NEW English Version

वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं या हमारी संवेदनाएं घट रही हैं ?

माता-पिता को बोझ समझने वाली पीढ़ी से बड़ा प्रश्न..हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं ?

समसामयिक ज्वलंत मुद्दा

कभी भारत में घर की सबसे सुरक्षित जगह माता-पिता की गोद हुआ करती थी। वृद्ध माता-पिता परिवार की कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभव, संस्कार और आशीर्वाद की सबसे बड़ी पूंजी माने जाते थे। घर में दादा-दादी हों तो बच्चों के लिए वे कहानी, संस्कार और जीवन का पहला विद्यालय होते थे। लेकिन आज बदलते सामाजिक परिवेश में एक ऐसा दृश्य सामने आ रहा है, जो सभ्य समाज की आत्मा को भीतर तक झकझोर देता है ..वही माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों के भविष्य के लिए अपना वर्तमान खपा दिया, जीवन की संध्या में उन्हीं बच्चों से दूर कर दिए जाते हैं। सवाल यह नहीं है कि वृद्धाश्रम क्यों हैं। सवाल इससे कहीं बड़ा है ऐसी परिस्थितियां क्यों पैदा हो रही हैं कि माता-पिता को वृद्धाश्रम की आवश्यकता पड़ रही है?

भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और उम्रदराज आबादी के साथ उनके स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, आर्थिक सहारे और पारिवारिक देखभाल की चुनौती भी बढ़ रही है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की India Ageing Report 2023 ने भी भारत में बढ़ती वृद्ध आबादी और उसके सामने मौजूद सामाजिक- आर्थिक तथा देखभाल संबंधी चुनौतियों को रेखांकित किया है।

          जिसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी का हाथ क्यों छूट गया? जरा उस मां की कल्पना कीजिए, जिसने अपने बच्चे के लिए रातों की नींद गंवाई। बच्चे को बुखार आया तो वह पूरी रात उसके सिरहाने बैठी रही। फीस भरने के लिए उसने अपनी जरूरतें रोकीं। अच्छे कपड़े बच्चे के लिए खरीदे और अपने पुराने कपड़ों से काम चलाया। उस पिता को याद कीजिए जिसने अपनी इच्छाएं इसलिए स्थगित कर दीं कि बेटे की पढ़ाई पूरी हो जाए। जिसने खेत बेचा, कर्ज लिया, अतिरिक्त काम किया, लेकिन बच्चे को डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी या सफल व्यवसायी बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी।  बच्चा बड़ा हुआ। विदेश चला गया। महानगर में बस गया। बड़ी नौकरी मिल गई। आलीशान मकान बन गया। बैंक बैलेंस बढ़ गया। लेकिन उसी मकान में मां-बाप के लिए जगह नहीं बची! क्या विडंबना है कि जिस बच्चे के लिए माता-पिता ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, वही बच्चा जीवन की संध्या में माता-पिता के लिए कुछ वर्ष निकालने में असमर्थ हो जाता है।

कुत्तों के लिए लग्जरी, माता-पिता के लिए जगह नहीं! समाज के बदलते चेहरे का इससे बड़ा व्यंग्य और क्या होगा कि कुछ लोग अपने पालतू कुत्तों के लिए वातानुकूलित कमरे, महंगे बिस्तर, विशेष भोजन, महंगी गाड़ियां और अत्याधुनिक सुविधाएं जुटाते हैं। उनके जन्मदिन मनाए जाते हैं, उन्हें परिवार का सदस्य कहा जाता है और सोशल मीडिया पर उनके साथ तस्वीरें साझा की जाती हैं। पालतू पशुओं से प्रेम करना गलत नहीं है। पशु-प्रेम मनुष्य की संवेदनशीलता का ही हिस्सा है। लेकिन प्रश्न तब खड़ा होता है जब उसी घर में जन्म देने वाले माता-पिता के लिए समय, सम्मान और स्थान नहीं बचता।

