31 अगस्त : राष्ट्रीय पोषण माह पर विशेष
“पहला सुख निरोगी काया”—भारतीय जीवन-दर्शन का यह सूत्र आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि उसके प्राकृतिक संसाधनों या आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य से आँकी जाती है। स्वस्थ नागरिक ही सशक्त समाज और विकसित राष्ट्र का निर्माण करते हैं। इसलिए संतुलित पोषण केवल व्यक्तिगत आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का आधार है।
भारत में प्रत्येक वर्ष सितंबर माह को ‘राष्ट्रीय पोषण माह’ (Poshan Maah) के रूप में मनाया जाता है। अगस्त के अंतिम दिन, 31 अगस्त, इस राष्ट्रीय अभियान की पूर्व संध्या पर यह संकल्प लेने का उपयुक्त अवसर है कि हम कुपोषण के विरुद्ध जन-जन को जागरूक करेंगे और स्वस्थ जीवनशैली को अपनाएँगे।
अक्सर यह समझ लिया जाता है कि पेट भर लेना ही अच्छा पोषण है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं व्यापक है। पोषण का अर्थ है—शरीर को आवश्यक मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन, खनिज लवण, रेशा (फाइबर) और पर्याप्त जल उपलब्ध होना। यदि भोजन संतुलित नहीं है, तो व्यक्ति कुपोषण का शिकार हो सकता है, चाहे उसे पर्याप्त भोजन ही क्यों न मिल रहा हो।

भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी कुपोषण, एनीमिया, कम वजन, बच्चों की अवरुद्ध वृद्धि और महिलाओं में पोषण की कमी जैसी चुनौतियाँ अभी भी चिंता का विषय हैं। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं, नवजात शिशुओं, किशोरियों और वृद्धजनों के लिए संतुलित पोषण अत्यंत आवश्यक है।
हमारे पारंपरिक भारतीय भोजन में पोषण का अद्भुत संतुलन है। दालें, मोटे अनाज (श्रीअन्न), हरी पत्तेदार सब्जियाँ, मौसमी फल, दूध, दही, अंकुरित अनाज, मेवे और पर्याप्त पानी—ये सभी अच्छे स्वास्थ्य के आधार हैं।आज जंक फूड, अत्यधिक चीनी, नमक और वसा युक्त खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याओं को बढ़ा रहा है। इसलिए स्वस्थ भोजन की आदत बचपन से ही विकसित करनी होगी।
एक स्वस्थ बच्चा ही अच्छी तरह सीख सकता है। विद्यालयों में मध्यान्ह भोजन, आंगनबाड़ी सेवाएँ, पोषण जागरूकता अभियान और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता बच्चों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पोषण केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा, कृषि, महिला एवं बाल विकास तथा समाज की साझा जिम्मेदारी है।
भारत की विविध खाद्य परंपराएँ पोषण का बड़ा स्रोत हैं। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध अनाज, दालें, कोदो, कुटकी, रागी, ज्वार, बाजरा, ताज़ी सब्जियाँ और मौसमी फल न केवल पौष्टिक हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल और किफायती भी हैं। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मोटे अनाज और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की समृद्ध परंपरा है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है।
स्वस्थ भारत का निर्माण केवल अस्पतालों से नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक घर की रसोई से होगा। यदि हर परिवार संतुलित भोजन, स्वच्छता, नियमित व्यायाम और पोषण के प्रति जागरूकता को अपनाए, तो अनेक बीमारियों से बचा जा सकता है।
भोजन केवल भूख मिटाने का साधन नहीं, बल्कि जीवन को ऊर्जा देने का माध्यम है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ विचार जन्म लेते हैं, और स्वस्थ नागरिक ही राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। इसलिए पोषण को खर्च नहीं, बल्कि भविष्य में किया गया सबसे महत्वपूर्ण निवेश समझना चाहिए। राष्ट्रीय पोषण माह हमें यह संदेश देता है कि स्वस्थ भारत का सपना तभी साकार होगा, जब देश का प्रत्येक बच्चा, प्रत्येक माँ, प्रत्येक युवा और प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक संतुलित पोषण प्राप्त करेगा। आइए, हम संकल्प लें कि अपने परिवार, समाज और राष्ट्र को कुपोषण से मुक्त बनाने में सक्रिय भूमिका निभाएँगे।
अन्न बने जब अमृत समान, तन-मन दोनों स्वस्थ रहें,
संतुलित भोजन, स्वच्छ विचार, जीवन में नव पथ गढ़ें।
कुपोषण का अंत करें हम, जागरूकता का दीप जलाएँ,
सुपोषित,सक्षम,स्वस्थभारत का मिलकर स्वप्न सजाएँ।।
