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स्मृतियों में बसे हैं रेडियो के खट्टे-मीठे पल

विश्व रेडियो दिवस पर

        सम्पूर्ण विश्व में 13 फरवरी को रेडियो दिवस मनाया जाता है। जन सामान्य को शिक्षा, संस्कृति, सूचना, संचार एवं अभिव्यक्ति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने एवं जागरूकता बढ़ाने के लिए रेडियो की भूमिका के सम्मान एवं स्मरण के लिए रेडियो दिवस मनाकर रेडियो के खट्टे-मीठे पलों को याद करते हैं। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आमसभा में 3 नवम्बर, 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जायेगा। उल्लेखनीय है कि 13 फरवरी को ही संयुक्त राष्ट्र की ‘रेडियो यूएनओ’ की वर्षगांठ भी होती है क्योंकि 1946 को इसी दिन वहां रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था। और तब पहली बार 13 फरवरी, 2012 को यह विश्व रेडियो दिवस उमंग-उत्साह पूर्वक पूरी दुनिया में मनाते हुए रेडियो के सुनहरे सफरनामे को याद किया गया। आयोजनों हेतु प्रत्येक वर्ष एक थीम तय की जाती हैं। पिछले  वर्ष 2025 की थीम थी – रेडियो और जलवायु परिवर्तन। वर्ष 2026 का विषय है- रेडियो और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जो सामयिक है और आवश्यक भी। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की ‘मन की बात’ से एक बार फिर से रेडियो समाज के मुख्य फलक पर उभर आया है। स्मरणीय है कि 80-90 दशक तक किसी को भी रेडियो रखने और कार्यक्रम सुनने के लिए डाक विभाग द्वारा भारतीय डाक-तार अधिनियम 1885 के अंतर्गत एक वर्षीय लाइसेंस लेना पड़ता था। यह लाइसेंस दो प्रकार का होता था- घरेलू और वाणिज्यिक अर्थात् सामूहिक। घरेलू लाईसेंस का शुल्क 10-15 रुपये और वाणिज्यिक का 25 रुपये वार्षिक होता था। एक वर्ष पश्चात नवीनीकरण कराना होता था। बिना लाइसेंस के रेडियो रखना अपराध की श्रेणी में आता था और सजा का प्रावधान भी था। पर भारत में टेलीविजन के आगमन और प्रसार के बाद रेडियों के अस्तित्व को बचाने के लिए सरकार ने 1987 में लाइसेंस हटा लिया और 1991 से रेडियों की लाइसेंस व्यवस्था पूरी तरह बंद कर दी गई। भारत सरकार ने रेडियो की रजत जयंती के अवसर पर 8 जून, 1961 को स्मारक डाक टिकट जारी किया था। संयुक्त राष्ट्र संघ के डाक प्रशासन ने भी वर्ष 2013 में रेडियो पर डाक टिकट जारी किए थे। रेडियो दिवस के अवसर पर मुझे रेडियो के साथ बिताए बचपन से लेकर अद्यावधि तक के खट्टे-मीठे पल स्मरण हो आये हैं, और तमाम चित्र मेरे मानस पटल पर सजीव होकर उभरने लगे हैं।

     रेडियो से मेरा जुड़ाव कैसे कब हो गया, मुझे ध्यान नहीं है पर बचपन में जहां कहीं भी रेडियो बज रहा होता, मैं वहां पहुंच कार्यक्रम सुनता था। लोकगीत, बालसभा, कृषि और फिल्मी गानों के कार्यक्रम मन लुभाते थे। क्रिकेट मैच की कमेंट्री सुनने की रुचि के चलते घंटों रेडियो के पास बैठा रहता। पर इससे मेरी पढ़ाई में बाधा कभी नहीं आई। मैं रेडियो सुनते हुए भी पढ़ता रहता था। 70-80 के दशक में रेडियो शौकीन लोगों के पास ही हुआ करता था। रेडियो होना बड़प्पन का भी प्रतीक था। वर्ष 1981 में कस्बे के ब्रह्म विज्ञान इंटर कालेज में कक्षा 6 में प्रवेश लिया था। वहां एक छात्रवृत्ति परीक्षा उत्तीर्ण किया था तो 10 रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी थी, पूरे वर्ष की एक साथ 120 रुपए। कक्षा 6 उत्तीर्ण करते ही 120 रुपये  का चेक मिला था, अपने पास रखे रुपये मिलाकर तब 140 रुपये का लकड़ी का बना बैटरी और बिजली दोनों से चलने वाला बड़ा रेडियो लिया था। लेकिन वह एक जगह अलमारी में ही रखा रहता था। उसमें चार सेल पड़ते थे। पर उससे मन ऊब गया और तब रामसंस का रेडियो लिया, किसी बात पर गुस्सा होकर उसे पटक-पटक कर योग दिया और फिर लिया मरफी ब्रांड का छोटा रेडियो, दमदार साफ एवं स्पष्ट आवाज। अब रेडियो पल-पल का साथी था। स्कूल छोड़कर रिश्तेदारों-मित्रों या गांव जाना होता तो रेडियो साथ होता।‌ लोग समाचार या कोई भी कार्यक्रम सुनवाने का अनुरोध करते तो बहुत गौरव एवं गर्व महसूस होता। तब रेडियो चालू करके दीवार पर रख दिया जाता और दर्जनों बाल, वृद्ध और युवा कार्यक्रम का आनंद लेते और तब कोई मुझे घी और बताशा खिलाता, कोई ताजा गुड़ तो कोई गन्ने का रस। खलिहान में नीम के पेड़ पर टंगा बजता रेडियो और गेहूं या धान की होती मंड़ाई, चारपाई पर बैठा मैं और मुझे घेरे खड़ा समूह जो फलां स्टेशन लगाने और कार्यक्रम सुनाने की गुजारिश करते। दिन कब बीत जाता पता ही न चलता।