कुत्ते के लिए महंगा बिस्तर और मां के लिए एक कोना भी नहीं-  कुत्ते के लिए विशेष भोजन और पिता के लिए दो वक्त की बातचीत भी नहीं- पालतू के लिए कार और माता-पिता के लिए अस्पताल जाने तक की फुर्सत नहीं तो फिर हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हम आधुनिक हुए हैं या केवल सुविधा भोगी? संयुक्त परिवार टूटे, लेकिन क्या संवेदना भी टूटनी चाहिए? संयुक्त परिवारों का टूटना सामाजिक परिवर्तन की एक वास्तविक प्रक्रिया है। रोजगार, शिक्षा, महानगरीय जीवन, प्रवास और बदलती जीवनशैली ने परिवार की संरचना बदली है। हर वृद्ध व्यक्ति का अपने बच्चों के साथ रहना संभव भी नहीं हो सकता। बेटा विदेश में है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपराधी है। बेटी दूसरे शहर में रहती है तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने माता-पिता से प्रेम नहीं करती। समस्या दूरी नहीं, संवेदनहीनता है। आज तकनीक ने दूरी को बहुत हद तक कम कर दिया है। वीडियो कॉल के माध्यम से हजारों किलोमीटर दूर बैठे माता-पिता से रोज बात की जा सकती है। आर्थिक सहायता भेजी जा सकती है। स्वास्थ्य की निगरानी की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर किसी विश्वसनीय व्यक्ति को उनकी देखभाल के लिए लगाया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कई बार समस्या साधनों की नहीं, इच्छा की होती है।

वृद्धाश्रम अंतिम सहारा हों, रिश्तों का विकल्प नहीं। वृद्धाश्रम अपने आप में बुरे नहीं हैं। कुछ वरिष्ठ नागरिक अपनी इच्छा से, बेहतर सामाजिक वातावरण के लिए या ऐसी परिस्थितियों में जहां परिवार उपलब्ध नहीं है, वृद्धाश्रम का विकल्प चुन सकते हैं। लेकिन वह वृद्धाश्रम अत्यंत पीड़ादायक हो जाता है जहां किसी मां की आंखें दरवाजे पर अपने बेटे का इंतजार करती रहती हैं और बेटा महीनों तक खबर तक नहीं लेता। वह वृद्धाश्रम और भी दुखद हो जाता है जहां कोई वृद्ध व्यक्ति अपने बच्चों की तस्वीर सीने से लगाए यह कहता है “बेटा बहुत बड़ा आदमी बन गया है… बस मेरे लिए उसके पास समय नहीं है।” यह वाक्य किसी भी संवेदनशील मनुष्य को भीतर तक तोड़ देने के लिए पर्याप्त है।

बिलासपुर में देखा एक दृश्य मन को विचलित कर गया

मैं बिलासपुर छत्तीसगढ़ में रहते हुए समय-समय पर वरिष्ठ नागरिकों की ऐसी परिस्थितियों से रूबरू होता रहा हूं। एक बहतराई रोड स्थित महिला वृद्धाश्रम में जो स्थिति मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखी, उसने मुझे भीतर तक विचलित किया। गर्मी के दिनों में पर्याप्त पंखे तक उपलब्ध न होना, भोजन और मूलभूत सुविधाओं को लेकर कठिनाइयां तथा अभाव में जीवन काटती वृद्ध महिलाओं को देखकर मन में एक ही प्रश्न उठा…. क्या वृद्धावस्था में पहुंच जाना किसी मनुष्य का अपराध है..?

यदि समाज किसी वृद्धाश्रम को सहयोग देता है तो उस सहयोग का प्रत्येक अंश उन वृद्धों तक पहुंचना चाहिए जिनके नाम पर वह सहायता प्राप्त की गई है। वृद्धाश्रम सेवा का स्थान हैं, स्वार्थ का माध्यम नहीं। जहां समाज दान देता है, वहां पारदर्शिता भी होनी चाहिए। नियमित निरीक्षण, आय-व्यय का सार्वजनिक लेखा-जोखा, भोजन की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सुविधाएं, सुरक्षा और मानवीय व्यवहार इन सभी की व्यवस्था सुनिश्चित करना शासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। वृद्धाश्रम दया का केंद्र नहीं, गरिमा के साथ जीवन जीने का स्थान होना चाहिए। कानून भी कहता है माता-पिता को बेसहारा नहीं छोड़ा जा सकता। भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिए Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 बनाया गया है। इस कानून में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण के अधिकार के साथ-साथ वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा, चिकित्सा देखभाल, वृद्धाश्रमों की स्थापना तथा उनके परित्याग जैसे विषयों के लिए प्रावधान किए गए हैं।

