हे भारत के शूरवीर,
तुम बनो शांति के दूत सदा।
पर सीमा पे डटे रहो,
जब भारत पर आए विपदा।
सत्य, अहिंसा, अनुशासन और
शांति, धैर्य जीवन का मंत्र।
जन जन के जीवन की,
मानवता की, मर्यादा जनतंत्र।
जन मानस के मन में जगा दो,
प्रिय स्वदेश का नव विहान।
बढ़ते ही रहो निर्भय पथ पर,
गुंजित हो चहुं दिश प्रीति गान।
स्वतंत्रता का राज मुकुट,
हर एक के शीश पे हो शोभित।
मन के कोमल, निश्छल भाव,
सब के हृदय में हों स्थित।
सिंचित हो प्यार से ये धरती,
हो मुक्त कर्म, वाणी, विचार।
भारत मां की है ये पुकार,
बन जाओ उसके कर्णधार।
आगे ही बढ़ो तुम दिग्विजयी,
रच दो भारत में राम राज।
आत्माहुति के माणिक से तुम,
सजा दो मां का स्वर्णिम ताज।
तुम कर्मवीर, तुम शौर्यपुंज,
तुमको है बारंबार नमन।
तुम बलिदानी, तुम अभिमानी,
तुमको है हृदय से अभिनंदन!!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

