चेन्नई: भारत ने पवन ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार को लेकर अपनी दीर्घकालिक रणनीति और 2030 तक 100 गीगावाट स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य स्पष्ट किया है। केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, शिक्षा तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री श्री प्रल्हाद जोशी ने बुधवार को चेन्नई में ‘विंडर्जी इंडिया 2026’ के आठवें संस्करण का उद्घाटन करते हुए पवन ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं, तकनीकी विकास और निवेश के अवसरों पर विस्तार से चर्चा की।

7 से 9 अक्टूबर तक आयोजित हो रहे इस वैश्विक सम्मेलन में पवन ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े उद्योग प्रतिनिधि, विशेषज्ञ, नीति निर्माता, शोध संस्थान और अंतरराष्ट्रीय भागीदार हिस्सा ले रहे हैं। सम्मेलन में 20 से अधिक देशों के लगभग 400 प्रदर्शक और 500 प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं। डेनमार्क, जर्मनी और स्पेन ने अपने देश-विशिष्ट मंडप स्थापित किए हैं।
उद्घाटन समारोह में तमिलनाडु के ऊर्जा संसाधन एवं विधि मंत्री थिरु सी.टी.आर. निर्मल कुमार के साथ केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी, पवन ऊर्जा संगठनों के प्रतिनिधि तथा उद्योग जगत के प्रमुख लोग मौजूद रहे।
पवन ऊर्जा में भारत की क्षमता बढ़ी
मुख्य संबोधन में श्री प्रल्हाद जोशी ने कहा कि भारत का पवन ऊर्जा क्षेत्र तेजी से विस्तार के दौर में है। वित्त वर्ष 2026 में देश ने एक वर्ष में 6.05 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित की, जो अब तक की सबसे अधिक वार्षिक स्थापना है।
उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2027 में भी वार्षिक पवन ऊर्जा स्थापना इस रिकॉर्ड को पार कर सकती है। उनके अनुसार, परियोजनाओं की मजबूत पाइपलाइन और अनुकूल नीतिगत ढांचा भारत को पवन ऊर्जा क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक आधार प्रदान कर रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि लगातार बढ़ रही स्थापना क्षमता 2030 तक 100 गीगावाट स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार कर रही है। इस लक्ष्य के साथ भारत घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के अलावा पवन ऊर्जा उत्पादन और संबंधित विनिर्माण एवं निर्यात क्षमता को बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
सितंबर 2026 तक 59.20 गीगावाट क्षमता
सरकार के अनुसार, 30 सितंबर 2026 तक भारत में स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 59.20 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। इस क्षमता में लगातार हो रही वृद्धि को 2030 तक 100 गीगावाट के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।
पवन ऊर्जा में बढ़ती क्षमता भारत के व्यापक ऊर्जा संक्रमण कार्यक्रम का भी हिस्सा है। सौर ऊर्जा के साथ पवन ऊर्जा को देश की गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता बढ़ाने के प्रमुख स्रोतों में शामिल किया जा रहा है।
तमिलनाडु की महत्वपूर्ण भूमिका
उद्घाटन समारोह में तमिलनाडु के ऊर्जा मंत्री थिरु सी.टी.आर. निर्मल कुमार ने पवन ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने पवन ऊर्जा परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी।
उन्होंने विशेष रूप से राज्य की ‘रीपॉवरिंग’ नीति का उल्लेख किया। रीपॉवरिंग के तहत पुराने या कम क्षमता वाले पवन ऊर्जा संयंत्रों को आधुनिक और अधिक क्षमता वाली तकनीक से बदलने की दिशा में काम किया जाता है। इससे मौजूदा पवन ऊर्जा स्थलों का अधिक प्रभावी उपयोग करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
परियोजनाओं के लिए भूमि और मंजूरी अहम
पवन ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार में केवल उत्पादन तकनीक ही नहीं, बल्कि भूमि उपलब्धता, विभिन्न विभागों से समय पर मंजूरी और मार्ग अधिकार (Right of Way) जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
सम्मेलन के दौरान इन क्षेत्रों में परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में योगदान देने वाले विभिन्न राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया। इसका उद्देश्य पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुगम बनाने और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय को प्रोत्साहित करना रहा।
तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी
‘विंडर्जी इंडिया 2026’ के दौरान भारतीय पवन ऊर्जा क्षेत्र में तकनीकी सहयोग और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण समझौतों और सहयोग पहलों की घोषणा की गई।
इनमें आईडब्ल्यूटीएमए-बीडब्ल्यूई वैश्विक समझौता ज्ञापन, आईडब्ल्यूटीएमए-पीटीबी आशय पत्र तथा आईडब्ल्यूटीएमए-ओईसीडी सहयोग शामिल हैं। इन पहलों का उद्देश्य पवन ऊर्जा क्षेत्र में तकनीकी क्षमता, मानकों, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाना है।
उद्घाटन समारोह में ‘तमिलनाडु में ऊर्जा संक्रमण’ तथा ‘भारतीय पवन ऊर्जा क्षेत्र के लिए संविदात्मक तंत्र की पुनर्कल्पना’ शीर्षक वाली रिपोर्ट भी जारी की गईं। ये रिपोर्टें राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पवन ऊर्जा के विस्तार से जुड़े नीतिगत और बाजार संबंधी पहलुओं पर केंद्रित हैं।
उद्योग, शोध और सरकार के बीच सहयोग पर जोर
सम्मेलन में पवन ऊर्जा क्षेत्र के विकास के लिए सरकार और उद्योग के साथ-साथ शिक्षा जगत, अनुसंधान संस्थानों तथा अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
भारत के सामने 2030 तक 100 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य है। इसे हासिल करने के लिए नई परियोजनाओं की स्थापना के साथ-साथ पवन टर्बाइन तकनीक, विनिर्माण क्षमता, ग्रिड एकीकरण, ऊर्जा भंडारण और परियोजनाओं के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे को भी समानांतर रूप से मजबूत करना होगा। ‘विंडर्जी इंडिया 2026’ को इसी व्यापक पवन ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में सहयोग और तकनीकी आदान-प्रदान के मंच के रूप में प्रस्तुत किया गया। सम्मेलन में उद्योग और विशेषज्ञों से नई साझेदारियों, तकनीकी नवाचार और परियोजना क्रियान्वयन की गति बढ़ाने पर ध्यान देने का आह्वान किया गया।