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समानता का संकल्प और समाज की परीक्षा

1 मार्च शून्य भेदभाव दिवस-

   एक मार्च को मनाया जाने वाला शून्य भेदभाव दिवस केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की कसौटी है। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएआइडीएस ने एचआईवी/एड्स से प्रभावित लोगों के प्रति व्याप्त पूर्वाग्रह और सामाजिक बहिष्कार के विरोध में की थी। आज यह दिवस हर प्रकार के भेदभाव जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, भाषा, रंग, आयु, लैंगिक पहचान या दिव्यांगता के विरुद्ध वैश्विक संकल्प का प्रतीक बन चुका है।

भारत का संविधान समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 से 17 तक स्पष्ट रूप से भेदभाव निषेध की बात कही गई है। फिर भी प्रश्न यह है कि क्या सामाजिक व्यवहार में यह आदर्श पूर्ण रूप से परिलक्षित होता है? ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी परिवेश तक, लैंगिक असमानता, जातीय विभाजन, आर्थिक विषमता और दिव्यांगजनों के प्रति संवेदनहीनता के उदाहरण सामने आते रहते हैं। यह विडंबना है कि कानूनी सुरक्षा होने के बावजूद सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन की गति अपेक्षित नहीं है।

भेदभाव को अक्सर नैतिक या सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाता है, किंतु इसका आर्थिक और विकासात्मक पक्ष भी उतना ही गंभीर है। जब समाज का एक वर्ग अवसरों से वंचित रह जाता है, तो राष्ट्र अपनी सामूहिक क्षमता का बड़ा हिस्सा खो देता है। समावेशी शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य सेवाओं की समान उपलब्धता और कार्यस्थलों पर निष्पक्ष अवसर ये केवल सामाजिक न्याय के उपाय नहीं, बल्कि स्थायी विकास की आधारशिला हैं।

विद्वजनों का मानना है कि भेदभाव का मूल कारण पूर्वाग्रह और अज्ञान है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में समावेशी पाठ्यक्रम, संवेदनशीलता प्रशिक्षण और विविधता का सम्मान सिखाने वाली पहलें आवश्यक हैं। मीडिया और साहित्य भी समाज की सोच को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, परिवार वह पहला संस्थान है जहाँ समानता की भावना अंकुरित होती है। यदि घर में ही पुत्र-पुत्री में भेद किया जाए, तो समाज में बराबरी की उम्मीद अधूरी रह जाती है।

आज सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को व्यापक मंच दिया है। सकारात्मक अभियानों के माध्यम से समानता का संदेश दूर-दूर तक पहुँचाया जा सकता है। परंतु यही मंच कई बार घृणा, ट्रोलिंग और फेक न्यूज़ का माध्यम भी बन जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। डिजिटल आचरण में संवेदनशीलता, शून्य भेदभाव के संकल्प की नई कसौटी है।

सरकारों द्वारा विभिन्न कल्याणकारी योजनाएँ और आरक्षण नीतियाँ सामाजिक समावेशन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, परंतु केवल नीतियाँ पर्याप्त नहीं। समाज के प्रत्येक वर्ग को अपनी भूमिका निभानी होगी। निजी संस्थानों, कॉर्पोरेट जगत और नागरिक समाज को भी समान अवसर और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय होना होगा।

शून्य भेदभाव दिवस आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें यह सोचने को प्रेरित करता है कि क्या हम अपने दैनिक व्यवहार में सचमुच समानता को जी रहे हैं? क्या हम अनजाने में भी किसी के साथ पूर्वाग्रहपूर्ण व्यवहार नहीं करते? समानता कोई कृपा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को सम्मान और अवसर की समान उपलब्धता नहीं मिलती, तब तक विकास अधूरा रहेगा। शून्य भेदभाव का लक्ष्य केवल नारा नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और सामूहिक चेतना का विषय है। यही वह संकल्प है, जो एक न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की नींव रख सकता है।

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