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मिलावट-मुक्त भारत से ही विकसित भारत संभव

-विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस (7 जून 2026) पर विशेष-

हर वर्ष 7 जून को मनाया जाने वाला विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस केवल सुरक्षित भोजन की आवश्यकता का स्मरण कराने वाला दिवस नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य, सामाजिक कल्याण, आर्थिक समृद्धि और सतत विकास के लिए एक वैश्विक संकल्प का अवसर भी है। वर्ष 2026 की थीम ‘‘खाद्य सुरक्षा: विज्ञान की सक्रिय भूमिका’’ इस बात पर बल देती है कि विज्ञान, अनुसंधान, तकनीक और प्रभावी निगरानी प्रणालियों के माध्यम से ही सुरक्षित खाद्य व्यवस्था सुनिश्चित की जा सकती है। लेकिन विडम्बना यह है कि भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश में खाद्य पदार्थों, दवाइयों और दैनिक उपभोग की वस्तुओं में बढ़ती मिलावट इस लक्ष्य को गंभीर चुनौती दे रही है। मिलावट केवल खाद्य सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, यह राष्ट्र के स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, नैतिकता और वैश्विक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ विषय है। जिस देश को विश्वगुरु और विकसित भारत बनने का सपना है, वहां यदि दूध, घी, मावा, मसाले, अनाज, मिठाइयां, फल-सब्जियां और यहां तक कि जीवनरक्षक दवाइयां भी मिलावट की शिकार हों, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है।

भारत में मिलावट का कारोबार आज एक संगठित आर्थिक अपराध का रूप ले चुका है। दूध में डिटर्जेंट, यूरिया और सिंथेटिक रसायनों का प्रयोग, मावे में स्टार्च और रासायनिक पदार्थों की मिलावट, मसालों में रंग और धूल, शहद में चीनी सिरप, खाद्य तेलों में सस्ते तेलों का मिश्रण तथा फलों और सब्जियों को कृत्रिम रसायनों से पकाना आम बात हो गई है। बाजार में बिकने वाले अनेक उत्पाद देखने में आकर्षक होते हैं, लेकिन भीतर से विषैले सिद्ध होते हैं। स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब दवाइयों में मिलावट या नकली दवाओं का मामला सामने आता है। पिछले वर्षों में विभिन्न राज्यों में नकली अथवा घटिया दवाओं के सेवन से अनेक लोगों की मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य संकट की घटनाएं सामने आईं। राजस्थान के कोटा सहित कई स्थानों पर ऐसी खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। जब जीवन बचाने वाली दवा ही मौत का कारण बनने लगे, तब यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

मिलावट का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। कैंसर, किडनी रोग, हृदय रोग, यकृत संबंधी विकार, हार्मोन असंतुलन, बच्चों में कुपोषण, महिलाओं में स्वास्थ्य समस्याएं तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी जैसी अनेक गंभीर समस्याओं का संबंध दूषित एवं मिलावटी खाद्य पदार्थों से जुड़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार असुरक्षित भोजन के कारण हर वर्ष करोड़ों लोग बीमार पड़ते हैं। भारत में भी स्वास्थ्य पर पड़ने वाला यह बोझ लगातार बढ़ रहा है। किन्तु मिलावट का संकट केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। यह देश की अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रहार करता है। जब किसी देश के खाद्य उत्पादों की गुणवत्ता संदिग्ध हो जाती है, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। निर्यात घटता है, विदेशी निवेश प्रभावित होता है और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में देश पिछड़ जाता है। भारत कृषि उत्पादों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग का एक बड़ा केंद्र बन सकता है, लेकिन मिलावट की समस्या उसकी संभावनाओं पर ग्रहण लगा रही है।

इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि मिलावट सामाजिक मूल्यों के क्षरण का प्रतीक बनती जा रही है। कुछ लोग त्वरित लाभ और अधिक मुनाफे की लालसा में दूसरों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। यह केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत है। जब समाज में ईमानदारी और उत्तरदायित्व की भावना कमजोर पड़ती है, तब ऐसे अपराध फलने-फूलने लगते हैं। सरकारों ने समय-समय पर खाद्य सुरक्षा और मानक कानून बनाए हैं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) सहित अनेक संस्थाएं निगरानी और परीक्षण का कार्य करती हैं। फिर भी जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, निरीक्षण तंत्र की कमजोरी और कानूनी प्रक्रियाओं की धीमी गति मिलावट के विरुद्ध अभियान को प्रभावी नहीं बनने देती। अनेक मामलों में दोषियों को दंड मिलने में वर्षों लग जाते हैं, जिससे अपराधियों के हौसले बढ़ते हैं।

आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें कठोरता और पारदर्शिता के साथ लागू करने की है। खाद्य पदार्थों की नियमित जांच, आधुनिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली, त्वरित न्याय व्यवस्था और दोषियों के लिए कठोर दंड आवश्यक हैं। मिलावट को सामान्य आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के विरुद्ध गंभीर अपराध माना जाना चाहिए। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस 2026 की थीम विज्ञान की भूमिका पर जोर देती है। विज्ञान और तकनीक मिलावट के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार बन सकते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), ब्लॉकचेन आधारित आपूर्ति श्रृंखला, आधुनिक परीक्षण तकनीक, मोबाइल फूड टेस्टिंग लैब तथा उपभोक्ता जागरूकता एप्लिकेशन खाद्य सुरक्षा को नई दिशा दे सकते हैं। वैज्ञानिक निगरानी से उत्पादन से लेकर उपभोग तक हर चरण में गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकती है। लेकिन केवल सरकार या विज्ञान ही इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते। समाज और उपभोक्ताओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जागरूक नागरिकों को संदिग्ध उत्पादों की शिकायत करनी चाहिए, प्रमाणित उत्पादों का उपयोग करना चाहिए तथा स्थानीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा के प्रति जनजागरण अभियान चलाने चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों को भी इस विषय को सामाजिक आंदोलन का रूप देना होगा।

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर यदि हम वास्तव में एक विकसित, स्वस्थ और सम्मानित भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो “मिलावट-मुक्त भारत” को राष्ट्रीय अभियान बनाना होगा। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने जनभागीदारी से व्यापक परिवर्तन लाया, उसी प्रकार मिलावट के विरुद्ध भी राष्ट्रीय चेतना का निर्माण आवश्यक है। भारत की पहचान योग, आयुर्वेद, शुद्ध आहार, नैतिक जीवन-मूल्यों और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की संस्कृति से रही है। यह पहचान तभी सार्थक होगी जब हमारे भोजन, दवाइयों और उपभोग की वस्तुओं में शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो।

एक ऐसा भारत, जहां भोजन विश्वास का प्रतीक हो, जहां दवा जीवन का संरक्षण करे, जहां व्यापार नैतिकता पर आधारित हो और जहां उपभोक्ता निश्चिंत होकर बाजार से वस्तुएं खरीद सके-वही विकसित भारत का वास्तविक स्वरूप होगा। विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस हमें यह संदेश देता है कि सुरक्षित भोजन केवल स्वास्थ्य का अधिकार नहीं, बल्कि मानव गरिमा और राष्ट्रीय विकास की आधारशिला है। यदि हम आज मिलावट के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष का संकल्प लें, तो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध भारत दे सकते हैं। “शुद्ध आहार, स्वस्थ परिवार, मिलावट-मुक्त भारत, विकसित भारत का आधार”, यही 2047 के विकसित भारत की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा और यही विश्व समुदाय के समक्ष भारत को एक आदर्श राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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