अर्थात यह केवल भावनात्मक या नैतिक प्रश्न नहीं है; यह सामाजिक जिम्मेदारी और कानून से जुड़ा विषय भी है। लेकिन कानून किसी बेटे के हृदय में प्रेम पैदा नहीं कर सकता। कानून भरण-पोषण दिला सकता है, लेकिन मां के माथे पर बेटे का हाथ नहीं रख सकता। कानून अधिकार दे सकता है, लेकिन वह उस पिता की आंखों में अपने बच्चे को देखने की लालसा पूरी नहीं कर सकता। इसलिए असली लड़ाई कानून से पहले संस्कारों के स्तर पर लड़नी होगी। बच्चों को यह समझना होगा कि वृद्धावस्था भविष्य है। आज जो बेटा अपने बूढ़े पिता को बोझ समझ रहा है, उसे एक बात कभी नहीं भूलनी चाहिए – वृद्धावस्था किसी दूसरे की समस्या नहीं, हर मनुष्य का संभावित भविष्य है। आज पिता कमजोर हैं, कल हम कमजोर होंगे। आज मां को सहारे की जरूरत है, कल हमें भी किसी के सहारे की जरूरत पड़ सकती है। समय कभी एक दिशा में नहीं चलता। जिस मां को आज हम “पुरानी सोच” कहकर किनारे कर रहे हैं, उसी मां की गोद में बैठकर हमने जीवन की पहली भाषा सीखी थी।

Waiting For A Visa | Dr. B.R. Ambedkar | English Paperback | The Original Edition | State And Minorities by BR Ambedkar | Their Mechanism, Genesis And Development | Ambedkar Minority Castes In India | Book Bhimrao Works B R Pride Baba Saheb Bheemrao Bheem Bhim Rao Problem Untouchables dr br. Ambedkar's all Writings Books Father Constitution Speeches Roy Hindi by Annotated Critical Navayana And Other Tharoor Essays डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर डा बाबा साहेब, डॉ भीमराव अम्बेडकर, अंबेडकर कास्ट इन इंडिया बुक्स बाबासाहब की बुक अणि कार्लमार्क चरित्र बायोग्राफी रानडे, गांधी और जिन्ना आणि जीना वेटिंग फार ए वीज़ा वेटिंग फार ए वीज़ा हिंदी Bharat Ka Vibhajan Understanding Mai + Kaise Bana Shashi States And Minorities Waiting For A Visa Rupee Biography Autobiography Auto Biography On Buddhism Gospel Buddha And His Dhamma Jaat Paat Ka Vinash पाकिस्तान और भारत का विभाजन अथवा Athva Atharva Aur Annihilation Of Caste In India With A Reply To Mahatma Gandhi System Annhilation Cast Anhilation Matters Arundhati Inhilation Inhalation photo frame statue combo set आणि मुस्लिम Lang Aani b. r.35%
₹150.00

जिस पिता की बात आज हमें पुरानी लगती है, उसी पिता की उंगली पकड़कर हमने चलना सीखा था। जिस हाथ ने हमें गिरने से बचाया, क्या उसी हाथ को उम्र के आखिरी पड़ाव पर हम अकेला छोड़ देंगे?समाज को भी केवल फोटो खिंचाने वाली सेवा से आगे बढ़ना होगा! वृद्धाश्रम में एक दिन जाकर फल बांट देना सेवा का अंत नहीं, शुरुआत होनी चाहिए। जरूरत है कि समाज अपने आसपास के बुजुर्गों की पहचान करे। जिनके बच्चे दूर हैं, उनकी नियमित खबर ली जाए। अकेले रहने वाले वृद्धों के लिए पड़ोस आधारित सहायता तंत्र बने। स्थानीय संस्थाएं स्वास्थ्य शिविर आयोजित करें। स्वयंसेवी संगठन वृद्धाश्रमों का नियमित सामाजिक ऑडिट करें। प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि किसी संस्था को मिलने वाला अनुदान और सामाजिक सहयोग वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंच रहा है।

