बांदा: ‘विद्यालय बनें आनंदघर’ की संकल्पना को साकार करते हुए शैक्षिक संवाद मंच द्वारा विगत संध्या मासिक काव्य सम्मलेन शृंखला ‘काव्याम्बर’ के प्रथम संस्करण का ऑनलाइन आयोजन किया गया, जिसमें चयनित बेसिक शिक्षक-शिक्षिकाओं ने ‘मुक्तक’ विधा पर अपनी रचनाओं से समां बांध दिया। इस कार्यक्रम का सजीव प्रसारण यूट्यूब और फेसबुक पर भी किया गया, जिससे बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी जुड़े।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ने की और मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र राज्य हिंदी संस्थान के पूर्व सदस्य और नवनीत पत्रिका के पूर्व संपादक मार्कण्डेय त्रिपाठी की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का शुभारम्भ संचालन कर रही सीमा मिश्रा ने माँ शारदे की स्तुति से किया। इसके पश्चात गुंजन भदौरिया (कन्नौज) ने “भारत माँ से प्रेम अगर तो प्रेम कभी दिखलाओ न” पढ़कर देशप्रेम की भावना जाग्रत की, तो वहीं वाराणसी के विन्ध्येश्वरी प्रसाद ‘विन्ध्य’ ने “जिससे मिले सुकून सभी को वही तराना गाएं हम” के माध्यम से साम्प्रदायिक सौहार्द का सन्देश दिया। रामपुर की नीलम रानी सक्सैना ने “धरा की धरोहर बचाते रहेंगे” कहकर पर्यावरण संरक्षण का संकल्प दोहराया।
काव्य पाठ के क्रम को आगे बढ़ाते हुए कुशीनगर की मनीषा श्रीवास्तव ‘श्रीगौरी’ ने “धरा गगन के मिलन बिंदु तक विस्तृत करना है” और प्रतापगढ़ की अंकिता सिंह ने “आदम तू पूछता क्या है ये तेरे कर्मों का फल है” सुनाकर श्रोताओं को चिंतन के लिए विवश किया। आगरा की डॉ. यशोधरा यादव ने शहीदों को नमन करते हुए पढ़ा “भारत माँ का कर्ज चुका कर हमें स्वतंत्रता दिला गए”, जबकि गाजीपुर की शालिनी श्रीवास्तव ने “मेरे गाँव की एक नदी थी” सुनाकर नदियों के जीवन पर आसन्न संकट का संकेत किया। मुख्य अतिथि श्री मार्कण्डेय त्रिपाठी ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय देते हुए चार अलग-अलग रंगों की रचनाएं प्रस्तुत कीं।
उन्होंने माँ की वंदना, व्यंग्य “याद नहीं कुछ रहता है” और बाल कविता “सर्दी लग जाएगी मुन्ना ओढ़े रहो रजाई” सुनाकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन साहित्य सृजन को नई दिशा प्रदान करते हैं। संचालन कर रही सीमा मिश्रा (फतेहपुर ) ने अपनी ओजस्वी वाणी में “पतझड़ देख नहीं डर लगता, सृजन और विध्वंश सदा ही सजते द्वार हमारे हैं” का सुमधुर गान किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री प्रमोद दीक्षित ‘मलय’ ने सभी कवियों की रचनाओं पर विस्तृत आलोचनात्मक टिप्पणी की और बताया कि मंच द्वारा पिछले वर्ष की रचनाओं को ‘कवितायन’ संग्रह के रूप में प्रकाशित किया गया था। उन्होंने अपनी रचना “मेदिनी का प्राण नदिया स्वस्थ हो हंसती रहें” और “सुख मिला हमको सदा वट पीपलों की छांव में” सुनाकर प्रकृति प्रेम का सन्देश दिया। अंत में संयोजक दुर्गेश्वर राय ने शहरीकरण की पीड़ा को व्यक्त करते हुए “कहाँ किसी को फुर्सत है, गाँव जबसे हुए शहर, एकल सब परिवार हुए” सुनाया और सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। सभी सहभागी कवियों को ई-सम्मान पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम को सफल बनाने में मंच के अध्यक्ष विनीत कुमार मिश्र और वैशाली मिश्रा ने महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग प्रदान किया। इस अवसर पर संजय वस्त्रकार, डॉ. अरविन्द द्विवेदी, ऋतु श्रीवास्तव, अमिता सचान, अनुपमा शर्मा, मीरा कुमारी, डॉ. श्रवण गुप्त, रुचिता पाण्डेय, शानू खन्ना, ज्योति जैन, प्रतीक्षा त्रिपाठी, कुसुम गुप्ता, कनक, मीनाक्षी सिंह, मंजू वर्मा, सुनीता वर्मा, प्रज्ञा गौरव, विजय शंकर यादव, पायल मलिक, माधुरी त्रिपाठी सहित अर्द्धशताधिक शिक्षक और साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।