       मेरे पूरे छात्र जीवन में रेडियो साथ रहा। एक दर्जन से अधिक रेडियो बदले होंगे मैंने। लोकल ब्रांड से लेकर मरफी, बुश और फिलिप्स के रेडियो तक। अरे, एक बात बताना भूल गया। रेडियो के स्टेशन बदलने वाली घिरनी का रेशमी धागा लोगों द्वारा बटन अधिक घुमा देने से प्रायः टूट जाता था, तब बीस रुपये में नया धागा पड़ता। बार-बार धागा बदलवाने जाने से थोड़ा सीख गया था। तो एक बार मैंने स्वयं धागा बदलने का निश्चय किया और दूकान से 5 रुपये का रेशमी धागा खरीद कर नया धागा और सुई लगा दी। लेकिन नयी परेशानी आ गयी, जब रेडियो शुरू किया तो स्टेशन बदल गये। छतरपुर, लखनऊ और रीवा स्टेशन ही मीडियम वेब पर सुने जाते थे, पर वे अब इधर-उधर हो गये। मरता क्या न करता, मैकेनिक के पास जाना पड़ा, 20 के 30 रुपये भी लगे और उपहास का पात्र भी बना, अधजल गगरी छलकत जाय। एक बार रात में चारपाई पर रेडियो सुनते-सुनते मैं नींद के आगोश में चला गया। सुबह मिली अम्मा की डांट और लगभग चुक चुकी बैटरी। चुनाव विश्लेषण, राजपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड तथा क्रिकेट मैच की कमेंट्री सुनने का जुनून था। समाचार प्रस्तुत करते  देवकीनंदन पांडेय का धीर-गम्भीर स्वर सम्मोहित करता तो अन्य समाचार पाठकों विनोद कश्यप, रामानुज प्रसाद सिंह एवं अशोक वाजपेई भी आवाज से पहचाने जाते थे। गणतंत्र परेड का मोहक चित्र उपस्थित कर देते जसदेव सिंह एवं सुनीत टंडन और क्रिकेट के मैदान को सजीव साकार कर देती सुशील दोषी, विनीत गर्ग, संजय बनर्जी, अरुण लाल, रवि चतुर्वेदी, कुलविंदर सिंह कंग, एम एम मंजुल, सुरेश सरैया और नरोत्तम पुरी की आवाज ने रेडियो की छवि में चार चांद लगाये। बीबीसी की भी पहुंच और पहचान गांव-गांव थी।

            मुझे रेडियो से बहुत कुछ मिला। मैंने किसी विषय की प्रस्तुति का ढंग रेडियो से सीखा। सामान्य ज्ञान और विविध क्षेत्रों की जानकारी रेडियो से पाकर समृद्ध हुआ।लिखने की प्रेरणा मिली और कविताएं एवं लेख आदि लिखने लगा था जो आकाशवाणी छतरपुर से खूब प्रसारित हुए। अप्रैल 1997 में जब मैं आकाशवाणी छतरपुर में पहली रिकार्डिंग कराई और जेब में शायद 756 रुपए का चेक रखकर स्टूडियो से बाहर निकला तो लगा कि मेरे पैर जमीन पर नहीं हैं, मैं आकाश में उड़ रहा हूं। आज जीवन के पांच दशक पूरे करने के बाद भी रेडियो के साथ बिताये खट्टे-मीठे पल स्मृतियों में बसे हैं।

        रेडियो सतत बदलाव का साझीदार रहा है। बदलते दौर में लोगों का ध्यान रेडियो से हटा है क्योंकि सूचना, शिक्षा, संचार, मनोरंजन एवं अभिव्यक्ति के तमाम सहज सुलभ संसाधन उपलब्ध हो गये हैं।‌ पूरी दुनिया मुट्ठी में है और मोबाइल की स्क्रीन पर उपलब्ध है। बावजूद इसके रेडियो की प्रासंगिकता और महत्व कभी खत्म नहीं होगा। लोक से रेडियो का रिश्ता मधुर बना रहेगा, ऐसा ही विश्वास है।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
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