NEW English Version

“विविध बोलियों की लोककथाओं” में गूंजी बिलासा केंवटीन की गाथा- अरपा तीर की बेटी

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ की रचना ‘अरपा तीर की बेटी’ को मिला स्थान, छत्तीसगढ़ी मूल पाठ के साथ हिंदी अनुवाद भी

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति, लोकपरंपरा और लोकभाषाओं को साहित्य के माध्यम से संरक्षित करने की दिशा में बिलासपुर के साहित्यकार एवं पत्रकार सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ की रचना ‘अरपा तीर की बेटी’ को विशेष स्थान मिला है। यह रचना बिलासपुर नगर की लोकनायिका बिलासा केंवटीन के जीवन, संघर्ष और मृत्यु से जुड़ी लोकगाथा को जीवन-वृत्तांत के रूप में प्रस्तुत करती है।‘विविध बोलियों की लोककथाएँ’ नामक पुस्तक में प्रकाशित यह रचना बिलासा केंवटीन की उस लोकपरंपरा को साहित्यिक रूप में सामने लाती है, जिसके साथ बिलासपुर नगर की पहचान और लोकस्मृति गहराई से जुड़ी हुई है। पुस्तक की संपादक डॉ. मंदा माणिकराव नांदुरकर हैं तथा पुस्तक की मूल अवधारणा विभिन्न भारतीय बोलियों की लोककथाओं को सामने लाने की है। सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ की ‘अरपा तीर की बेटी’ की खासियत यह है कि इसे मूल रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा में जो की पद्य में लिखा गया है और साथ में उसका हिंदी अनुवाद गद्य में भी प्रस्तुत किया गया है। इससे छत्तीसगढ़ी लोकभाषा के पाठकों के साथ हिंदी पाठकों तक भी बिलासा केंवटीन की लोककथा पहुंचने का मार्ग प्रशस्त होता है। रचना की शुरुआत अरपा नदी के तट और बिलासा के जन्म की लोकस्मृति से होती है। अरपा के परिवेश, नदी किनारे के जनजीवन और लोकविश्वास को कथा के माध्यम से जीवंत करते हुए लेखकीय प्रस्तुति बिलासा केंवटीन के जीवन और मृत्यु तक की कथा को सामने लाती है। लेखक ने इसे केवल एक लोककथा के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय लोकपरंपरा से प्रेरित साहित्यिक पुनर्कथन के रूप में आकार दिया है। इसमें अरपा नदी, बिलासपुर की धरती और बिलासा केंवटीन के व्यक्तित्व के बीच के संबंध को कथा का आधार बनाया गया है। रचना के प्रारंभिक अंश में अरपा के प्राकृतिक परिवेश को अत्यंत भावपूर्ण ढंग से उकेरा गया है –

 “अरपा नदी के किनारे भोर उतर रही थी।

हल्की धुंध पानी के ऊपर तैर रही थी।

नदी के दोनों तटों पर कांस के फूल हवा के साथ झूम रहे थे। दूर किसी नाविक का गीत लहरों पर तैरता हुआ सुनाई दे रहा था।”

इसके बाद जन स्वर में…

 “अरपा के पानी निर्मल रे, मया बरसे धीर।

एही तीर जनमिस बिलासा, छत्तीसगढ़ के वीर॥”

इन पंक्तियों के माध्यम से बिलासा केंवटीन को केवल एक ऐतिहासिक अथवा लोककथात्मक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि बिलासपुर की लोकचेतना और अस्मिता से जुड़ी वीरांगना के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया है। बिलासा केंवटीन की गाथा छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में लंबे समय से लोकश्रुति, लोकगीत और जनस्मृति के माध्यम से जीवित रही है। बिलासपुर नगर के नामकरण को भी लोकपरंपरा में बिलासा केंवटीन से जोड़ा जाता है।

छत्तीसगढ़ी से हिंदी तक लोकगाथा का सफर

‘अरपा तीर की बेटी’ की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका द्विभाषिक स्वरूप है। छत्तीसगढ़ी में मूल रचना के साथ हिंदी अनुवाद दिए जाने से लोकभाषा की मौलिकता भी बनी रहती है और व्यापक हिंदी पाठक वर्ग तक कथा पहुंचती है। यह प्रयोग छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ लंबे समय से पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं और लोकजीवन, छत्तीसगढ़ी भाषा तथा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर लेखन करते रहे हैं। उनकी इस रचना में अरपा और बिलासा केंवटीन के माध्यम से बिलासपुर की मिट्टी, लोकजीवन और स्मृतियों को शब्द देने का प्रयास दिखाई देता है।

पुस्तक का संदेश भी इसी भावना को रेखांकित करता है

“हमारी बोलियां हमारी पहचान, हमारी कथाएं हमारी धरोहर।”इस दृष्टि से ‘अरपा तीर की बेटी’ केवल बिलासा केंवटीन की कथा नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ी बोली में सुरक्षित लोकस्मृति को लिखित साहित्य के माध्यम से अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक सार्थक प्रयास है।

Book Showcase

Best Selling Books

Ikigai: The Japanese secret to a long and happy life

By Héctor García, Francesc Miralles

₹318

Book 2 Cover

Why I am an Atheist and Other Works

By Bhagat Singh

₹104

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

Until Love Sets Us Apart

By Aditya Nighhot

₹176

Translate »