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वैश्विक ऑर्डर का रूझान भारत की ओर

2026 की शुरुआत में खड़ा विश्व एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर है जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी पुरानी व्यवस्थाएं चरमरा रही हैं। भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अस्थिरता और शक्ति के ध्रुवीकरण के इस दौर में, वैश्विक पटल पर भारत की भूमिका एक ‘संतुलनकारी शक्ति’ से बढ़कर एक ‘निर्णायक नेतृत्व’ की ओर बढ़ रही है।

आज की विश्व व्यवस्था अब एकध्रुवीय नहीं रही। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने वैश्विक संस्थानों (जैसे UN और WTO) की सीमाओं को उजागर कर दिया है। दुनिया अब कई शक्ति केंद्रों में विभाजित हो रही है, जहाँ मध्यम शक्तियाँ अपनी स्वायत्तता की तलाश में हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाएं वर्तमान संकटों को सुलझाने में विफल दिख रही हैं, जिससे ‘सुधारित बहुपक्षवाद’  की मांग तेज हुई है। इन सब विषमताओं के बीच भारत की अपनी आर्थिक सुदृढ़ीकरण और वैश्विक नेतृत्व का उभार भारत को विश्व नेता के रूप में सामने प्रस्तुत कर रहा है।

भारत ने खुद को विकासशील और अल्पविकसित देशों के प्रतिनिधि के रूप में मजबूती से स्थापित किया है। जनवरी 2026 से भारत ने ब्रिक्स की कमान संभाली है। भारत का लक्ष्य इस मंच को पश्चिम-विरोधी बनाने के बजाय एक ‘समावेशी वैश्विक मंच’ के रूप में विकसित करना है।

भारत की विदेश नीति अब केवल राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत पर आधारित है, जैसा कि कोविड-19 के दौरान ‘वैक्सीन मैत्री’ और तुर्की-सीरिया भूकंप में ‘ऑपरेशन दोस्त’ के माध्यम से देखा गया।

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है, जो वैश्विक नेतृत्व के दावों को ठोस आधार प्रदान करती है। अनुमान है कि भारत जल्द ही जर्मनी और जापान को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। भारत ने किसी भी गुट का हिस्सा बने बिना अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखी है। वह एक तरफ ‘क्वाड’ के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और मध्य-पूर्व के देशों के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध भी मजबूत कर रहा है। भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे यूपीआई और आधार, आज दुनिया के लिए एक मॉडल बन चुका है। कई देश भारत की इस तकनीक को अपना रहे हैं, जिससे भारत ‘सॉफ्ट पावर’ के साथ-साथ ‘टेक पावर’ के रूप में भी उभर रहा है।

चीन के साथ सीमा विवाद और अस्थिर पड़ोस (पाकिस्तान, म्यांमार) भारत की ऊर्जा को डायवर्ट करते हैं। वैश्विक अस्थिरता के बीच अपनी विशाल आबादी के लिए निरंतर और सस्ती ऊर्जा सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है। वैश्विक नेतृत्व के लिए बुनियादी ढांचे और अनुसंधान (R&D) में भारी निवेश की निरंतर आवश्यकता है। भारत अब नियम फालो करने वाला देश नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला राष्ट्र बन रहा है। 2026 का यह वर्ष भारत के लिए अपनी वैश्विक साख को और गहरा करने का स्वर्णिम अवसर है।

G20 क्षेत्र में दुनिया को एकजुट करने के लिए इस गठबंधन की शुरुआत हुई, जो पर्यावरण संरक्षण में भारत की अग्रणी भूमिका को दर्शाता है। भारत ने 2023 की अपनी अध्यक्षता के दौरान G20 की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया। भारत ने इसे केवल आर्थिक चर्चा का मंच न रखकर एक ‘जन-आंदोलन’ बना दिया। अफ्रीकी संघ को सदस्यता मिलना भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाना थी। इससे भारत ने साबित किया कि वह ‘ग्लोबल साउथ’ का वास्तविक नेता है। भारत ने दुनिया को दिखाया कि कैसे डिजिटल तकनीक (UPI, आधार) का उपयोग वित्तीय समावेशन के लिए किया जा सकता है। अब ‘इंडिया स्टैक’ कई विकासशील देशों के लिए एक रोल मॉडल है। 

2026 में भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता एक ऐसे समय में आई है जब दुनिया ‘डी-डलर लाइजेशन’ (डॉलर पर निर्भरता कम करने) और वैकल्पिक वित्तीय प्रणालियों की बात कर रही है। ब्रिक्स के नए सदस्यों (जैसे मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई) के आने के बाद, भारत की भूमिका इन विविध हितों को संतुलित करने में महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स पे भारत अपनी डिजिटल भुगतान तकनीक के माध्यम से ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने का नेतृत्व कर रहा है। ब्रिक्स के भीतर चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने के लिए भारत एक लोकतांत्रिक और पारदर्शी विकल्प पेश करता है, जिससे यह समूह केवल एक ‘पश्चिम-विरोधी’ गुट बनने के बजाय एक ‘विकास-केंद्रित’ मंच बना रहे।

कुलमिलाकर भारत अब केवल मेज पर बैठने की मांग नहीं कर रहा, बल्कि वह अब एजेंडा तय कर रहा है। वैश्विक ऋण संकट हो या खाद्य सुरक्षा, दुनिया अब समाधान के लिए नई दिल्ली की ओर देखती है।

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