धर्म का वास्तविक स्वरूप मर्यादा है, उन्माद नहीं
भारत की संस्कृति में तीर्थ यात्राएं केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, आत्मसंयम और लोककल्याण की साधना मानी गई हैं। इन्हीं महान परंपराओं में से एक है श्रावण मास की कांवड़ यात्रा, जिसमें करोड़ों शिवभक्त पवित्र नदियों से जल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। यह यात्रा हजारों वर्षों से भारतीय आस्था, तप, त्याग और अनुशासन की प्रतीक रही है।
कांवड़ यात्रा का आध्यात्मिक उद्देश्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष का पान भगवान शिव ने किया था। शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए जलाभिषेक की परंपरा विकसित हुई। समय के साथ श्रद्धालु दूर-दूर से गंगाजल लाकर शिवलिंग पर अर्पित करने लगे। यही परंपरा आगे चलकर कांवड़ यात्रा के रूप में विकसित हुई।
यह यात्रा केवल पैदल चलना नहीं है, बल्कि आत्मानुशासन की साधना है। परंपरागत कांवड़िया यात्रा के दौरान – सात्विक भोजन ग्रहण करता है। नशे से दूर रहता है। ब्रह्मचर्य और शुचिता का पालन करता है। विनम्र व्यवहार करता है। सेवा और सहयोग की भावना रखता है। किसी को कष्ट न पहुंचाने का संकल्प लेता है। इसीलिए कांवड़ यात्रा को “चलती हुई तपस्या” भी कहा गया है।

बदलता स्वरूप – एक गंभीर चिंता
समय के साथ कांवड़ यात्रा का स्वरूप अत्यंत विशाल हुआ है। करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं। अधिकांश श्रद्धालु आज भी अनुशासनपूर्वक यात्रा पूरी करते हैं और समाज के लिए प्रेरणा हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में समाचार माध्यमों में कुछ ऐसी घटनाएँ भी सामने आई हैं, जिनमें कुछ व्यक्तियों द्वारा सड़क पर हंगामा, मारपीट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, यातायात नियमों की अवहेलना, अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण या अन्य अनुचित आचरण की खबरें प्रकाशित हुईं। कई मामलों में पुलिस कार्रवाई भी हुई। इन घटनाओं को संपूर्ण कांवड़ यात्रा का चरित्र नहीं कहा जा सकता। फिर भी ऐसे उदाहरण समाज में यह प्रश्न अवश्य खड़ा करते हैं कि क्या कुछ लोग धार्मिक आस्था की आड़ लेकर अनुशासनहीनता का प्रदर्शन कर रहे हैं?
धर्म उन्माद नहीं सिखाता
सनातन धर्म का मूल संदेश है-
“अहिंसा परमो धर्मः।”
भगवान शिव को आशुतोष, भोलेनाथ, महायोगी और करुणामूर्ति कहा गया है। वे क्रोध नहीं, करुणा के देवता हैं; अहंकार नहीं, त्याग के प्रतीक हैं। यदि कोई व्यक्ति शिवभक्ति के नाम पर हिंसा, अभद्रता, नशा या कानून की अवहेलना करता है, तो वह शिव की नहीं, अपनी दुर्बलताओं की पूजा कर रहा है।
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संविधान और धर्म साथ-साथ
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, परंतु उसी संविधान में प्रत्येक नागरिक के मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना, कानून का सम्मान करना, सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। धर्म और संविधान परस्पर विरोधी नहीं हैं। दोनों का उद्देश्य समाज में व्यवस्था, न्याय और शांति स्थापित करना है।
सोशल मीडिया की चुनौती
आज अनेक वीडियो कुछ ही मिनटों में पूरे देश में फैल जाते हैं। कई वीडियो वास्तविक होते हैं, तो कई अधूरे या भ्रामक भी निकलते हैं। इसलिए समाज को किसी भी वायरल वीडियो के आधार पर पूरी कांवड़ यात्रा या सभी श्रद्धालुओं के बारे में निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। साथ ही यदि कहीं वास्तविक अनुशासनहीनता हो रही है, तो उसे छिपाना भी उचित नहीं। धर्म की प्रतिष्ठा सत्य स्वीकारने और सुधार करने से बढ़ती है, न कि गलतियों को उचित ठहराने से।
युवाओं के लिए सबसे बड़ा संदेश
आज कांवड़ यात्रा में बड़ी संख्या में युवा भाग लेते हैं। यह अत्यंत सुखद है, क्योंकि युवाओं का धर्म से जुड़ना सांस्कृतिक चेतना का संकेत है। लेकिन युवा यह भी स्मरण रखें कि
* कंधे पर कांवड़ रखने से पहले मन पर संयम रखना आवश्यक है।
* यदि यात्रा के दौरान क्रोध, अहंकार, शक्ति प्रदर्शन, नशा या हिंसा प्रवेश कर जाए, तो यात्रा का आध्यात्मिक उद्देश्य समाप्त हो जाता है।
समाज और संतों की भूमिका
संत समाज, धार्मिक संस्थाएँ और कांवड़ समितियाँ आगे आकर अनुशासन संहिता तैयार करें। यात्रा से पहले प्रत्येक श्रद्धालु को यह संकल्प दिलाया जाए कि कानून का पालन करेंगे। किसी से दुर्व्यवहार नहीं करेंगे। स्वच्छता बनाए रखेंगे।ध्वनि प्रदूषण से बचेंगे। किसी भी अफवाह पर विश्वास नहीं करेंगे। धर्म की मर्यादा को सर्वोपरि रखेंगे।
भारत की पहचान उसकी आध्यात्मिक संस्कृति है। कांवड़ यात्रा उस संस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसे राजनीतिक प्रदर्शन, शक्ति प्रदर्शन या अराजकता का माध्यम बनने देना न धर्म के हित में है, न समाज के और न राष्ट्र के हित में है।
आज आवश्यकता है कि प्रत्येक कांवड़िया स्वयं से एक प्रश्न पूछे…?
* क्या मेरी यात्रा केवल पैरों की यात्रा है, या मेरे चरित्र की भी यात्रा है?
* यदि उत्तर दूसरा है, तभी कांवड़ यात्रा अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करेगी।
याद रखिए….!
“शिव को जल चढ़ाने से पहले यदि हम अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, हिंसा और अविवेक का त्याग कर दें, तो वही सबसे बड़ा जलाभिषेक होगा।” आइए, हम संकल्प लें कि कांवड़ यात्रा को श्रद्धा, सेवा, अनुशासन, सद्भाव और राष्ट्रहित का महापर्व बनाए रखेंगे। क्योंकि धर्म तभी महान बनता है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के आचरण में दिखाई दे।

