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उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र

संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया।
संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं।

इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है।

यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है।
अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है।

आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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