माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार शिक्षकीय सेवा में बने रहने के लिए बेसिक शिक्षा में कार्यरत सभी शिक्षक-शिक्षिकाओं को दो वर्ष में टेट अर्हता परीक्षा उत्तीर्ण करना अनिवार्य था। हालांकि जिन शिक्षकों की सेवानिवृत्ति का समय पांच वर्ष बचा था, उनको परीक्षा से छूट प्रदान की गई थी। फिर भी, शिक्षक-शिक्षिकाओं की एक बड़ी संख्या इस दायरे में आ रही थी। वर्ष 2011 से पूर्व भर्ती हुए शिक्षक-शिक्षिकाओं के सपनों पर तो मानो तुषारापात हो गया। शिक्षक संगठनों के आह्वान पर शिक्षक लामबंद हुए। जिला मुख्यालय से राज्यों की राजधानियों और दिल्ली तक धरना-प्रदर्शन कर विरोध आरम्भ हुआ, पर सरकार टस से मस नहीं हुई। किंतु टेट परीक्षा उत्तीर्ण करने का वर्ष एक वर्ष बढ़ाकर 2028 जरूर कर दिया गया।
शिक्षकों के सामने चुनौतियां मुंह बाये खड़ी थीं। शिक्षक-शिक्षिकाएं बातचीत में तमाम समस्याएं बताते। घर-परिवार का दैनंदिन खर्च, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और वृद्ध बीमार माता-पिता की दवाई। एकमात्र कमाई का जरिया यह नौकरी ही है। और यदि नौकरी नहीं रही तो सभी व्यवस्थाएं चरमरा कर ढह जाएंगी। स्वाभाविक रूप से शिक्षक-शिक्षिकाओं के मन-मस्तिष्क में चिंता की रेखाएं उभर रही थीं और दबाव हावी था। वे कहते कि जीवन के इस पड़ाव में टेट परीक्षा किसी अभेद्य किले पर फतह करने जैसा है, जिसके मुख्य द्वार पर विशाल मजबूत फाटक लगा है। किंतु समस्या से जूझना ही था, टेट का फाटक तोड़ना ही था।शिक्षक-शिक्षिकाओं में कुछ ने अपने नगर के कोचिंग संस्थानों की शरण ली तो कुछ ने आनलाइन राह पकड़ी। घर में पिता और पुत्र-पुत्रियां साथ पढ़ने लगे। विद्यालयों में भी बचे समय का सदुपयोग गपशप की बजाय नोट्स बनाने में लगने लगा। जल्दी ही यूपी टेट परीक्षा का विज्ञापन निकला। धड़ाधड़ आवेदन किये जाने लगे। मुझ पर टेट परीक्षा का तो कोई खास दबाव-भय न था। अपनी पढ़ने-लिखने की रोजमर्रा की आदत और नियमित कक्षा शिक्षण के कारण विषय पर समझ और कमोबेश कुछ पकड़ थी ही। पर परीक्षा तो परीक्षा ही होती है, तो देह में सिहरन सी दौड़ जाती। मैंने भी फार्म भर दिया और विषयवार गाईड खरीद लीं। किंतु वे गाईड पुस्तकों की दूकान से जिस प्लास्टिक पन्नी में बंधकर आई थीं, उसी में अभी तक ज्यों की त्यों रखी हैं। खोलने-पढ़ने का समय ही नहीं मिल सका और वह पैकेट मेरी अन्य पुस्तक-पत्रिकाओं के ढेर में कहीं दबकर खो गया। मेरी परीक्षा 4 जुलाई को फतेहपुर में थी। टेट परीक्षा 2 से 4 जुलाई के मध्य हुई। बेटी संस्कृति की 2 जुलाई को चित्रकूट में परीक्षा हुई थी। प्रश्नपत्र देकर केंद्र से बाहर निकली संस्कृति के मुखमंडल में नन्हा सूरज चमक था। मुझे घर पर पढ़ता हुआ न देखकर परीक्षा के चार-पांच दिन पहले वह बोली कि पापा जी, मैं आपको कुछ आवश्यक टिप्स बता देती हूं। आप उतना पढ़ लें तो आराम से उत्तीर्ण हो जाएंगे, हालांकि मैं जानती हूं कि आप पास हो जाएंगे। बेटी के आग्रह पर गाइडों की खोजबीन शुरू हुई, पर वे नहीं मिलीं। पत्नी का स्वाभाविक ग़ुस्सा चौथे आसमान पर था। वह संस्कृति से बोलीं कि बेटा पापा ने पांच मिनट भी किसी दिन गाईड खोलकर नहीं पढ़ा, बस अखबारों-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखते