22 मई: वैश्विक जैव विविधता दिवस पर विशेष
प्रत्येक वर्ष 22 मई को विश्वभर में (अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस) मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य पृथ्वी पर मौजूद विविध जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और सूक्ष्म जीवों की महत्ता को समझना तथा उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। वर्तमान समय में जैव विविधता पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। मानव के स्वार्थपूर्ण हस्तक्षेप, अनियंत्रित औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण पृथ्वी की जैविक संपदा तेजी से क्षीण हो रही है। इसके साथ ही (वैश्विक ऊष्मीकरण) और जलवायु परिवर्तन ने पर्यावरणीय संतुलन को और अधिक प्रभावित किया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार आने वाले समय में अनेक पौधों और जीवों की प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच सकती हैं।
जैव विविधता केवल प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का आधार है। प्रत्येक प्रजाति—चाहे वह कितनी ही छोटी क्यों न हो—पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विविध प्रजातियों की उपस्थिति से खाद्य श्रृंखलाएँ संतुलित रहती हैं और प्रकृति की उत्पादकता बनी रहती है। यदि किसी एक कड़ी में भी व्यवधान उत्पन्न होता है, तो इसका प्रभाव पूरे तंत्र पर पड़ता है।

जैव विविधता के संरक्षण हेतु वैश्विक स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। (अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ) द्वारा प्रकाशित “रेड डाटा बुक” (लाल आँकड़ा पुस्तिका) में संकटग्रस्त और विलुप्तप्राय प्रजातियों की सूची तैयार की जाती है, जिससे उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जा सकें। इसमें प्रजातियों को विभिन्न श्रेणियों—जैसे विलुप्त, संकटग्रस्त, अतिसंवेदनशील और दुर्लभ—में वर्गीकृत किया जाता है।
भारत भी इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। (जैव विविधता अधिनियम, 2002), (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972) और आर्द्रभूमि (संरक्षण एवं प्रबंधन) नियम, 2017 जैसे कानूनों के माध्यम से जैव विविधता की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण पहल की गई है। इसके अतिरिक्त (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) की स्थापना से पर्यावरण संबंधी मामलों के त्वरित समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
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पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति एककोशिकीय जीवों से हुई और विकास की लंबी प्रक्रिया के बाद जटिल जीवों एवं वनस्पतियों का निर्माण हुआ। हरे पौधे इस पारिस्थितिकी तंत्र के मूल आधार हैं, क्योंकि वे सौर ऊर्जा को भोजन में परिवर्तित कर समस्त जीवों के जीवन को संभव बनाते हैं। पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की विविधता ही मानव जीवन को भोजन, औषधि, जलवायु संतुलन और अन्य आवश्यक संसाधन प्रदान करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखें। केवल सरकारों या संस्थाओं पर निर्भर रहने के बजाय प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर प्रयास करना होगा—जैसे वृक्षारोपण, जल संरक्षण, वन्यजीवों की रक्षा और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार।
वास्तव में, जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की सुरक्षा भी है। यदि हम आज सचेत नहीं हुए, तो भविष्य में इसका दुष्परिणाम समूची मानवता को भुगतना पड़ेगा। इसलिए यह समय की पुकार है कि हम सभी मिलकर संकल्प लें। प्रकृति की इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह सके।
