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न्याय : सभ्यता का आधार और मानवता का सार्वभौमिक सत्य

17 जुलाई : अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस पर विशेष

          “जहाँ न्याय नहीं, वहाँ शांति नहीं; और जहाँ शांति नहीं, वहाँ सभ्यता का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाता है।” मानव सभ्यता के विकास का सम्पूर्ण इतिहास न्याय की खोज का इतिहास है। आदिम समाज से लेकर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं तक मनुष्य ने सदैव ऐसे तंत्र की स्थापना का प्रयास किया है जो सत्य, समानता और अधिकारों की रक्षा कर सके। न्याय केवल कानून की पुस्तकों में लिखा हुआ शब्द नहीं है, बल्कि वह समाज की आत्मा, मानव गरिमा का रक्षक और सभ्यता की आधारशिला है। इसी भावना को सशक्त बनाने के लिए प्रतिवर्ष 17 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस मनाया जाता है।

             यह दिवस केवल न्यायपालिका या विधि विशेषज्ञों का उत्सव नहीं है, बल्कि उन सभी लोगों के संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है जो मानवाधिकारों, शांति, समानता और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था में विश्वास रखते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि न्याय किसी देश, धर्म, जाति या सीमा का विषय नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता का सार्वभौमिक अधिकार है।

           17 जुलाई 1998 को इटली की राजधानी रोम में एक ऐतिहासिक संधि को स्वीकार किया गया, जिसे “रोम संविधि” (Rome Statute) कहा जाता है। इसी संधि ने आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। वर्ष 2002 में यह न्यायालय औपचारिक रूप से अस्तित्व में आया और दुनिया का पहला स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय बना। आज विश्व के अनेक देशों ने रोम संविधि को स्वीकार किया है और अंतरराष्ट्रीय अपराधों के विरुद्ध सामूहिक न्याय व्यवस्था को समर्थन दिया है। इस ऐतिहासिक उपलब्धि की स्मृति में प्रतिवर्ष 17 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस मनाया जाता है।

          वर्तमान युग में अपराधों का स्वरूप सीमाओं से परे हो चुका है। नरसंहार, युद्ध अपराध, मानवता के विरुद्ध अपराध, जातीय हिंसा, आतंकवाद और बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन केवल किसी एक देश की समस्या नहीं रह गए हैं। ऐसे अपराध पूरी मानवता को प्रभावित करते हैं। इसीलिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की आवश्यकता महसूस की गई, ताकि ऐसे अपराधों के दोषियों को न्याय के कटघरे में खड़ा किया जा सके, चाहे वे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि कानून के समक्ष सभी समान हैं और कोई भी व्यक्ति न्याय से ऊपर नहीं हो सकता।

           अंतरराष्ट्रीय अपराधिक न्यायालय का मुख्य उद्देश्य उन व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई करना है जिन पर निम्न गंभीर अपराधों के आरोप हों -नरसंहार मानवता के विरुद्ध अपराध युद्ध अपराध  आक्रामकता का अपराध यह न्यायालय किसी देश की राष्ट्रीय न्यायपालिका का स्थान नहीं लेता, बल्कि तब हस्तक्षेप करता है जब संबंधित देश स्वयं निष्पक्ष जांच या मुकदमा चलाने में असमर्थ अथवा अनिच्छुक दिखाई देता है। इसलिए इसे “अंतिम उपाय का न्यायालय” भी कहा जाता है।

          न्याय का संबंध केवल अपराधियों को दंड देने से नहीं है। इसका उद्देश्य पीड़ितों की गरिमा की रक्षा करना, उनके अधिकारों को पुनर्स्थापित करना और समाज में विश्वास कायम करना भी है। जब किसी पीड़ित को न्याय मिलता है तो केवल एक व्यक्ति संतुष्ट नहीं होता, बल्कि समाज में कानून के प्रति विश्वास मजबूत होता है। वहीं न्याय में देरी या अन्याय की भावना सामाजिक असंतोष और अस्थिरता को जन्म देती है।

विश्व के अनेक देशों में आज भी लाखों लोग भेदभाव, हिंसा, शोषण और उत्पीड़न का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था मानवाधिकारों की रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है। इक्कीसवीं सदी में न्याय व्यवस्था के सामने नई चुनौतियाँ उभर रही हैं। साइबर अपराध, ऑनलाइन धोखाधड़ी, डिजिटल शोषण, डेटा चोरी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का दुरुपयोग और अंतरराष्ट्रीय साइबर हमले आधुनिक विश्व की गंभीर समस्याएँ बन चुके हैं।

           डिजिटल तकनीक ने जहाँ विकास के नए अवसर प्रदान किए हैं, वहीं अपराधियों को भी नए साधन उपलब्ध कराए हैं। इसलिए न्याय की अवधारणा को समयानुकूल बनाना आवश्यक है। आज केवल भौतिक अपराधों पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल अपराधों पर भी वैश्विक स्तर पर प्रभावी नियंत्रण की आवश्यकता है।भारतीय संस्कृति में न्याय का विचार अत्यंत प्राचीन है। वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत और अन्य ग्रंथों में धर्म और न्याय को सामाजिक व्यवस्था का आधार माना गया है।

           राजा हरिश्चंद्र, भगवान राम और युधिष्ठिर जैसे चरित्र सत्य और न्याय के आदर्श प्रतीक माने जाते हैं। भारतीय दर्शन में न्याय केवल विधिक व्यवस्था नहीं, बल्कि नैतिकता और धर्म का भी अंग है। महात्मा गांधी ने कहा था – “सत्य और न्याय अंततः विजयी होते हैं।”यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।

         न्याय केवल न्यायालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। परिवार, समाज, विद्यालय, कार्यस्थल और शासन हर स्तर पर न्यायपूर्ण व्यवहार आवश्यक है। जब हम जाति, धर्म, लिंग, भाषा या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव नहीं करते, तब हम न्याय की स्थापना में योगदान देते हैं। जब हम किसी कमजोर, वंचित या पीड़ित व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करते हैं, तब हम न्याय के वास्तविक अर्थ को सार्थक करते हैं।

           अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की नैतिक आत्मा है। न्याय ही शांति का आधार है, न्याय ही स्वतंत्रता का संरक्षक है और न्याय ही मानव गरिमा की अंतिम सुरक्षा है। आज जब विश्व अनेक संघर्षों, युद्धों, असमानताओं और नई चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब न्याय की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। एक न्यायपूर्ण विश्व ही सुरक्षित, समतामूलक और शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण कर सकता है। इस अंतरराष्ट्रीय न्याय दिवस पर हम सत्य, समानता, मानवाधिकार और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए अपना योगदान देने का संकल्प लें।

न्याय जहाँ हो दीप समान,

वहीं सुरक्षित होता इंसान।

सत्य जहाँ निर्भय मुस्काता,

वहीं सभ्यता सिर उठाती।

अन्याय के तम को हरना है,

न्याय से जग को भरना है॥

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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