विश्व राजनीति में शक्ति केवल सैन्य क्षमता या आर्थिक आकार से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि कोई महाशक्ति अपने प्रभाव का इस्तेमाल किस प्रकार करती है। आज अमेरिका की व्यापार एवं प्रतिबंध नीति इसी कसौटी पर बहस के केंद्र में है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंधों को विदेश नीति के प्रमुख उपकरणों के रूप में अधिक आक्रामक ढंग से इस्तेमाल किया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित 100 प्रतिशत तक टैरिफ का अधिकार देने वाला नया अमेरिकी विधेयक इसी बदलते रुख का ताजा उदाहरण है, लेकिन इस नये बिल के जरिये वह भारत पर दबाव नहीं बना सकता। भारत को इससे डरने की अपेक्षा नहीं है, क्योंकि नई बन रही विश्व-संरचना में यह बिल अधिक प्रभावी नहीं बन सकेगा। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को यह विधेयक पारित किया है, लेकिन यह समझना जरूरी है कि 100 प्रतिशत टैरिफ स्वतः लागू नहीं हुआ है, विधेयक राष्ट्रपति को ऐसा शुल्क लगाने का अधिकार देता है। भारत के संदर्भ में यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस भारत के ऊर्जा आयात का प्रमुख स्रोत बना हुआ है। अगस्त 2026 में भारत रूस से लगभग 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात कर रहा था। ऐसे में यदि अमेरिकी राष्ट्रपति इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं, तो इसका सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ सकता है और साथ ही भारत की ऊर्जा लागत पर भी दबाव बन सकता है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।
यहीं से असली सवाल उठता है-क्या व्यापारिक टैरिफ अब केवल व्यापार संतुलन सुधारने का साधन रह गए हैं या वे विदेश नीति को मनवाने का माध्यम भी बनते जा रहे हैं? अमेरिका और भारत के बीच व्यापार छोटा नहीं है। 2025 में दोनों देशों का वस्तु एवं सेवा व्यापार लगभग 239.6 अरब डॉलर रहा और अमेरिकी आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ने भारत से 103.8 अरब डॉलर की वस्तुएं आयात की। इसलिए किसी बड़े अतिरिक्त टैरिफ का असर केवल भारत पर नहीं पड़ेगा, अमेरिकी आयातकों, उपभोक्ताओं और दोनों देशों की कंपनियों पर भी उसका प्रभाव पड़ सकता है। भारत के लिए चुनौती दोहरी है। पहली चुनौती अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने की है और दूसरी ऊर्जा सुरक्षा की। यदि रूसी तेल पर निर्भरता अचानक घटानी पड़े तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में पहले से मौजूद अस्थिरता ऐसी स्थिति को और जटिल बना सकती है। दूसरी ओर अमेरिका को भी यह देखना होगा कि अत्यधिक टैरिफ से वैश्विक तेल आपूर्ति, कीमतों और अपने सहयोगी देशों के साथ आर्थिक संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ता है। इसीलिए मौजूदा कानून में राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रीय हित के आधार पर छूट की गुंजाइश भी रखी गई है।
भारत की प्रतिक्रिया का महत्व यहीं बढ़ जाता है। भारत ने न तो किसी शक्ति-गुट के साथ अपने संबंध समाप्त करने की नीति अपनाई है और न ही अपने आर्थिक हितों को किसी एक देश की प्राथमिकताओं के अधीन करने की बात कही है। भारत का घोषित दृष्टिकोण ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, राष्ट्रीय हितों की रक्षा और सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखना है। यही रणनीतिक स्वायत्तता बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी बन सकती है। इसी संदर्भ में नई दिल्ली में हाल में संपन्न 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को देखना उपयोगी होगा। भारत की अध्यक्षता में हुए सम्मेलन में 11 सदस्य देशों ने 140-बिंदु नई दिल्ली घोषणा को स्वीकार किया। ब्रिक्स ने सीमा-पार भुगतान को अधिक सुगम बनाने तथा सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं में व्यापारिक निपटान की संभावनाओं पर आगे काम करने का समर्थन किया। साथ ही भारत ने स्पष्ट किया कि फिलहाल किसी साझा ब्रिक्स मुद्रा का प्रस्ताव नहीं है। यह अंतर समझना बेहद जरूरी है। दुनिया तत्काल डॉलर को हटाकर कोई नई वैश्विक मुद्रा स्थापित करने की स्थिति में नहीं है। डॉलर अभी भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में अत्यंत प्रभावशाली है। लेकिन यदि अनेक देश धीरे-धीरे द्विपक्षीय व्यापार में अपनी-अपनी मुद्राओं का उपयोग बढ़ाते हैं, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां विकसित करते हैं और डॉलर पर निर्भरता कम करने के रास्ते तलाशते हैं, तो लंबे समय में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय हो सकती है। विशेषज्ञ विश्लेषण भी यही संकेत देता है कि डॉलर से दूरी की प्रक्रिया अभी धीमी और क्रमिक है, न कि कोई तत्काल बदलाव।

