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आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना  का विराट उत्सव

जगन्नाथ महायात्रा- 16 जुलाई, 2026


आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारम्भ होकर दस दिनों तक चलने वाली भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, लोकआस्था, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक दर्शन का विराट उत्सव है। पुरी की यह महायात्रा हजारों वर्षों की परम्परा का जीवंत प्रतीक है, जिसमें भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं। इसी कारण इसे ‘महायात्रा’ कहा जाता है। भारत के चार धामों में प्रतिष्ठित श्री जगन्नाथ धाम की यह यात्रा देश ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व के करोड़ों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बनती है। वर्ष 2026 की रथयात्रा भी अपार श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाई जा रही है, किन्तु इस बार इसके साथ एक नया विवाद भी जुड़ गया है। देश एवं विदेश के अनेक स्थानों पर इस्कॉन द्वारा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग तिथियों पर रथयात्राएं आयोजित किए जाने पर कुछ धार्मिक एवं परम्परावादी संगठनों ने आपत्ति व्यक्त की है। उनका मत है कि जगन्नाथ रथयात्रा की तिथि वही होनी चाहिए जो पुरी श्रीमंदिर द्वारा निर्धारित होती है। दूसरी ओर इस्कॉन का तर्क है कि विदेशों में स्थानीय प्रशासन की अनुमति, सार्वजनिक अवकाश, मौसम तथा अन्य व्यावहारिक कारणों से कभी-कभी तिथि में परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। यह विवाद केवल तिथि का नहीं, बल्कि परम्परा और वैश्विक विस्तार के बीच संतुलन खोजने का विषय बन गया है।
वास्तव में यह समझना आवश्यक है कि पुरी की रथयात्रा और अन्य स्थानों पर आयोजित रथयात्राओं का स्वरूप अलग-अलग हो सकता है, किन्तु उनका मूल उद्देश्य भगवान जगन्नाथ की भक्ति, लोककल्याण और धर्मप्रचार ही है। यदि परम्परा का सम्मान बना रहे और श्रद्धा अक्षुण्ण रहे तो मतभेद संवाद के माध्यम से सुलझाए जा सकते हैं। धर्म का मूल स्वरूप जोड़ना है, विभाजन करना नहीं। पुरी का श्रीमंदिर भगवान जगन्नाथ का मुख्य धाम है। लगभग 800 वर्ष पुराने इस मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण जगन्नाथ स्वरूप में अपने बड़े भाई बलभद्र एवं बहन सुभद्रा के साथ विराजमान हैं। प्रतिवर्ष केवल एक बार तीनों देव विग्रह अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर भक्तों को दर्शन देते हैं। यही इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता है। सामान्य दिनों में जहां भगवान के दर्शन सीमित होते हैं, वहीं रथयात्रा में प्रत्येक व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के भगवान के साक्षात दर्शन कर सकता है।

यात्रा की तैयारियां अक्षय तृतीया से प्रारम्भ हो जाती हैं। उसी दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों विशाल रथों का निर्माण आरम्भ होता है। प्रत्येक वर्ष नए रथ बनाए जाते हैं। यद्यपि उनका स्वरूप और आकार सदियों से समान रहता है, फिर भी प्रत्येक वर्ष नई लकड़ी, नई सज्जा और नवीन निर्माण किया जाता है। भगवान जगन्नाथ का रथ गरुड़ध्वज (कपिलध्वज), बलभद्र का तालध्वज तथा सुभद्रा का दर्पदलन अथवा पद्मध्वज कहलाता है। इन रथों के निर्माण की प्रक्रिया केवल शिल्पकला नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना मानी जाती है। कारीगर विशेष धार्मिक नियमों का पालन करते हुए इन्हें बनाते हैं। यह परम्परा हमें यह संदेश देती है कि प्रत्येक वर्ष मनुष्य भी अपने भीतर की ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और लोभ को त्यागकर स्वयं का नव-निर्माण करे।

रथयात्रा के पीछे अनेक पौराणिक कथाएं भी जुड़ी हैं। कहा जाता है कि एक बार सुभद्रा ने द्वारका नगर देखने की इच्छा व्यक्त की। तब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उन्हें अलग रथ पर बैठाकर नगर भ्रमण कराया। उसी स्मृति में तीनों भाई-बहनों की संयुक्त रथयात्रा निकाली जाती है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान की अपूर्ण प्रतिमाओं का निर्माण स्वयं विश्वकर्मा ने किया था, जो आज भी जगन्नाथ संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस महायात्रा का एक अत्यन्त मार्मिक पक्ष यह भी है कि स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान अस्वस्थ माने जाते हैं और लगभग पन्द्रह दिनों तक सार्वजनिक दर्शन नहीं देते। इसके पश्चात वे रथों पर आरूढ़ होकर अपनी मौसी के घर गुण्डिचा मंदिर जाते हैं। वहां नौ दिनों तक विश्राम करते हैं और फिर बहुड़ा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। लौटते समय भगवान का पोडा पीठा ग्रहण करना, पंचमी को देवी लक्ष्मी का रुष्ट होकर रथ का पहिया तोड़ना तथा बाद में भगवान द्वारा उन्हें मनाने की परम्परा भक्तिभाव एवं मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण है।

