भारत और जर्मनी के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सहयोग के क्षेत्र में एक नया अध्याय जुड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान तथा प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह और जर्मनी के फ्री स्टेट ऑफ थुरिंगिया के मंत्री-प्रमुख मारियो वोग्ट के बीच नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बैठक में क्वांटम संचार, फोटोनिक्स, क्वांटम उपग्रह संचार, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तथा उद्योग-आधारित डीप-टेक नवाचार जैसे भविष्य के रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाओं पर व्यापक चर्चा हुई।

यह बैठक ऐसे समय में आयोजित हुई है जब भारत और जर्मनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी साझेदारी के 50 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहे हैं। दोनों देशों ने इस अवसर को नवाचार, अनुसंधान और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के अवसर के रूप में देखा।
बैठक में भारत की ओर से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव राजेश एस. गोखले, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग की सचिव तथा सीएसआईआर की महानिदेशक डॉ. एन. कलैसेल्वी सहित विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे। वहीं जर्मन प्रतिनिधिमंडल में सरकार, अनुसंधान संगठनों, उद्योग और तकनीकी संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रतिनिधिमंडल का स्वागत करते हुए कहा कि भारत और जर्मनी के संबंध केवल कूटनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विज्ञान, नवाचार और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने मजबूत विश्वास और सहयोग का आधार निर्मित किया है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक सहयोग आज द्विपक्षीय संबंधों के सबसे सशक्त स्तंभों में से एक बन चुका है।
बैठक में विशेष रूप से थुरिंगिया की फोटोनिक्स, ऑप्टिक्स, क्वांटम प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में स्थापित वैश्विक पहचान पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि भारत और जर्मनी की पूरक क्षमताएं अनुसंधान को व्यावसायिक प्रौद्योगिकियों और वैश्विक स्तर के उत्पादों में परिवर्तित करने के लिए अत्यंत उपयुक्त आधार प्रदान करती हैं।
डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत के अनुसंधान एवं नवाचार तंत्र में हुए बदलावों का उल्लेख करते हुए अनुसंधान राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एएनआरएफ) की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से ऐसा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहा है, जहां अकादमिक संस्थान, अनुसंधान प्रयोगशालाएं, स्टार्टअप और उद्योग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और वैज्ञानिक उपलब्धियों को आर्थिक विकास में बदल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत वर्तमान में विश्व का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है और जैव प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य सेवा, जल प्रौद्योगिकी, स्वच्छ ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण तथा अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग के व्यापक अवसर उपलब्ध हैं।
वार्ता का प्रमुख केंद्र क्वांटम प्रौद्योगिकियां और फोटोनिक्स रहीं। दोनों पक्षों ने माना कि आने वाले दशकों में तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक सुरक्षा के लिए क्वांटम संचार, क्वांटम नेटवर्क, क्वांटम उपग्रह संचार तथा उन्नत फोटोनिक्स अत्यंत महत्वपूर्ण होंगे। इस संदर्भ में जर्मन पक्ष ने यूरोप में विकसित हो रही क्वांटम संचार अवसंरचना तथा ऑप्टिकल ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क से जुड़ी पहलों की जानकारी साझा की।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के राष्ट्रीय क्वांटम मिशन के अंतर्गत हासिल की गई उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बताया कि देश सुरक्षित क्वांटम संचार और संबंधित प्रौद्योगिकियों के विकास में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दोनों पक्षों ने क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, मानक निर्माण, प्रतिभा विकास और अनुसंधान सहयोग के नए आयामों पर विचार-विमर्श किया।
बैठक में भारत के इंडियाएआई मिशन, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और जैव प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों को भी भविष्य की तकनीकी साझेदारी के महत्वपूर्ण आधार के रूप में रेखांकित किया गया। दोनों देशों ने सहमति व्यक्त की कि इन क्षेत्रों में संयुक्त अनुसंधान और औद्योगिक सहयोग नई आर्थिक संभावनाएं पैदा कर सकते हैं।
अंतरिक्ष सहयोग भी चर्चा का प्रमुख विषय रहा। डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर (डीएलआर) के बीच लंबे समय से जारी सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है और निजी क्षेत्र तथा स्टार्टअप इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि भारत अब तक अपने प्रक्षेपण यानों के माध्यम से 11 जर्मन उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर चुका है। दोनों पक्षों ने उपग्रह संचार, ऑप्टिकल संचार, मानव अंतरिक्ष उड़ान, सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण अनुसंधान, पृथ्वी अवलोकन, ड्रोन प्रौद्योगिकी और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों में संभावित सहयोग के अवसरों पर भी विचार किया।
बैठक के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भविष्य की तकनीकी नेतृत्व क्षमता केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं होगी, बल्कि इसके लिए विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, उद्योगों और स्टार्टअप्स के बीच सशक्त साझेदारी आवश्यक होगी। दोनों पक्षों ने अनुसंधान परिणामों को व्यावहारिक उत्पादों, वैश्विक बाजारों और नवाचार-आधारित उद्यमों में बदलने के लिए सहयोगात्मक ढांचे विकसित करने की आवश्यकता पर सहमति जताई।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत-जर्मनी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र (आईजीएसटीसी) की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि इस मंच ने उद्योग-उन्मुख अनुसंधान, नवाचार साझेदारियों और वैज्ञानिक आदान-प्रदान को वर्षों से मजबूती प्रदान की है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत-जर्मनी वैज्ञानिक सहयोग का अगला चरण क्वांटम प्रौद्योगिकी, फोटोनिक्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण, अंतरिक्ष विज्ञान और डीप-टेक उद्यमिता के क्षेत्रों में अभूतपूर्व अवसर लेकर आएगा।