डॉ. रामेश्वर प्रसाद सारस्वत का बाल कविता संग्रह ‘काठ का घोड़ा’ बालसाहित्य की दृष्टि से एक उल्लेखनीय कृति है। वर्ष 2011 में नीरजा स्मृति बालसाहित्य न्यास, सहारनपुर से प्रकाशित इस संग्रह में बालमन की सहज जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, उल्लास, प्रकृति-प्रेम, पारिवारिक आत्मीयता और संस्कार-बोध को सरल तथा सरस अभिव्यक्ति मिली है। कवि ने बालकों के अनुभव-जगत को निकट से समझते हुए ऐसी कविताओं की रचना की है, जिनमें जीवन के सामान्य प्रसंग भी बच्चों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय बन जाते हैं।
संग्रह में कुल 24 बाल कविताएँ हैं- ‘खाली मत बहलाओ’, ‘मेघा आओ’, ‘बिल्ली मौसी’, ‘रोज सुबह’, ‘चिड़िया गाती’, ‘मेले में’, ‘मुझको मोर बना दे माँ’, ‘रसगुल्ले’, ‘कितने आम’, ‘हुआ सवेरा’, ‘आजा चिड़िया’, ‘मिठू’, ‘सपने में’, ‘मेरी नानी’, ‘मेरे मामा’, ‘भालू जी’, ‘हाथी जी’, ‘कोयल’, ‘काठ का घोड़ा’, ‘खीर पकाई अम्माँ ने’, ‘तितली रानी’, ‘बुद्ध लौटे घर को’, ‘गिलहरी’ तथा ‘मेरी गुड़िया’। विषय-विविधता इस संग्रह की प्रमुख विशेषता है। कहीं पशु-पक्षियों का संसार है, कहीं मेले और खिलौनों का आकर्षण; कहीं दादा-दादी तथा नानी के स्नेह की गरमाहट है तो कहीं प्रकृति और स्वप्नलोक की रंगीन दुनिया।
संग्रह की आरंभिक कविताओं में बालमन की चंचलता और जीवन के प्रति उत्सुक दृष्टि विशेष रूप से दिखाई देती है। ‘खाली मत बहलाओ’ में आर्थिक अभाव के बीच घूमने-फिरने का उत्साह हास्यपूर्ण ढंग से सामने आता है। हर की पौड़ी का स्नान और ब्रजवासी की कचौड़ी बालक की दृष्टि से साधारण यात्रा को भी आनंददायक बना देते हैं। कविता में सहज हास्य के साथ स्थानीय परिवेश का भी सुंदर उपयोग हुआ है-
“नहीं जेब में फूटी कौड़ी
पहुँच गये हम हर की पौड़ी
पहले जम कर खूब नहाए
फिर आगे को पाँव बढ़ाए
मुँह में पानी भर-भर आए
ब्रजवासी की देख कचौड़ी।“
‘बिल्ली मौसी’ में बिल्ली और चूहों के संबंध को बालसुलभ विनोद के साथ प्रस्तुत किया गया है। बिल्ली की चालाकी और चूहों के प्रति उसकी घात कविता को रोचक बनाती है। ध्वनि, तुक और पुनरावृत्ति के सहारे कवि ने बच्चों के लिए सहज रूप से ग्रहणीय लय निर्मित की है-

“बिल्ली मौसी चूहे खाती
खाकर मोटी होती जाती
जब भी चूहे पड़े दिखाई
समझो उनकी शामत आई
बिल तक पहुँच नहीं पाते हैं
ऐसी घात लगाती भाई।“
‘रोज सुबह’ में पारिवारिक जीवन के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक संस्कारों की अभिव्यक्ति हुई है। दादी का प्रातः उठना, मंदिर में पूजा करना, राम-भजन गाना, सूर्य को जल देना और तुलसीदल बाँटना केवल धार्मिक क्रियाओं का वर्णन नहीं है, बल्कि यह उस घरेलू परिवेश का चित्र है जिसमें बच्चे संस्कारों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाकर सीखते हैं-
“रोज सुबह दादी जगती
मंदिर में पूजा करती
घंटी बजती टन-टन-टन
गाती मीठे राम-भजन
फिर सूरज को देती जल
और बाँटती तुलसी दल।”
‘मेले में’ बालकों की उत्सवप्रियता और सामूहिक आनंद को स्वर देती है। सर्कस, जोकर, हाथी, भालू, बंदर और शेर जैसे पात्र कविता में दृश्यात्मकता उत्पन्न करते हैं। ‘चलो चलो’ तथा ‘मेले में’ की पुनरावृत्ति बच्चों के बोलने और गाने की स्वाभाविक शैली से जुड़ती है-
“चलो चलो भाई मेले में
