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 वेष नहीं, गुणों से पहचाने जाते हैं संत

इस समय भारतीय समाज में एक अलग तरह की बहस छिड़ गयी है जिसमें असली संत बनाम नकली संत को लेकर सभी के अपने-अपने तर्क दिखाई पड़ रहे हैं।  किन्तु हमारे धार्मिक ग्रंथों में संत की न केवल महिमा बताई गयी वरन् संत के लक्षण तक बताए गये हैं।

भारतीय सनातन परंपरा में संतों का स्थान अत्यंत उच्च और पूजनीय माना गया है। संत केवल धार्मिक आचार्य नहीं, बल्कि समाज के नैतिक मार्गदर्शक होते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथों में संतों के स्वरूप, गुण और महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है।

रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी संतों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं-

“संत हृदय नवनीत समाना।
कहा कबिन्ह पर कहइ न जाना॥”

अर्थात् संत का हृदय मक्खन के समान कोमल होता है। वे दूसरों के दुःख से द्रवित हो जाते हैं और किसी के प्रति कठोरता नहीं रखते। आगे तुलसीदास जी संत और असंत के अंतर को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-

“बंदउँ संत असज्जन चरना।
दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥”

यहाँ संत और असंत दोनों के प्रभाव का उल्लेख करते हुए विवेकपूर्ण दृष्टि रखने की प्रेरणा दी गई है।

इसी प्रकार भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण सज्जनों और संतों की रक्षा का आश्वासन देते हैं-

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥” (अध्याय 4, श्लोक 8)

अर्थात् सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए भगवान युग-युग में अवतार लेते हैं। यह श्लोक स्पष्ट करता है कि संत समाज में धर्म और नैतिकता के संवाहक होते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण में संत के लक्षणों का वर्णन मिलता है-

अर्थात् सच्चे साधु सहनशील, दयालु, सबके हितैषी, शत्रुता से रहित और शांत स्वभाव के होते हैं। यही उनके वास्तविक आभूषण हैं।

यदि हम हनुमान चालीसा का स्मरण करें तो उसमें संतत्व के गुणों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है-

यहाँ ज्ञान, गुण, विनम्रता और सेवा भाव चारों का सुंदर समन्वय है। हनुमान जी अपार बलशाली होते हुए भी अत्यंत विनीत और समर्पित रहे। यही संतत्व का मर्म है शक्ति के साथ नम्रता और सामर्थ्य के साथ सेवा।

वर्तमान समय में जब समाज में “असली संत बनाम नकली संत” की चर्चा होती है, तब आवश्यक है कि हम संत के शास्त्रीय लक्षणों को आधार बनाएँ। संतत्व वस्त्रों से नहीं, बल्कि आचरण से प्रकट होता है। जहाँ करुणा, सत्य, संयम और सेवा का भाव है, वहीं संतत्व है। वहीं यदि अहंकार, स्वार्थ या विभाजन की भावना दिखाई दे, तो समाज को सजग रहना चाहिए परंतु बिना किसी के प्रति कटुता या पूर्वाग्रह के।

भारत की संत परंपरा अत्यंत गौरवशाली रही है। कुछ व्यक्तियों के आचरण के कारण संपूर्ण संत समाज को संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं। साथ ही, विवेकपूर्ण दृष्टि रखना भी समाज का दायित्व है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम शास्त्रों के आलोक में संत के लक्षणों को पहचानें, सच्चे संतों का सम्मान करें और समाज में सद्भाव, मर्यादा तथा धर्म के मूल्यों को सुदृढ़ करें। यही संत परंपरा का वास्तविक सम्मान और समाज हित का मार्ग है।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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