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नेत्रदान – मृत्यु के बाद भी जीवन में उजाला बाँटने का महादान

मानव जीवन में आँखों का महत्व शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। आँखें केवल देखने का माध्यम नहीं, बल्कि संसार की सुंदरता, प्रकृति के रंग, अपनों के चेहरे और जीवन के अनगिनत अनुभवों का द्वार हैं। जो व्यक्ति जन्म से या किसी कारणवश दृष्टिहीन है, उसके लिए प्रकाश का महत्व वही समझ सकता है जिसने अंधकार का अनुभव किया हो। ऐसे में नेत्रदान केवल एक चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवता की सर्वोच्च सेवा और करुणा का अनुपम उदाहरण है।

भारत में प्रतिवर्ष 25 अगस्त से 8 सितंबर तक राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को नेत्रदान के प्रति जागरूक करना, भ्रांतियों को दूर करना और अधिक से अधिक लोगों को इस महादान के लिए प्रेरित करना है। यह अभियान हमें यह संदेश देता है कि मृत्यु के बाद भी हमारा एक निर्णय किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में उजाला भर सकता है।

देश में लाखों लोग कॉर्निया (नेत्र की पारदर्शी परत) की क्षति के कारण दृष्टिबाधित हैं। इनमें बड़ी संख्या बच्चों और युवाओं की भी है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के माध्यम से नेत्र प्रत्यारोपण संभव है, लेकिन इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता नेत्रदान करने वाले लोगों की है। यदि समाज में जागरूकता बढ़े, तो हजारों लोगों को फिर से देखने का सौभाग्य मिल सकता है।

नेत्रदान को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ भी हैं। कुछ लोगों को लगता है कि नेत्रदान करने से शरीर विकृत हो जाता है या धार्मिक संस्कारों में बाधा आती है। जबकि वास्तविकता यह है कि नेत्रदान अत्यंत सम्मानजनक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। इसमें केवल कॉर्निया लिया जाता है और चेहरे की सामान्य संरचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अंतिम संस्कार भी पूरी गरिमा के साथ किया जा सकता है।

धार्मिक दृष्टि से भी लगभग सभी प्रमुख धर्म मानव सेवा को सर्वोच्च मानते हैं। किसी जरूरतमंद को दृष्टि प्रदान करना निस्संदेह सबसे बड़ा पुण्य कार्य माना जाता है। इसलिए नेत्रदान को महादान की संज्ञा दी गई है। नेत्रदान के लिए व्यक्ति की आयु कोई बड़ी बाधा नहीं होती। अनेक परिस्थितियों में वरिष्ठ नागरिक भी नेत्रदान कर सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मृत्यु के बाद कुछ घंटों के भीतर नेत्रदान की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए। इसलिए परिवार के सदस्यों का जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है।

आज आवश्यकता केवल नेत्रदान का संकल्प लेने की नहीं, बल्कि अपने परिवार और समाज को भी इसके लिए प्रेरित करने की है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर निरंतर जनजागरण अभियान चलाना चाहिए। जितनी अधिक जागरूकता बढ़ेगी, उतने अधिक लोगों के जीवन में प्रकाश लौटेगा। चिकित्सकों, नेत्र बैंकों और स्वयंसेवी संस्थाओं ने इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है, किंतु समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना इस अभियान को व्यापक सफलता नहीं मिल सकती। प्रत्येक नागरिक यदि अपने जीवनकाल में नेत्रदान का संकल्प ले, तो भारत में कॉर्निया की कमी की समस्या को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।

        नेत्रदान पखवाड़ा हमें यह सोचने का अवसर देता है कि जीवन का वास्तविक मूल्य केवल स्वयं के लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में आशा का दीप जलाने में है। मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, किंतु यदि हमारे जाने के बाद भी किसी की आँखों में रोशनी लौट आए, तो इससे बड़ा मानवीय उपहार शायद कोई दूसरा नहीं हो सकता। आइए, इस राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े पर हम स्वयं भी नेत्रदान का संकल्प लें और अपने परिवार तथा समाज को भी इसके लिए प्रेरित करें। क्योंकि नेत्रदान केवल आँखों का दान नहीं, बल्कि किसी के जीवन में नया सवेरा देने का महादान है।

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