मेले में, भाई मेले में
मेले में है सर्कस आया
तीन फिटा का जोकर लाया
सर्कस में आया है हाथी
भालू, बंदर, शेरू साथी।”
‘मुझको मोर बना दे माँ’ में मोर के सौंदर्य के प्रति बालक का आकर्षण अभिव्यक्त हुआ है। माँ और बच्चे के संवाद के माध्यम से कविता में आत्मीयता आती है। मोर का पंख फैलाना और छम-छम नाचना बालक की कल्पना को दृश्य रूप प्रदान करता है-
“मम्मी-मम्मी कैसा शोर
बेटा, छत पर आया मोर
जब भी यह आ जाता है
जमकर शोर मचाता है
पंखों को फैलाता है
छम-छम नाच दिखाता है।”
‘कितने आम’ में आम जैसे प्रिय फल के माध्यम से बालमन के उल्लास को पकड़ा गया है। गाँव से लौटे दादा के थैले भरकर आम लाने की घटना बच्चे के लिए किसी उत्सव से कम नहीं। ‘इतने सारे’ की पुनरावृत्ति आश्चर्य और प्रसन्नता को प्रभावी बनाती है-
“इतने सारे, इतने सारे
भैया कितने सारे आम
दादा लौट गाँव से आए
थैले भर-भर लाए आम।”
बालमन की कल्पनाशीलता का एक दूसरा रूप ‘सपने में’ में दिखाई देता है। परियों की शहजादी, चॉकलेट, बिस्कुट और टॉफियाँ बच्चे की उस स्वप्निल दुनिया को सामने लाते हैं, जिसमें इच्छाएँ बिना किसी सीमा के आकार ग्रहण करती हैं-
“रात मेरे सपने में आई
परियों की शहजादी
चाकलेट, बिस्कुट, टॉफी से
मेरी मेज सजा दी।”
परिवार और रिश्तों से जुड़ी कविताएँ संग्रह को भावात्मक गहराई प्रदान करती हैं। ‘मेरी नानी’ में नानी के स्नेह और त्याग का अत्यंत आत्मीय चित्र है। बच्चे के लिए गाय का दूध और स्वयं के लिए केवल नींबू पानी, यह छोटा-सा प्रसंग नानी के वात्सल्य को बिना किसी उपदेश के व्यक्त कर देता है-
“रोज गाय का दूध पिलाती
मुझको मेरी नानी
और सवेरे खुद पीती हैं
बस नींबू का पानी।”
इसी प्रकार ‘मेरे मामा’, ‘मेरी गुड़िया’ आदि कविताएँ बालक के पारिवारिक और खिलौना-जगत को अभिव्यक्ति देती हैं। ‘मेरी गुड़िया’ में बच्चे का अपनी गुड़िया को सबसे सुंदर और प्रिय मानना बालमन की स्वाभाविक आत्मीयता को दर्शाता है-
“दादी जी ये मेरी गुड़िया
मेरी गुड़िया सबसे बढ़िया
न पीती, न कुछ खाती है।
बस आँखें ही मटकाती है।”
पशु-पक्षियों से संबंधित रचनाओं में कवि ने बच्चों की परिचित दुनिया को काव्यात्मक रूप दिया है। ‘चिड़िया गाती’, ‘आजा चिड़िया’, ‘मिठू’, ‘भालू जी’, ‘हाथी जी’, ‘कोयल’, ‘तितली रानी’ और ‘गिलहरी’ जैसी कविताएँ बालकों में प्रकृति तथा जीव-जंतुओं के प्रति आत्मीयता विकसित करती हैं। इन रचनाओं की विशेषता यह है कि कवि ने पशु-पक्षियों को केवल वर्णन का विषय नहीं बनाया, बल्कि उन्हें बालक के जीवन का सहभागी बना दिया है।
‘कोयल’ शीर्षक के अंतर्गत दी गई पंक्तियों में कौए का वर्णन मिलता है। यहाँ शीर्षक और प्रस्तुत वर्ण्य-पक्षी के बीच अंतर दिखाई देता है, जो संपादकीय दृष्टि से ध्यान देने योग्य है। तथापि पंक्तियों में कौए की काँव-काँव, काले रंग और उसके प्रति बालक की सहज प्रतिक्रिया का प्रभावपूर्ण चित्रण है-
“काँव-काँव करता है कौआ,
शहर-गाँव की गली-गली।
काली-काली सूरत इसकी,
बिल्कुल लगती नहीं भली।”
संग्रह की शीर्षक कविता ‘काठ का घोड़ा’ बालकल्पना की दृष्टि से विशेष महत्व रखती है। लकड़ी का घोड़ा घास न खाते हुए भी दौड़ता है, यह बालक की कल्पना में निर्जीव खिलौने के सजीव हो उठने का सुंदर उदाहरण है। मेले की स्मृति और बाबा द्वारा खिलौना दिलाए जाने का प्रसंग कविता में भावात्मक आत्मीयता जोड़ता है-
