23 सितंबर पद्म भूषण दिनकर के जयंती अवसर पर-
कुछ कवि कविता लिखते हैं, कुछ कवि अपने समय को लिखते हैं और कुछ ऐसे विरले कवि होते हैं, जिनकी कलम समय की सीमाओं को लांघकर राष्ट्र की चेतना का स्वर बन जाती है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ऐसे ही कवि थे। उनकी कविता में केवल शब्द नहीं थे, उसमें स्वाभिमान की आग थी, पराधीनता के विरुद्ध विद्रोह था, अन्याय के सामने उठती हुई मुट्ठी थी और भारत की आत्मा की पुकार थी। इसीलिए उन्हें केवल कवि नहीं, ‘राष्ट्रकवि’ कहा गया।
रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया में हुआ और 24 अप्रैल 1974 को उनका निधन हुआ। वे कवि, निबंधकार, चिंतक, साहित्यकार और सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तित्व थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में उनकी राष्ट्रवादी कविताओं ने जनमानस को प्रभावित किया। आकाशवाणी के एक विशेष परिचय में भी उन्हें वीर रस और राष्ट्रवादी काव्य के लिए ‘राष्ट्रकवि’ तथा ‘युग-चारण’ के रूप में स्मरण किया गया है।
कविता जब स्वतंत्रता की हुंकार बनी- दिनकर का साहित्य उस समय आकार ले रहा था, जब भारत अंग्रेजी शासन की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था। देश में राजनीतिक आंदोलन तेज हो रहे थे और जनता के भीतर स्वतंत्रता की आकांक्षा प्रबल होती जा रही थी। इसी वातावरण ने दिनकर की काव्य-चेतना को दिशा दी।
उनकी प्रारंभिक रचनाओं में ‘रेणुका’ और ‘हुंकार’ जैसी कृतियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनके शब्दों में राष्ट्रभक्ति केवल भावुकता नहीं थी; वह आत्मसम्मान और संघर्ष की चेतना थी। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने भी उनके हुंकार, कुरुक्षेत्र और रश्मिरथी जैसे साहित्य को स्वतंत्रता संघर्ष के दौर में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाला बताया है। दिनकर की विशेषता यह थी कि वे जनता की भाषा में जनता की पीड़ा और आकांक्षा को व्यक्त करते थे। उनकी कविता पुस्तक के पन्नों तक सीमित नहीं रहती थी, वह सभाओं, आंदोलनों और जनमानस में उतर जाती थी।
उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां-
“खम ठोक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पांव उखड़,
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है।”
मनुष्य की सामर्थ्य में दिनकर के अटूट विश्वास का प्रमाण हैं। यही विश्वास उनकी राष्ट्रवादी चेतना का मूल स्वर भी था। दिनकर के राष्ट्रवाद में केवल वीरता नहीं, मानवता भी थी।दिनकर को केवल वीर रस का कवि मान लेना उनके विराट साहित्यिक व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। उनके राष्ट्रबोध में वीरता के साथ मानवता, सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक चेतना और शांति भी थी। कुरुक्षेत्र में उन्होंने महाभारत के युद्ध को आधुनिक मनुष्य के सामने खड़े प्रश्नों से जोड़ा। युद्ध की विभीषिका, हिंसा और मानवता के संकट पर विचार करते हुए दिनकर ने यह प्रश्न उठाया कि विजय का अर्थ क्या है, यदि उसके पीछे मनुष्य का विनाश हो?
यही दिनकर की विशेषता है- वे शस्त्र की शक्ति को जानते थे, लेकिन शांति का मूल्य भी समझते थे। वे संघर्ष से भागने की शिक्षा नहीं देते, लेकिन संघर्ष के उद्देश्य को मनुष्य और समाज के कल्याण से जोड़ते हैं। ‘रश्मिरथी’ में कर्ण के माध्यम से सामाजिक प्रश्न – दिनकर की कालजयी कृति ‘रश्मिरथी’ महाभारत के कर्ण को केंद्र में रखकर लिखी गई। कर्ण उनके यहां केवल पौराणिक पात्र नहीं है; वह प्रतिभा, संघर्ष, अपमान, मित्रता, दानशीलता और सामाजिक असमानता के अनेक प्रश्नों का प्रतीक बन जाता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अनुसार रश्मिरथी कर्ण के जीवन, उसकी प्रतिभा, सामाजिक कलंक और नियति से संघर्ष को केंद्र में रखती है। इसीलिए कर्ण का चरित्र आज भी पाठकों और रंगकर्मियों को आकर्षित करता है।
दिनकर की दृष्टि में व्यक्ति की पहचान केवल उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्म, संघर्ष और व्यक्तित्व से बनती है। यही कारण है कि रश्मिरथी की प्रासंगिकता समय बीतने के साथ कम नहीं हुई। आज भी जब सामाजिक समानता, अवसर और सम्मान की चर्चा होती है, कर्ण के माध्यम से दिनकर द्वारा उठाए गए प्रश्न पाठक को सोचने के लिए विवश करते हैं।
‘कृष्ण की चेतावनी’ : अन्याय के सामने निर्णायक स्वर – रश्मिरथी का ‘कृष्ण की चेतावनी’ खंड दिनकर की ओजस्वी अभिव्यक्ति का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। इसमें कृष्ण के माध्यम से युद्ध से पहले न्याय और धर्म की स्थापना के लिए अंतिम चेतावनी का स्वर उभरता है। यहां दिनकर की कविता केवल पौराणिक आख्यान नहीं रहती। वह अन्याय के विरुद्ध चेतना का प्रतीक बन जाती है। उनके साहित्य में बार-बार यह भावना दिखाई देती है कि शांति का अर्थ कायरता नहीं और शक्ति का अर्थ अत्याचार नहीं। शक्ति का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह न्याय और मानवता की रक्षा के लिए प्रयुक्त हो।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ : कवि से चिंतक तक- दिनकर का विराट व्यक्तित्व केवल कविता तक सीमित नहीं था। उनकी महत्वपूर्ण गद्य-कृति ‘संस्कृति के चार अध्याय’ भारतीय संस्कृति के विकास और उसके विविध स्रोतों का गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। इस कृति के लिए उन्हें 1959 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। साहित्य अकादेमी की आधिकारिक सूची में संस्कृति के चार अध्याय को वर्ष 1959 का पुरस्कार प्राप्त ग्रंथ दर्ज किया गया है। यही वह बिंदु है जहां दिनकर केवल ओज के कवि नहीं रह जाते, बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यता के गंभीर अध्येता के रूप में सामने आते हैं।

