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मल्हार ; संग्रहालय के अभाव में जर्जर हो रहीं प्राचीन प्रतिमाएं

टूटी सड़कों और गंदगी के बीच कराह रही ऐतिहासिक नगरी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता का गौरव मानी जाने वाली धर्मनगरी मल्हार आज प्रशासनिक उपेक्षा, राजनीतिक उदासीनता और विकास के खोखले दावों के बीच अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। एक ओर हजारों वर्ष पुरानी दुर्लभ प्रतिमाएं और पुरातात्विक धरोहरें खुले आसमान के नीचे धीरे-धीरे क्षरण का शिकार हो रही हैं, तो दूसरी ओर नगर की जनता टूटी सड़कों, गंदगी, जलभराव और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जीने को मजबूर है।

अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर जब पूरी दुनिया अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने की बातें कर रही थी, तब मल्हार की प्राचीन प्रतिमाएं मानो शासन और प्रशासन से यह सवाल पूछती नजर आईं कि आखिर उन्हें संरक्षण का अधिकार कब मिलेगा? विडंबना यह है कि दक्षिण कोसल की ऐतिहासिक राजधानी मानी जाने वाली यह नगरी आज स्वयं अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए जूझ रही है।

मल्हार केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व का जीवंत दस्तावेज है। यहां की धरती से प्राप्त हरिहर विष्णु की दुर्लभ प्रतिमा को देश की प्राचीनतम मूर्तियों में गिना जाता है। देउर मंदिर, पातालेश्वर मंदिर, डिडनेश्वरी मंदिर और अनेक पुरास्थलों में बिखरी प्रतिमाएं भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला की अद्भुत विरासत को दर्शाती हैं। वर्ष 1975 से 1978 के बीच हुए व्यापक उत्खनन में यहां से अनेक महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए थे। उस समय उम्मीद जगी थी कि मल्हार को राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालय और शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा, लेकिन दशकों बाद भी यह सपना केवल फाइलों और घोषणाओं तक सीमित है।

आज स्थिति यह है कि बहुमूल्य प्रतिमाएं खुले मैदानों, मंदिर परिसरों और असुरक्षित स्थलों पर पड़ी हैं। धूप, बारिश, धूल और प्राकृतिक क्षरण ने इन अमूल्य धरोहरों की चमक फीकी कर दी है। कई प्रतिमाओं की आकृतियां धुंधली पड़ चुकी हैं, तो कई टूट-फूट का शिकार हो रही हैं। संरक्षण के अभाव में इतिहास की यह अनमोल धरोहर धीरे-धीरे मिटती जा रही है। यदि समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण और संग्रहालय निर्माण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां केवल पुस्तकों और तस्वीरों में ही मल्हार के गौरवशाली इतिहास को देख पाएंगी।

लेकिन विडंबना केवल धरोहरों तक सीमित नहीं है। नगर पंचायत मल्हार की वर्तमान स्थिति स्वयं प्रशासनिक विफलता की कहानी बयां कर रही है। नगर की मुख्य सड़कें जगह-जगह से उखड़ चुकी हैं। गहरे गड्ढों और कीचड़ से लोगों का पैदल चलना तक मुश्किल हो गया है। मंदिरों तक पहुंचने वाले मार्ग बदहाल हैं, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की संवेदनहीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऐतिहासिक नगर की मूलभूत सुविधाएं तक बदहाल पड़ी हैं।

नगर में सफाई व्यवस्था लगभग चरमराई हुई दिखाई देती है। नालियां जाम हैं, जगह-जगह गंदगी फैली हुई है और जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से बारिश से पहले ही हालात भयावह हो चुके हैं। ऐतिहासिक तालाबों और जलाशयों में प्लास्टिक, कचरा और जलकुंभी फैल चुकी है, जिससे न केवल पर्यावरण प्रभावित हो रहा है बल्कि नगर की ऐतिहासिक सुंदरता भी समाप्त होती जा रही है।

सबसे गंभीर चिंता का विषय यह है कि जिन स्थलों पर प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं, वहां भी सुरक्षा और प्रकाश व्यवस्था का अभाव है। शाम ढलते ही पातालेश्वर मंदिर और अन्य पुरास्थलों के आसपास अंधेरा छा जाता है। पर्याप्त रोशनी नहीं होने से असामाजिक तत्वों की गतिविधियां बढ़ रही हैं, जिससे महिलाओं और श्रद्धालुओं में भय का वातावरण बना रहता है।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई बार ज्ञापन, शिकायत और मांगों के बावजूद प्रशासन केवल आश्वासन देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है। धरातल पर न तो सड़क सुधार के लिए गंभीर पहल दिखाई देती है और न ही ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए कोई ठोस योजना। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि बदहाल सड़कें और अव्यवस्थित बाजार व्यवस्था व्यापार को भी प्रभावित कर रही हैं। वहीं स्कूली बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को प्रतिदिन सबसे अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

पर्यावरण प्रेमियों और इतिहासकारों का मानना है कि मल्हार में अपार पर्यटन संभावनाएं हैं। यदि यहां आधुनिक संग्रहालय, शोध केंद्र, सांस्कृतिक परिसर, बेहतर सड़कें, प्रकाश व्यवस्था और पर्यटन सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यह क्षेत्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना सकता है। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और क्षेत्र की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी।

 लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ऐतिहासिक महत्व की इतनी बड़ी नगरी आज भी बुनियादी सुविधाओं और संरक्षण योजनाओं के लिए तरस रही है। विकास के नाम पर केवल घोषणाएं और कागजी योजनाएं दिखाई देती हैं, जबकि जमीनी सच्चाई बदहाली, अव्यवस्था और उपेक्षा की तस्वीर प्रस्तुत करती है।

मल्हार की जर्जर प्रतिमाएं, टूटी सड़कें, अंधेरे में डूबे मंदिर और गंदगी से पटे जलाशय आज शासन और प्रशासन से तीखा सवाल पूछ रहे हैं क्या छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान केवल भाषणों और पर्यटन पुस्तिकाओं तक सीमित रह जाएगी? क्या सरकारें तब जागेंगी जब इतिहास पूरी तरह मिट जाएगा?

समय की मांग है कि केंद्र और राज्य सरकार, पुरातत्व विभाग तथा स्थानीय प्रशासन तत्काल संयुक्त कार्ययोजना बनाकर मल्हार में अत्याधुनिक संग्रहालय की स्थापना करें, प्रतिमाओं के वैज्ञानिक संरक्षण की व्यवस्था करें, नगर की आधारभूत सुविधाओं को दुरुस्त करें और इस ऐतिहासिक नगरी को उसकी खोई गरिमा वापस दिलाएं। क्योंकि जो समाज अपनी विरासत और अपने वर्तमान दोनों की रक्षा नहीं कर पाता, वह धीरे-धीरे अपने इतिहास, संस्कृति और अस्तित्व सब कुछ खो देता है।

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