पुरी की रथयात्रा का एक अन्य अद्भुत दृश्य छेरा पहरा है। गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण निर्मित झाड़ू से रथों के मार्ग की सफाई करते हैं। यह परम्परा संदेश देती है कि ईश्वर के समक्ष राजा और सामान्य व्यक्ति सभी समान हैं। सत्ता का सर्वोच्च पद भी सेवा से बड़ा नहीं हो सकता। रथयात्रा के समय जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद भी विशेष आकर्षण का केन्द्र होता है। विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोइयों में से एक इस रसोई में मिट्टी के पात्रों में प्रसाद बनाया जाता है। दाल, चावल, सब्जियाँ, मालपुआ, गजामूंग, लाई, नारियल तथा अनेक प्रकार के व्यंजन अत्यंत अल्प मूल्य पर श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराए जाते हैं। यह प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि समानता और साझेदारी का प्रतीक है।

धार्मिक ग्रन्थों में रथयात्रा का अत्यन्त महत्व बताया गया है। स्कन्द पुराण, ब्रह्म पुराण, पद्म पुराण तथा उत्कल खण्ड में भगवान जगन्नाथ की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि रथयात्रा के दर्शन एवं रथ को स्पर्श करने से अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं तथा रथ खींचने वाले को मोक्ष का अधिकारी माना गया है। यद्यपि इन मान्यताओं का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने जीवन-रथ को धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलाता है, वही वास्तविक मुक्ति प्राप्त करता है। जगन्नाथ रथयात्रा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सामाजिक समरसता है। इस अवसर पर जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र अथवा सम्प्रदाय का कोई भेद नहीं रहता। लाखों श्रद्धालु एक साथ रथ की रस्सी खींचते हैं। यही वह क्षण होता है जब धर्म केवल पूजा-पद्धति न रहकर सामाजिक एकता का उत्सव बन जाता है।
आज यह यात्रा केवल पुरी तक सीमित नहीं रही। भारत के लगभग सभी प्रमुख नगरों सहित अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और अनेक यूरोपीय देशों में भी जगन्नाथ रथयात्रा आयोजित होती है। विशेष रूप से इस्कॉन ने इस परम्परा को वैश्विक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। करोड़ों विदेशी भक्तों ने इसी माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण एवं जगन्नाथ संस्कृति को जाना है। इसलिए यदि कहीं तिथियों को लेकर व्यावहारिक परिवर्तन भी किए जाएँ तो उनके पीछे धार्मिक अवमानना नहीं, बल्कि स्थानीय व्यवस्थाओं की विवशता भी हो सकती है। फिर भी यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जहाँ तक सम्भव हो, श्रीमंदिर की परम्परा और निर्धारित तिथि का सम्मान किया जाए, ताकि सम्पूर्ण विश्व में एकात्मता का संदेश और अधिक सुदृढ़ हो।

दार्शनिक दृष्टि से रथ मनुष्य के शरीर का, भगवान आत्मा का तथा रथ को खींचने वाली रस्सियाँ समाज और लोकशक्ति का प्रतीक हैं। आत्मा तभी सार्थक होती है जब समाज सहयोग करे और समाज तभी श्रेष्ठ बनता है जब उसके केन्द्र में ईश्वर, नैतिकता और आत्मशुद्धि का भाव हो। यही कारण है कि जगन्नाथ रथयात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मविशुद्धि, लोकमंगल, समरसता, सेवा और आध्यात्मिक जागरण का अनुपम पर्व है। वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और धार्मिक विभाजनों से गुजर रहा है, तब भगवान जगन्नाथ की यह महायात्रा हमें स्मरण कराती है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य विवाद नहीं, बल्कि संवाद है। वर्चस्व नहीं, बल्कि समन्वय है और बाहरी आडम्बर नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता है। यही इस महायात्रा का सनातन संदेश है कि जीवन का रथ तभी सही दिशा में चलता है जब उसमें श्रद्धा, सेवा, समरसता, आत्मसंयम और लोककल्याण के पहिए समान गति से चलते रहें। यही जगन्नाथ महायात्रा की शाश्वत महिमा है और यही इसकी वैश्विक प्रासंगिकता।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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