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फिफ्थ स्पेस : शिक्षा को जिम्मेदारी, संवेदना और डिजिटल विवेक से जोड़ने की पहल

नई दिल्ली। तेजी से बदलती तकनीक, बदलते सामाजिक व्यवहार और शिक्षा के निरंतर विकसित होते स्वरूप के बीच यह प्रश्न पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है कि बच्चों और युवाओं को केवल ज्ञान और प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाए या उन्हें जिम्मेदार, संवेदनशील और विवेकशील नागरिक बनने की दिशा में भी सक्षम बनाया जाए। इसी व्यापक विचार को केंद्र में रखते हुए नई दिल्ली स्थित डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में ‘द फिफ्थ स्पेस – व्हेयर एजुकेशन मीट्स रिस्पॉन्सिबिलिटी’ कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने स्कूली छात्रों से संवाद करते हुए कहा कि युवा पीढ़ी को समझने के लिए केवल उनके व्यवहार को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी चिंताओं, आकांक्षाओं, असुरक्षाओं और बदलती परिस्थितियों को समझने की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि बच्चों और युवाओं के लिए ऐसा वातावरण तैयार किया जाना चाहिए, जहां वे बिना संकोच अपने विचार, प्रश्न और समस्याएं साझा कर सकें।

कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय महिला आयोग ने डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर, यूनेस्को नई दिल्ली और माउंट आबू पब्लिक स्कूल के सहयोग से किया। इसमें शिक्षा, बाल अधिकार, डिजिटल जिम्मेदारी, लैंगिक समानता, मानवीय गरिमा और जिम्मेदार नागरिकता जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।

तकनीक की आलोचना नहीं, समझ के साथ संवाद जरूरी

डॉ. वीरेंद्र कुमार ने वर्तमान डिजिटल परिवेश का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी ऐसे समय में बड़ी हो रही है, जहां तकनीक उसके अध्ययन, संवाद, मनोरंजन और सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में अभिभावकों, शिक्षकों और संस्थानों के लिए यह जरूरी है कि वे तकनीक के इस्तेमाल को केवल संदेह या आलोचना की दृष्टि से न देखें, बल्कि युवाओं के साथ संवाद स्थापित करते हुए उसके अवसरों और चुनौतियों को समझें।

डिजिटल माध्यम बच्चों के लिए ज्ञान और अवसरों के नए द्वार खोलते हैं, लेकिन इनके साथ साइबर सुरक्षा, डिजिटल शिष्टाचार, निजता, गलत सूचना, ऑनलाइन दबाव और अनुचित सामग्री जैसी चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। इसलिए तकनीक से दूरी बनाने के बजाय उसके जिम्मेदार उपयोग की समझ विकसित करना समय की आवश्यकता है।

यह दृष्टिकोण शिक्षा की उस पारंपरिक धारणा से आगे जाता है, जिसमें विद्यालय को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा परिणाम प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। आधुनिक शिक्षा को बच्चे के व्यक्तित्व, उसके सामाजिक व्यवहार, निर्णय क्षमता और नैतिक विवेक के विकास से भी जोड़ना होगा।

संवाद से कम हो सकता है पीढ़ियों का अंतर

कार्यक्रम के दौरान छात्रों के साथ सीधे संवाद को विशेष महत्व दिया गया। विद्यार्थियों को केंद्रीय मंत्री के सामने प्रश्न रखने और अपने दृष्टिकोण साझा करने का अवसर मिला। इस तरह का प्रत्यक्ष संवाद शिक्षा व्यवस्था में विश्वास और सहभागिता की भावना को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

बच्चों और युवाओं के सामने आने वाली कई समस्याएं ऐसी होती हैं, जिन्हें वे परिवार या विद्यालय में खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। परीक्षा का दबाव, भविष्य को लेकर असमंजस, सामाजिक अपेक्षाएं, डिजिटल दुनिया का प्रभाव, मित्रों का दबाव और अपनी पहचान से जुड़े प्रश्न किशोरावस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में संवाद का अभाव समस्या को और जटिल बना सकता है।

डॉ. कुमार ने छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच मजबूत भावनात्मक संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट था कि जब बच्चे कठिन परिस्थितियों से गुजरें तो उन्हें केवल निर्देश देने वाला नहीं, बल्कि सुनने और समझने वाला सहारा भी उपलब्ध होना चाहिए।