और सबसे जरूरी —-

वृद्धाश्रमों को निरीक्षण और सहायता की नहीं, सम्मान और उत्तरदायित्व की दृष्टि से देखा जाए। माता-पिता को पैसा नहीं, अपना समय चाहिए। कई संतानें यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लेती हैं कि वे हर महीने पैसे भेजती हैं।

पैसा जरूरी है, लेकिन यही पर्याप्त नहीं।

कई वृद्ध माता-पिता की सबसे बड़ी जरूरत दवा नहीं, बातचीत होती है। उन्हें महंगे उपहार नहीं, अपने बच्चे की आवाज सुननी होती है। उन्हें बैंक खाते में पैसा नहीं, कभी-कभी अपने बेटे का हाथ अपने हाथ में चाहिए होता है। उन्हें विदेश से भेजी गई वस्तु नहीं, त्योहार पर दरवाजे पर खड़ा अपना बच्चा चाहिए। माता-पिता को यह एहसास चाहिए कि वे अब भी परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य हैं, कोई पुरानी वस्तु नहीं।

आज के युवाओं से एक सीधा सवाल

हम किस विकास की बात कर रहे हैं..? हम चांद पर पहुंचने की बात करते हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बात करते हैं, स्मार्ट शहरों की बात करते हैं, दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की बात करते हैं। लेकिन यदि हमारे शहरों में ऐसे वृद्धाश्रम बढ़ते जाएं जहां मां-बाप अपने ही बच्चों के इंतजार में जीवन काट रहे हों, तो हमें विकास के साथ-साथ मानवीय विकास का भी हिसाब देना होगा।

किसी देश की ऊंची इमारतें उसकी समृद्धि बता सकती हैं, लेकिन उसके बुजुर्गों के चेहरे उसकी सभ्यता बताते हैं। जिस समाज में बुजुर्ग सम्मान से जीते हैं, वह समाज वास्तव में सभ्य है। वृद्धाश्रम की जरूरत कम करना ही सबसे बड़ी सामाजिक सफलता होगी। हमारा लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर वृद्धाश्रम को बंद कर दिया जाए। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि कोई वृद्ध केवल इसलिए वृद्धाश्रम जाने को मजबूर न हो क्योंकि उसके अपने बच्चों ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वृद्धाश्रम उन लोगों के लिए हों जिन्हें सचमुच इसकी आवश्यकता है न कि उन माता-पिता के लिए जिन्हें उनके बच्चों ने अपनी सुविधा के लिए वहां पहुंचा दिया। आज जरूरत है कि परिवारों में फिर से संवाद हो। बच्चों को बचपन से यह शिक्षा मिले कि माता-पिता की सेवा कोई एहसान नहीं, बल्कि जीवन के प्रति कृतज्ञता है। माता-पिता ने हमें जीवन दिया है; उनकी वृद्धावस्था में उनके साथ खड़ा होना हमारी मनुष्यता की परीक्षा है।

और अंत में समाज के हर उस बेटे-बेटी से एक सवाल ?

जब आप छोटे थे और रात में रोते थे, तब आपके माता-पिता ने आपको कभी यह नहीं कहा कि “तुम हमारे लिए बोझ हो।”तो फिर आज जब वे बूढ़े हो गए हैं,‌हम उन्हें बोझ कहने का अधिकार कहां से ले आए?

 वक्त रहते इस प्रश्न का उत्तर हमें स्वयं को देना होगा।क्योंकि वृद्धाश्रम की बढ़ती संख्या केवल बुजुर्गों की कहानी नहीं है – यह आने वाली पीढ़ी के भविष्य का आईना है। आज जिस वृद्ध को हम अकेला छोड़ रहे हैं, कल उसी आईने में हमारा अपना चेहरा दिखाई दे सकता है। माता-पिता को वृद्धाश्रम नहीं, सम्मान चाहिए। उन्हें दया नहीं, अपनापन चाहिए। उन्हें केवल खर्च नहीं, समय चाहिए। और सबसे बढ़कर उन्हें यह विश्वास चाहिए कि उम्र के अंतिम पड़ाव पर भी वे अपने ही घर में अपने हैं। यही भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यही परिवार की वास्तविक परिभाषा है। और यही हमारी मनुष्यता की अंतिम परीक्षा भी है।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं समाजसेवी, एवीके न्यूज सर्विस

Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »