नई दिल्ली: केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा एवं अंतरिक्ष विभाग के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि नैनोमेडिसिन भविष्य की निवारक चिकित्सा और व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। उन्होंने कहा कि भारत में विकसित हो रहा स्वदेशी अनुसंधान इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखता है।

नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में आयोजित नैनोमेडिसिन पर विश्व कांग्रेस 2026 के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने नैनोमेडिसिन को चिकित्सा विज्ञान में तेजी से उभरती और परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों में शामिल बताया। उनके अनुसार, नैनोमीटर स्तर पर काम करने वाली तकनीकें उपचार को अधिक सटीक, लक्षित और व्यक्तिगत बनाने के नए अवसर उपलब्ध करा रही हैं।
उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान का भविष्य ऐसे उपचारों की ओर बढ़ रहा है, जिनमें मरीज की आनुवंशिक संरचना के साथ-साथ उसकी जीवनशैली, खान-पान और पर्यावरणीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाएगा। नैनोप्रौद्योगिकी कोशिकीय स्तर पर उपचार और दवा पहुंचाने की क्षमता के कारण इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विश्व कांग्रेस में जुटे वैज्ञानिक और शोधकर्ता
दिल्ली विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संकाय के इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो मेडिकल साइंसेज (INMS) द्वारा आयोजित विश्व कांग्रेस में 2,000 से अधिक वैज्ञानिक, शोधकर्ता, विशेषज्ञ और युवा प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में नैनोमेडिसिन के क्षेत्र में हो रहे नवीन अनुसंधान, संभावित चिकित्सकीय अनुप्रयोगों और भविष्य की तकनीकों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।
नोबेल पुरस्कार विजेता और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. रोजर डी. कॉर्नबर्ग कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, जबकि कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय के प्रो. टी.एम.एस. चांग मानद अध्यक्ष हैं। उद्घाटन समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, प्रो. जी.पी. तलवार, नीति आयोग के सदस्य प्रो. गोबर्धन दास, प्रो. रमेश चंद्र और प्रो. इंद्रजीत रॉय सहित कई प्रमुख वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे।
कोशिकीय स्तर पर उपचार की संभावनाएं
डॉ. जितेंद्र सिंह ने नैनोमेडिसिन की बुनियादी अवधारणा को समझाते हुए कहा कि इसमें एक मीटर के एक अरबवें हिस्से के पैमाने पर संरचनाओं और सामग्रियों का उपयोग किया जाता है। इतने सूक्ष्म स्तर पर काम करने की क्षमता चिकित्सा विज्ञान को शरीर के भीतर विशिष्ट कोशिकाओं और ऊतकों तक उपचार पहुंचाने के नए विकल्प प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि भविष्य में एक ही बीमारी से पीड़ित सभी मरीजों के लिए एक जैसा उपचार उपयुक्त नहीं हो सकता। आनुवंशिक संरचना, जीवनशैली, खान-पान और पर्यावरण जैसे कारकों के आधार पर उपचार की आवश्यकता अलग-अलग हो सकती है। ऐसे में नैनोप्रौद्योगिकी व्यक्तिगत और लक्षित चिकित्सा के विकास में उपयोगी साबित हो सकती है।
नैनोमेडिसिन का संभावित प्रभाव केवल उपचार तक सीमित नहीं है। इसके व्यापक उपयोग से स्वास्थ्य सेवाओं की लागत-प्रभावशीलता, निदान की सटीकता और उपचार की दक्षता पर भी असर पड़ सकता है। वैश्विक स्तर पर इस क्षेत्र में बढ़ती रुचि को डॉ. सिंह ने नैनोमेडिसिन की संभावनाओं का संकेत बताया।
एआई और नैनोप्रौद्योगिकी चिकित्सकों का विकल्प नहीं
डॉ. सिंह ने चिकित्सा क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकियों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच चिकित्सकों की नैदानिक भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नैनोप्रौद्योगिकी चिकित्सा विज्ञान के लिए नए अवसर खोल रही हैं, लेकिन इनका उद्देश्य चिकित्सकों की समझ और अनुभव का स्थान लेना नहीं, बल्कि उन्हें बेहतर निर्णय लेने में सहायता प्रदान करना होना चाहिए।