और दूसरी किताबें पढ़ते रहे हैं। मम्मी का तंज सुनकर बेटी विश्वास से मुस्कराती हुई बोली कि पापा की चिंता न करो, वह आसानी से पास हो जाएंगे। खैर, गाइडों का पैकेट 3 जुलाई की सुबह मिल गया। पैकेट में मोटी-मोटी चार गाईड देखकर पसीने छूट गये और खोलने की हिम्मत नहीं पड़ी। सिर चकराने लगा, तब गाइडों का पैकेट सिर के नीचे रखकर लेट गया और निद्रा ने अपने आगोश में ले लिया। इस बीच बेटी ने फोटो खींच कर परिवार के वाट्सएप समूह में पोस्ट कर दिया और लिखा- ‘टेट परीक्षा की गम्भीर पढ़ाई करते हुए पापा जी, अब सफलता दूर नही।’ तब मैंने वहां मजाकिया टिप्पणी की थी कि यह अध्ययन की अति प्राचीन अवशोषण विधा है, जिसमें लिखित सामग्री सीधे मस्तिष्क ग्रहण कर लेता है। यह विधा लुप्त हो गई थी, मैंने गहन शोध करके पुनः प्रकट किया है। वहां हंसी के गुब्बारे फूट रहे थे।

समय मुट्ठी में बंद रेत की मानिंद फिसलता रहा और परीक्षा का दिन आ पहुंचा। अनुज विनोद दीक्षित की कार द्वारा बांदा से दो अन्य शिक्षकों के साथ 4 जुलाई की सुबह परीक्षा देने फतेहपुर रवाना हुआ। दोनों सहयात्री शिक्षकों की बातचीत में गहरा दर्द रह-रहकर बाहर आ रहा था। मुझे लगा कि वह पीर-कसक-वेदना उनकी न होकर सम्पूर्ण शिक्षक समुदाय की हो गई है। समय से परीक्षा केंद्र पर पहुंच औपचारिकताएं पूरी कर बैग जमा किया और कक्ष में आवंटित अपनी सीट पर बैठ गया। वहां अन्यान्य शिक्षकों से भेंट और हंसी-मजाक का दौर चला पर हंसी की चादर के भीतर से पीड़ा अपना विद्रूप चेहरा निकाल बाहर झांक लेती थी तब माहौल यकायक उदास और नीरस हो जाता। घंटी बजी और ओएमआर शीट तथा प्रश्नपत्र दे दिया गया। ध्यानपूर्वक सभी पूर्तियां भरीं। स्टूडेंट लाइफ की फीलिंग आ रही थी। दिल धक-धक कर रहा था, गला सूख रहा था और कान गर्म होकर लाल हो रहे थे। हाथ जोड़ आराध्य हनुमान जी महाराज का स्मरण किया। पेपर खोलते ही उसमें ऐसा खोया कि समय का पता ही नहीं चला। एक बार रिचेक किया। आश्वस्त हुआ कि बहुत अच्छे नम्बर मिल जाएंगे। घंटी बजी, ओएमआर शीट जमा कर कक्ष से निकल जमा किया बैग लिया और बाहर निकल आया। उस दिन बहुत गर्मी थी, तेज तीखी धूप चेहरे पर चांटे मार रही थी। एक चाय की दूकान पर बैठ टिफिन निकाल पूड़ी सब्जी खा पानी पिया और फिर चाय ली। बहुत बढ़िया चाय थी, मन की थकान दूर हुई ताजगी आई।दूसरा प्रश्नपत्र भी ऐसा ही हुआ। वापस घर लौटकर एआई से जांचा तो प्राथमिक में 132 और उच्च प्राथमिक में 124 प्रश्न सही पाया। खाना खाकर सो गया।
और फिर, 26 अगस्त की शाम को रिजल्ट आया। अगली सुबह रिजल्ट देखा तो बहुत अच्छे अंक प्राप्त हुए- प्राथमिक में 132 और जूनियर में 124 अंक। अब मैं सातवें आसमान पर हूं। मेरी सफलता की खुशी में उस दिन सुबह से ही वरुण देव के नयनों से अविराम अश्रु धारा प्रवाहित होती रही और विभाग ने रेनीडे घोषित कर दिया। और मैं, मैं पराठा सब्जी और एक गिलास दूध पीकर घर के सभी कार्यों से मुक्ति पाकर अपने अध्ययन कक्ष में पलंग पर बैठा यह संस्मरण लिख रहा हूं। साथियों के बधाई संदेश और फोन कॉल आ रहे हैं। पर मैं सोच रहा हूं कि बिना गाईड पढ़े पास कैसे हो गया।

शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)