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क्षमा : सबसे बड़ी शक्ति, सबसे श्रेष्ठ विजय

7 जुलाई : वैश्विक क्षमा दिवस-

     “क्षमा वीरस्य भूषणम्।”

अर्थात् क्षमा वीरों का आभूषण है। यह केवल एक संस्कृत सूक्ति नहीं, बल्कि मानव जीवन का शाश्वत सत्य है। जो व्यक्ति अपमान, कटुता और अन्याय के बाद भी विवेक, धैर्य और करुणा का परिचय देते हुए क्षमा कर सकता है, वही वास्तविक अर्थों में महान कहलाता है।

प्रतिवर्ष 7 जुलाई को वैश्विक क्षमा दिवस मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य लोगों को द्वेष, प्रतिशोध और कटुता से ऊपर उठकर प्रेम, सहिष्णुता और मानवीय संवेदनाओं को अपनाने के लिए प्रेरित करना है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि क्षमा केवल दूसरे को मुक्त नहीं करती, बल्कि स्वयं को भी मानसिक तनाव, क्रोध और पीड़ा से आज़ाद करती है।

आधुनिक समाज अब तेज़ी से बदल रहा है। रिश्तों में संवाद कम हो रहा है और अहंकार, प्रतिस्पर्धा तथा स्वार्थ बढ़ते जा रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर संबंध टूट जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और वर्षों की मित्रता समाप्त हो जाती है। ऐसे समय में क्षमा का महत्व और भी बढ़ जाता है। क्षमा वह सेतु है जो टूटे हुए रिश्तों को जोड़ सकता है और बिखरे हुए परिवारों में फिर से प्रेम का संचार कर सकता है।भारतीय संस्कृति में क्षमा को सदैव सर्वोच्च स्थान दिया गया है। भगवान श्रीराम ने कैकेयी के प्रति कोई वैर नहीं रखा।       

भगवान श्रीकृष्ण ने भी अनेक अवसरों पर क्षमा और करुणा का संदेश दिया। भगवान बुद्ध ने कहा कि “क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से और घृणा को क्षमा से जीतो।” जैन धर्म में तो “क्षमावाणी” का विशेष पर्व मनाया जाता है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से कहता है “मिच्छामि दुक्कडम्”, अर्थात यदि मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझे क्षमा करें।

महात्मा गांधी का मानना था कि “कमज़ोर कभी क्षमा नहीं कर सकता, क्षमा करना शक्तिशाली का गुण है।” वास्तव में क्षमा करना साहस का कार्य है। प्रतिशोध लेना सरल है, परंतु क्षमा करने के लिए विशाल हृदय की आवश्यकता होती है।

मनोवैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि क्षमा करने वाले लोगों में तनाव, चिंता और अवसाद की संभावना कम होती है। उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, रक्तचाप नियंत्रित रहता है और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। इस प्रकार क्षमा केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी है।

वैश्विक क्षमा दिवस केवल दूसरों को क्षमा करने का संदेश नहीं देता, बल्कि स्वयं को भी क्षमा करना सिखाता है। अनेक लोग अपनी पुरानी गलतियों का बोझ जीवनभर ढोते रहते हैं। आत्मग्लानि से मुक्त होकर नई शुरुआत करना भी क्षमा का ही एक रूप है।

आज आवश्यकता है कि हम अपने परिवार, समाज और कार्यस्थल पर संवाद, सहनशीलता और क्षमाशीलता की संस्कृति विकसित करें। यदि हम दूसरों की छोटी-छोटी भूलों को भूलना सीख जाएँ, तो जीवन अधिक सरल, सुखद और शांतिपूर्ण बन सकता है।

हम संकल्प इस वैश्विक क्षमा दिवस पर लें कि मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रखेंगे, कटुता को त्यागेंगे, टूटे हुए संबंधों को जोड़ने का प्रयास करेंगे और प्रेम, करुणा तथा क्षमा के मार्ग पर चलकर एक बेहतर समाज के निर्माण में अपना योगदान देंगे।

“क्षमा वह प्रकाश है,

जो घृणा अंधकार को मिटा देता है

 “क्षमा वह शक्ति है,

जो मनुष्य को मनुष्य से और

मानवता को ईश्वर से जोड़ देती है।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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