04 मार्च राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस
राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि देश की कार्यसंस्कृति और नागरिक जिम्मेदारी की परीक्षा है। इसकी स्थापना 1972 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद द्वारा की गई थी। उद्देश्य स्पष्ट था,औद्योगिक दुर्घटनाओं में कमी लाना, कार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों को सुदृढ़ करना और नागरिकों में सुरक्षा के प्रति जागरूकता विकसित करना।परंतु पाँच दशकों से अधिक समय बाद भी प्रश्न यह है,क्या हमने सुरक्षा को संस्कृति का हिस्सा बनाया है, या यह अब भी केवल एक सप्ताह का अभियान भर है?

भारत विश्व की तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। निर्माण, खनन, ऊर्जा, परिवहन और अवसंरचना क्षेत्रों में व्यापक विस्तार हुआ है। लेकिन इस विकास के साथ दुर्घटनाओं की घटनाएँ भी सामने आती रही हैं।कारखानों में आग, गैस रिसाव, भवन निर्माण स्थलों पर हादसे ये केवल समाचार शीर्षक नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी के उदाहरण हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकांश दुर्घटनाएँ रोकी जा सकती हैं, यदि नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण हो,उपकरणों का रखरखाव समय पर हो,जोखिम मूल्यांकन और आपदा प्रबंधन योजना लागू हो,और सबसे महत्वपूर्ण प्रबंधन की स्पष्ट प्रतिबद्धता हो।जब सुरक्षा को “खर्च” समझा जाता है, तब दुर्घटना की कीमत कई गुना अधिक चुकानी पड़ती है।

