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युद्ध, हिंसा और क्रूरता के बीच बचपन की करुण पुकार

04 जून आक्रामकता के शिकार निर्दोष बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस –

प्रतिवर्ष 4 जून को “आक्रामकता के शिकार निर्दोष बच्चों का अंतरराष्ट्रीय दिवस” मनाया जाता है। वर्ष 1982 में यूनाइटेड नेशन ने इस दिवस की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य उन मासूम बच्चों की पीड़ा को दुनिया के सामने लाना है, जो युद्ध, आतंकवाद, हिंसा, शोषण और अमानवीय आक्रामकता का शिकार बनते हैं। यह दिवस केवल संवेदना प्रकट करने का अवसर नहीं, बल्कि मानवता के अंतर्मन को झकझोरने वाला प्रश्न भी है कि आखिर बच्चों का क्या दोष, जो वे दुनिया की क्रूरता का सबसे बड़ा मूल्य चुकाते हैं?

बचपन जीवन का सबसे सुंदर, निष्कलुष और कोमल चरण माना जाता है। यह वह समय होता है जब बच्चों के हाथों में खिलौने, आंखों में सपने और मन में उत्साह होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से विश्व के अनेक हिस्सों में लाखों बच्चे भय, विस्थापन, भूख, हिंसा और असुरक्षा के वातावरण में जीने को मजबूर हैं। कहीं युद्ध उनके घर छीन लेता है, कहीं आतंकवाद उनके माता-पिता, तो कहीं घरेलू हिंसा उनका मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास छीन लेती है।

अब जबकि दुनिया के कई संघर्ष क्षेत्रों में बच्चे सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, उनका सबसे भयावह प्रभाव मासूम जिंदगियों पर पड़ता है। बम विस्फोटों में घायल बच्चे, शरणार्थी शिविरों में पलता बचपन, भूख और भय से भरी आंखें ये केवल समाचार नहीं, बल्कि मानव सभ्यता पर गहरे प्रश्नचिह्न हैं। किसी भी युद्ध की सबसे बड़ी त्रासदी यही होती है कि वह आने वाली पीढ़ियों से उनका बचपन छीन लेता है। केवल युद्ध ही नहीं, समाज के भीतर बढ़ती आक्रामकता भी बच्चों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। घरेलू हिंसा, बाल शोषण, बाल मजदूरी, मानव तस्करी, साइबर अपराध और मानसिक उत्पीड़न जैसी समस्याएँ बच्चों की दुनिया को असुरक्षित बना रही हैं।    

आधुनिकता और तकनीकी विकास के बावजूद यदि बच्चे भयमुक्त जीवन नहीं जी पा रहे हैं, तो यह विकास अधूरा है। विशेष चिंता का विषय यह भी है कि हिंसा का प्रभाव केवल शारीरिक नहीं होता, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी बच्चों को गहरे घाव देता है। भय और असुरक्षा में पलने वाला बच्चा धीरे-धीरे आत्मविश्वास खो देता है। उसका मानसिक विकास प्रभावित होता है और कई बार वह अवसाद, आक्रोश या असामाजिक व्यवहार की ओर बढ़ने लगता है। इस प्रकार हिंसा केवल वर्तमान को नहीं, भविष्य को भी प्रभावित करती है।

भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में बच्चों की सुरक्षा के लिए कानून बनाए गए हैं। यूनिसेफ जैसी संस्थाएँ बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं। फिर भी केवल कानून पर्याप्त नहीं हैं। समाज, परिवार, विद्यालय और शासन ,सभी को मिलकर ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ प्रत्येक बच्चा सुरक्षित, सम्मानित और प्रेमपूर्ण जीवन जी सके। आज आवश्यकता केवल बच्चों को हिंसा से बचाने की नहीं, बल्कि उनके भीतर विश्वास, संवेदना और शांति के संस्कार विकसित करने की भी है। बच्चों को भय नहीं, संवाद चाहिए; दंड नहीं, स्नेह चाहिए; युद्ध नहीं, शिक्षा और अवसर चाहिए। यदि दुनिया सचमुच शांति चाहती है, तो उसे सबसे पहले बच्चों की मुस्कान बचानी होगी।

आक्रामकता के शिकार निर्दोष बच्चों का यह अंतरराष्ट्रीय दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह याद दिलाता है कि सभ्यता की वास्तविक पहचान ऊंची इमारतों या आधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बच्चों को कितना सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण दे पा रही है। जब तक दुनिया का हर बच्चा भयमुक्त होकर हँस नहीं सकेगा, तब तक मानवता का विकास अधूरा रहेगा। बच्चों की सुरक्षा केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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