हर बच्चे की अपनी क्षमता और आकांक्षा

कार्यक्रम में प्रत्येक बच्चे की व्यक्तिगत क्षमता और आकांक्षाओं को पहचानने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। शिक्षा में अक्सर सभी विद्यार्थियों को एक समान मानकर उनकी सफलता का आकलन कुछ निर्धारित मानकों से किया जाता है। लेकिन प्रत्येक बच्चे की रुचि, क्षमता, सीखने की गति, पारिवारिक परिस्थिति और भविष्य की आकांक्षा अलग हो सकती है।

ऐसे में शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना नहीं होना चाहिए। बच्चों को अपनी क्षमता पहचानने, अपनी कमजोरियों को समझने और अपनी रुचियों के अनुरूप आगे बढ़ने का अवसर मिलना भी उतना ही आवश्यक है।

डॉ. वीरेंद्र कुमार ने केवल चीजों को देखने के बजाय उन्हें गहराई से और सार्थक रूप से समझने की आवश्यकता पर बल देते हुए दृष्टि से अंतर्दृष्टि की ओर बढ़ने की बात कही। यह विचार शिक्षा को सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया से आगे ले जाकर समझ, विवेक और चिंतन की प्रक्रिया से जोड़ता है।

क्या है ‘फिफ्थ स्पेस’ की अवधारणा

‘द फिफ्थ स्पेस’ की अवधारणा कार्यक्रम का केंद्रीय विचार रही। इसमें घर, स्कूल, संस्कृति, समाज, नागरिकता, ज्ञान और डिजिटल दुनिया जैसे विभिन्न प्रभाव क्षेत्रों के बीच संबंध को समझने का प्रयास किया गया।

आज बच्चे का व्यक्तित्व केवल परिवार और विद्यालय से निर्मित नहीं होता। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन समुदाय और वैश्विक सूचनाएं भी उसके विचारों और व्यवहार को प्रभावित करती हैं। इसलिए शिक्षा की चर्चा करते समय डिजिटल दुनिया को अलग करके नहीं देखा जा सकता।

इसी संदर्भ में ‘फिफ्थ स्पेस’ एक ऐसे व्यापक सामाजिक और शैक्षिक परिवेश की ओर संकेत करता है, जिसमें बच्चे के विकास से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों को परस्पर जोड़ा जाता है। इसका उद्देश्य शिक्षा और जीवन के बीच उस दूरी को कम करना है, जो कई बार औपचारिक शिक्षा और वास्तविक सामाजिक अनुभवों के बीच दिखाई देती है।

डिजिटल युग में नैतिकता और जिम्मेदारी

तकनीक का विस्तार जितना तेज हुआ है, उतना ही आवश्यक डिजिटल जिम्मेदारी का प्रश्न भी सामने आया है। बच्चों को इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल सिखाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि डिजिटल माध्यमों पर किसी सूचना को साझा करने से पहले उसकी विश्वसनीयता कैसे जांची जाए, किसी व्यक्ति की निजता का सम्मान क्यों आवश्यक है और ऑनलाइन व्यवहार में भी वही मानवीय गरिमा क्यों लागू होती है जो वास्तविक जीवन में होती है।

डिजिटल दुनिया में निर्णय लेने की क्षमता महत्वपूर्ण है। एक गलत क्लिक, गलत सूचना का प्रसार या असावधानी से साझा की गई निजी जानकारी लंबे समय तक प्रभाव डाल सकती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता को केवल तकनीकी दक्षता तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें नैतिकता, जिम्मेदारी, विवेक और सामाजिक संवेदनशीलता को भी शामिल करना होगा।

बाल अधिकार और सुरक्षा पर व्यापक चर्चा

कार्यक्रम में बाल अधिकारों और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को भी प्रमुखता मिली। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य सचिव डॉ. संजीव शर्मा सहित विभिन्न वक्ताओं ने बच्चों के अधिकार, सुरक्षा, महिला-पुरुष समानता, मानवीय गरिमा, डिजिटल जिम्मेदारी और जिम्मेदार नागरिकता जैसे विषयों पर विचार रखे।

बाल अधिकारों की रक्षा केवल कानून और संस्थागत व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय, समुदाय और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े सभी पक्षों की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। बच्चे को अपने अधिकारों की जानकारी होने के साथ-साथ यह भी पता होना चाहिए कि किसी कठिन परिस्थिति में वह सहायता और शिकायत के लिए कहां संपर्क कर सकता है।