उन्होंने चिकित्सा शिक्षा में भी समय के साथ बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, आधुनिक तकनीकी उपकरणों के विस्तार के बावजूद मरीज का सावधानीपूर्वक निरीक्षण, शारीरिक परीक्षण और चिकित्सकीय मूल्यांकन जैसी बुनियादी क्षमताएं चिकित्सा शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहनी चाहिए।
नैनोमेडिसिन अनुसंधान को 174 करोड़ रुपये की सहायता
सरकार की ओर से नैनोमेडिसिन अनुसंधान को दिए जा रहे समर्थन की जानकारी देते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) इस क्षेत्र की 210 अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को लगभग 174 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है।
इन परियोजनाओं में लक्षित दवा वितरण, कैंसर नैनोमेडिसिन, संक्रामक रोगों के लिए नैनोमेडिसिन, न्यूक्लिक एसिड और वैक्सीन वितरण, नैनो-डायग्नोस्टिक्स एवं इमेजिंग, पुनर्योजी चिकित्सा, घाव भरने, नैनोटॉक्सिकोलॉजी और नियामक विज्ञान जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
मंत्री ने मौखिक इंसुलिन नैनोकणों, सटीक नैनो-इंजेक्शन और स्तन कैंसर के लिए लक्षित नैनोमेडिसिन जैसे अनुसंधान क्षेत्रों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मौखिक इंसुलिन के विकास में शरीर द्वारा अवशोषण तथा पाचन एंजाइमों से संबंधित चुनौतियां रही हैं, लेकिन नैनोप्रौद्योगिकी इन समस्याओं से निपटने के लिए नए रास्ते उपलब्ध करा सकती है।
प्रयोगशाला से उद्योग तक पहुंच रहा भारतीय अनुसंधान
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का नैनोमेडिसिन इकोसिस्टम अब केवल प्रयोगशाला आधारित अनुसंधान तक सीमित नहीं है। सरकार की सहायता स्टार्टअप, अनुसंधान अवसंरचना, प्रौद्योगिकी विकास और नियामक प्रक्रियाओं तक विस्तारित हो रही है।
बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) के माध्यम से उभरते जैव-प्रौद्योगिकी उद्यमों को विभिन्न योजनाओं के तहत सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। इनमें Biotechnology Ignition Grant (BIG), Promoting Academic Research Conversion to Enterprise (PACE), Small Business Innovation Research Initiative (SBIRI) और Biotechnology Industry Partnership Programme (BIPP) प्रमुख हैं।
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य अनुसंधान एवं नवाचार को व्यावहारिक तकनीकों, उद्यमों और उपयोगी उत्पादों में बदलने की प्रक्रिया को गति देना है।
नैनोफार्मास्युटिकल्स के लिए नियामक ढांचा
भारत ने नैनोफार्मास्युटिकल्स के क्षेत्र में नियामक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। डॉ. सिंह ने बताया कि डीबीटी, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित दिशानिर्देश नैनोफार्मास्युटिकल उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावशीलता के मूल्यांकन के लिए आधार प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि अनुसंधान, सरकारी सहयोग और उद्योग की बढ़ती भागीदारी के साथ भारत इस उभरते चिकित्सा क्षेत्र में अपनी क्षमता को मजबूत कर रहा है। उनके अनुसार, देश के पास वैज्ञानिक संस्थानों, अनुसंधान आधार और संस्थागत सहयोग के माध्यम से भविष्य की स्वास्थ्य संबंधी तकनीकों के विकास में योगदान देने की पर्याप्त क्षमता है।
सही उपचार को सही स्थान और सही समय तक पहुंचाने की संभावना
नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. रोजर डी. कॉर्नबर्ग ने नैनोमेडिसिन को चिकित्सा विज्ञान का अपेक्षाकृत नया और तेजी से विकसित हो रहा क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि इसकी प्रमुख संभावनाओं में उपचार की सही मात्रा को शरीर के सही स्थान तक सही समय पर पहुंचाना शामिल है।
उनके अनुसार, लक्षित दवा वितरण से उपचार की प्रभावशीलता बढ़ाने और अनावश्यक विषाक्त प्रभावों को कम करने की संभावना है। दवा वितरण के साथ-साथ निदान, मेडिकल इमेजिंग और पुनर्योजी चिकित्सा में भी नैनोमेडिसिन के उपयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।