मधुर मुक्त आभा है सुरभित पवन,
प्रेम ही प्रेम का हो रहा है सृजन।
हैं नहला रहीं हर कली को तुषारें,
प्रेम ही प्रेम का हो रहा है जतन।
गगन से प्राची की पहली किरण का,
लहर से हो रहा है प्रथम आचमन।
बढ़ रही ज्यों प्रेम की अरुण लाली,
लगता है हो रहा स्नेह पूरित हवन।
प्रेम है त्रिवेणी की निर्मल प्रीति धारा,
प्रेम जल का हो रहा है संगम में अर्पण।
प्रेम ही सत्य स्नेह की दीपित है ज्योति,
प्रेम का हो रहा है सम्पूर्ण समर्पण।
प्रेम ही है अंतर्मन का सुखद वृंदावन,
नयन का नयन से हो रहा है निवेदन।
प्रेम ही है कन्हैया प्रेम ही है राधा,
प्रेम की पूर्णता का हो रहा है दर्शन।
प्रेम है पवित्र पावन प्रेम ही है साधना,
प्रेम से इष्ट का हो रहा है आराधन !!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