“देखो मेरा काठ का घोड़ा
घास नहीं यह खाता है
फिर भी दौड़ लगाता है
मैं मेले से लाया था
बाबा ने दिलवाया था
आया पूरे आठ का घोड़ा।”
‘खीर पकाई अम्माँ ने’ में प्रकृति, कृषि और परिवार के बीच का संबंध अत्यंत सहज ढंग से उभरता है। बादलों की वर्षा से खेतों में जीवन लौटता है, धान पैदा होता है और वही धान घर में चावल तथा फिर खीर का रूप लेता है। इस क्रम में ग्रामीण जीवन की आत्मनिर्भरता और पारिवारिक साझेदारी का सुंदर बोध होता है-
“बड़े टूट कर बादल बरसे,
सूखे-सूखे खेत में।
दादा जी ने धान लगाए,
झटपट अपने खेत में।
धान हुए चावल घर आए,
खीर पकाई अम्माँ ने।
सारे घर को बुला-बुलाकर
खूब खिलाई अम्माँ ने।”
‘बुद्ध लौटे घर को’ में कल्पना और अतिशयोक्ति का सुंदर मेल है। घोड़े की असाधारण गति, भोपाल से दिल्ली की यात्रा, लाल किले का दृश्य और यमुना का पानी, ये सभी प्रसंग बालक की कल्पना को भौगोलिक सीमाओं से मुक्त कर देते हैं। कविता का गतिशील कथ्य बच्चों में रोमांच उत्पन्न करता है-
“सरपट-सरपट दौड़ा घोड़ा,
चला हवा की चाल से।
लाल किले पर जा पहुँचा वह,
पलभर में भोपाल से।
घूमघाम दिल्ली से आया,
पीकर यमुना का पानी।
काली घोड़ी द्वार खड़ी थी,
उसकी करने अगवानी।”
इस संग्रह की एक उल्लेखनीय विशेषता इसकी भाषा है। कवि ने कठिन शब्दावली अथवा कृत्रिम काव्य-शिल्प का सहारा लेने के बजाय बोलचाल के निकट रहने वाली सहज भाषा अपनाई है। तुकांतता, पुनरावृत्ति, ध्वनि-अनुकरण, संवाद और छोटे-छोटे वाक्य बच्चों की ग्रहणशीलता के अनुरूप हैं। परिणामतः कविताएँ पढ़ने के साथ-साथ सुनने और याद करने में भी आनंद देती हैं। यही गुण बाल कविता को वयस्क कविता से अलग उसकी स्वतंत्र पहचान प्रदान करता है।
काव्य-संग्रह का महत्व केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं है। दादी की दिनचर्या से संस्कार, नानी के व्यवहार से त्याग और स्नेह, परिवार के सामूहिक भोजन से आत्मीयता, पशु-पक्षियों से संवेदना तथा प्रकृति के चित्रण से पर्यावरणीय निकटता का भाव विकसित होता है। कवि उपदेशात्मक शैली अपनाने के बजाय जीवन के छोटे प्रसंगों के माध्यम से मूल्य-बोध कराते हैं। यही इस संग्रह की प्रभावशीलता है।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘काठ का घोड़ा’ काव्य संग्रह बालमन के अनुभवों, कल्पनाओं और संवेदनाओं का सरल, मनोरंजक और आत्मीय दस्तावेज है। इसमें मेले की चहल-पहल से लेकर सपनों की दुनिया तक, दादी-नानी के स्नेह से लेकर पशु-पक्षियों के प्रति आकर्षण तक और प्रकृति के सौंदर्य से लेकर पारिवारिक जीवन की गर्माहट तक अनेक रंग दिखाई देते हैं। डॉ. आर.पी. सारस्वत ने बालक की दृष्टि से संसार को देखने का सफल प्रयास किया है। उनकी कविताएँ बच्चों को हँसाती, चमत्कृत करती और कल्पना के पंख देती हैं; साथ ही सहज रूप से संस्कार, संवेदना और मानवीय मूल्यों से परिचित कराती हैं। विषय-विविधता, सरल भाषा, लयात्मकता और बाल-मनोविज्ञान की समझ के कारण काठ का घोड़ा हिंदी बाल कविता के क्षेत्र में एक उपयोगी और पठनीय संग्रह के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाता है।
पुस्तक का नाम : काठ का घोड़ा
विधा : बाल कविता संग्रह
कवि का नाम : डॉ. आर.पी. सारस्वत
