगत चुंबकीय संरचना

इस शोध की सह-लेखिका और भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान की संकाय सदस्य अर्चना सोआम ने बताया कि एल328 के पूर्व अध्ययनों में प्लैंक उपग्रह, ऑप्टिकल और निकट-अवरक्त ध्रुवीकरण का उपयोग कर बड़े पैमाने पर चुंबकीय क्षेत्रों का मानचित्रण किया गया था। नया अध्ययन इन्हीं निष्कर्षों को कोर स्तर तक विस्तार देता है, जहां वास्तविक तारा निर्माण होता है।

अवलोकनों से यह स्पष्ट हुआ कि बादल से लेकर कोर तक चुंबकीय क्षेत्र व्यवस्थित और सुसंगत बने रहते हैं। इनका समग्र अभिविन्यास उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में पाया गया। कोर स्तर पर चुंबकीय क्षेत्र की शक्ति अपेक्षाकृत अधिक है, जो यह संकेत देता है कि छोटे पैमानों पर चुंबकीय प्रभाव और भी मजबूत हो जाते हैं।

ऊर्जा संतुलन और चुंबकीय भूमिका

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के संकाय सदस्य महेश्वर गोपीनाथन के अनुसार, एल328 कोर में गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र, गैसीय प्रवाह विक्षोभ और तापीय ऊर्जा की तुलनात्मक समीक्षा की गई। परिणाम बताते हैं कि गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र और प्रवाह विक्षोभ तीनों लगभग समान स्तर के प्रभावी कारक हैं और तापीय ऊर्जा की तुलना में लगभग दस गुना अधिक शक्तिशाली हैं।

इसका सीधा अर्थ यह है कि चुंबकीय क्षेत्र और प्रवाह विक्षोभ गुरुत्वाकर्षण का संतुलन बनाते हुए यह तय करते हैं कि कोई कोर कब और कैसे तारे में परिवर्तित होगा।

तारा निर्माण या उसका अभाव: चुंबकीय संतुलन की कुंजी

शोध में यह भी सामने आया कि ताराविहीन लेकिन रासायनिक रूप से विकसित कोर और अत्यल्प दीप्तिमान प्रोटोस्टार वाले कोर के बीच चुंबकीय व्यवहार में महत्वपूर्ण अंतर होता है। शिवानी गुप्ता के अनुसार, जिन कोरों में चुंबकीय समर्थन गुरुत्वाकर्षण से अधिक मजबूत होता है, वे उप-क्रांतिक अवस्था में बने रहते हैं और तारा निर्माण नहीं कर पाते। इसके विपरीत, जहां यह संतुलन गुरुत्वाकर्षण के पक्ष में झुकता है, वहां तारा निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रकाशन

यह महत्वपूर्ण शोध Royal Astronomical Society की प्रतिष्ठित पत्रिका Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन, यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल लंकाशायर तथा कोरिया एस्ट्रोनॉमी एंड स्पेस साइंस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक भी सह-लेखक के रूप में शामिल हैं।

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