इसी प्रकार विद्यालयों में सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण का निर्माण भी शिक्षा की गुणवत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी भी बच्चे को अपनी पहचान, लिंग, सामाजिक पृष्ठभूमि या व्यक्तिगत क्षमता के कारण असमान व्यवहार का सामना न करना पड़े, इसके लिए संवेदनशील शैक्षिक वातावरण आवश्यक है।

शिक्षा का लक्ष्य केवल परीक्षा परिणाम नहीं

‘फिफ्थ स्पेस’ कार्यक्रम से निकलने वाला एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि शिक्षा को केवल अंक, परीक्षा और रोजगार की तैयारी तक सीमित नहीं किया जा सकता। शिक्षा का व्यापक उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना है जो ज्ञान के साथ विवेक रखते हों, अधिकारों के साथ जिम्मेदारियों को समझते हों और सफलता के साथ समाज के प्रति अपनी भूमिका को भी पहचानते हों।

देश के युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं; वे वर्तमान सामाजिक परिवर्तन के भी सक्रिय सहभागी हैं। इसलिए उनमें प्रश्न पूछने, असहमति व्यक्त करने, तथ्य समझने, तर्क करने और जिम्मेदार निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

डॉ. कुमार ने छात्रों को देश के भविष्य को आकार देने में अपनी भूमिका के प्रति जागरूक, उत्सुक और जिम्मेदार रहने के लिए प्रोत्साहित किया। यह संदेश उस व्यापक विचार को रेखांकित करता है कि नागरिकता की भावना विद्यालयी शिक्षा के साथ ही विकसित होनी चाहिए।

अभिभावकों और शिक्षकों की बदलती भूमिका

डिजिटल युग में अभिभावक और शिक्षक दोनों की भूमिका भी बदल रही है। पहले बच्चों के सूचना स्रोत सीमित थे और उनके व्यवहार को समझना अपेक्षाकृत सरल था। आज बच्चे वैश्विक सूचनाओं और विविध डिजिटल समुदायों से प्रभावित होते हैं। ऐसे में केवल नियंत्रण और प्रतिबंध हमेशा प्रभावी समाधान नहीं हो सकते।

बच्चों के साथ नियमित संवाद, उनकी ऑनलाइन गतिविधियों के प्रति जागरूकता, विश्वास का वातावरण और समस्याओं को सुनने की आदत अधिक प्रभावी रास्ता हो सकती है। शिक्षक भी केवल विषय विशेषज्ञ नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक की भूमिका निभा सकते हैं।

इस दृष्टि से विद्यालय और परिवार के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। यदि बच्चा घर और विद्यालय में परस्पर विरोधी संदेश प्राप्त करता है, तो उसके लिए सही निर्णय लेना कठिन हो सकता है। इसलिए शिक्षा, परिवार और सामाजिक परिवेश के बीच संवाद को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।

सम्मानजनक नागरिकता की ओर शिक्षा

कार्यक्रम का व्यापक संदेश यही रहा कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जिम्मेदार और सम्मानजनक नागरिकता का निर्माण भी है। एक शिक्षित समाज वही है जहां व्यक्ति अपने अधिकारों को समझने के साथ दूसरों के अधिकारों और गरिमा का भी सम्मान करता है।

आज भारत युवा आबादी वाला देश है। इस युवा शक्ति को सही दिशा देने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ भावनात्मक समर्थन, सामाजिक संवेदनशीलता, डिजिटल विवेक और नागरिक जिम्मेदारी की समझ विकसित करना आवश्यक है।

‘द फिफ्थ स्पेस’ इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने रखता है। घर, विद्यालय, समाज और डिजिटल दुनिया के बीच बेहतर संबंध स्थापित किए बिना आधुनिक शिक्षा को पूरी तरह प्रभावी बनाना कठिन होगा। यदि बच्चों को प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता, अपनी बात रखने का अवसर, असफल होने पर सीखने की जगह और कठिन परिस्थितियों में भरोसेमंद मार्गदर्शन मिले, तो शिक्षा उनके व्यक्तित्व को कहीं अधिक व्यापक रूप से विकसित कर सकती है।

कार्यक्रम में माउंट आबू पब्लिक स्कूल की प्रधानाचार्या डॉ. ज्योति अरोड़ा और राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष सुश्री विजया किशोर राहत सहित अनेक प्रतिष्ठित प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस विषय की संस्थागत महत्ता को भी रेखांकित किया।

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