भारत-रूस संबंध इसका एक व्यावहारिक उदाहरण हैं। सितंबर 2026 में रूसी पक्ष ने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार का बड़ा हिस्सा अब रुपये और रूबल में निपटाया जा रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रतिबंधों और भुगतान संबंधी बाधाओं के बीच वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं। ब्रिक्स की दिशा को इसलिए अमेरिका-विरोधी संगठन के रूप में देखना भी सही नहीं होगा। नई दिल्ली घोषणा का मूल जोर आर्थिक सहयोग, व्यापार, भुगतान व्यवस्था, विकास और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर है। भारत के लिए इसका महत्व इस बात में है कि वह पश्चिम और गैर-पश्चिम दोनों आर्थिक शक्तियों के साथ संवाद रखते हुए अपने लिए अधिक विकल्प तैयार कर सके। 2025-26 में भारत का ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार 417 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान भी इस समूह के बढ़ते आर्थिक महत्व को दर्शाता है।
अमेरिका की वर्तमान नीति का सबसे गंभीर प्रभाव शायद टैरिफ से भी आगे जाकर विश्वास और नीति-पूर्वानुमेयता पर पड़ सकता है। जब व्यापारिक शुल्क बार-बार विदेश नीति के दबाव के साधन के रूप में इस्तेमाल होते हैं, तो अन्य देश स्वाभाविक रूप से वैकल्पिक बाजार, वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएं और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां खोजने लगते हैं। यह प्रक्रिया अमेरिका को तत्काल कमजोर कर देगी, ऐसा कहना जल्दबाजी होगीय लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि ऐसी नीतियां दूसरे देशों को जोखिम कम करने के लिए नए विकल्प तलाशने का प्रोत्साहन देती हैं। भारत के लिए यह समय प्रतिक्रिया की राजनीति से आगे बढ़कर रणनीतिक तैयारी का है। अमेरिकी बाजार भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए व्यापार वार्ता और संवाद के रास्ते खुले रखना आवश्यक है। साथ ही यूरोप, पश्चिम एशिया, अफ्रीका, आसियान, रूस और ब्रिक्स देशों में बाजारों का विस्तार, घरेलू विनिर्माण को मजबूत करना, निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण भी उतना ही जरूरी है। भारत की ताकत किसी एक ध्रुव से दूरी बनाने में नहीं, बल्कि अनेक धु्रवों के बीच अपने हितों के लिए पर्याप्त विकल्प बनाए रखने में है।
आज की दुनिया 1990 के दशक जैसी एकधु्रवीय व्यवस्था नहीं रही। चीन का आर्थिक विस्तार, भारत का बढ़ता बाजार, रूस की ऊर्जा क्षमता, पश्चिम एशिया की रणनीतिक भूमिका और ग्लोबल साउथ की बढ़ती सामूहिक आवाज विश्व व्यवस्था को नया आकार दे रही है। ऐसे समय में किसी भी महाशक्ति के लिए दूसरे देशों पर लगातार दबाव डालकर अपनी प्राथमिकताएं मनवाना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है। भारत की हालिया ब्रिक्स अध्यक्षता ने यह संदेश जरूर दिया है कि भारत टकराव के बजाय संवाद, सहयोग और बहुपक्षीय विकल्पों को महत्व देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने जिन आर्थिक और कूटनीतिक मंचों पर अपनी भूमिका बढ़ाई है, उनका वास्तविक मूल्य तभी सामने आएगा जब भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए सभी प्रमुख शक्तियों से संतुलित संबंध बनाए रखे।
अमेरिका के लिए भी यह समय आत्ममंथन का है। उसकी आर्थिक शक्ति, डॉलर की वैश्विक भूमिका, तकनीकी क्षमता और रणनीतिक गठबंधन आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन्हीं शक्तियों की दीर्घकालीन प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उनका उपयोग साझेदारी और भरोसा बनाने के लिए कितना किया जाता है। यदि टैरिफ, प्रतिबंध और दबाव कूटनीति का सामान्य माध्यम बनते गए, तो दुनिया के दूसरे देश अपने लिए वैकल्पिक रास्ते खोजेंगे। और यही शायद बदलती विश्व व्यवस्था का सबसे बड़ा संकेत है-दुनिया अमेरिका से अलग होने की घोषणा नहीं कर रही, लेकिन वह अमेरिका पर निर्भरता के विकल्प जरूर तलाश रही है। भारत के सामने इसलिए चुनौती केवल अमेरिकी टैरिफ की नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह और अधिक मजबूत करने की है। यदि भारत ऊर्जा सुरक्षा, निर्यात विविधीकरण, तकनीकी आत्मनिर्भरता और बहुपक्षीय सहयोग को साथ लेकर चलता है, तो किसी भी बाहरी दबाव का सामना करने की उसकी क्षमता बढ़ेगी। यही दृढ़ता भारत की विदेश नीति को अधिक स्वायत्त और विश्व व्यवस्था को अधिक संतुलित बनाने में योगदान दे सकती है।

लेखक, पत्रकार, स्तंभकार