13 अक्टूबर : अंतरराष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस-
धरती केवल मिट्टी, पत्थर, पहाड़ और नदियों का समुच्चय नहीं है, बल्कि यह समूची सृष्टि की जीवनदायिनी जननी है। इसी की गोद में मानव सभ्यता ने जन्म लिया, यहीं जीवन के विविध रंग खिले और इसी के प्राकृतिक संसाधनों ने मनुष्य के विकास की नींव रखी। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस धरती ने मानव को सब कुछ दिया, उसी के अस्तित्व को मनुष्य अपने स्वार्थ, लालच और अंधाधुंध विकास की बलिवेदी पर चढ़ाने में जुटा हुआ है। आज प्रकृति के साथ मनुष्य का व्यवहार ऐसा हो गया है, मानो वह अपनी ही जीवनरेखा को काटने पर आमादा हो।
वनों की अंधाधुंध कटाई, नदियों में प्रदूषण, वायुमंडल में जहरीली गैसों का बढ़ता उत्सर्जन, अनियंत्रित खनन, पहाड़ों का बेतरतीब दोहन और प्राकृतिक क्षेत्रों में बढ़ता अतिक्रमण पर्यावरण के संतुलन को लगातार बिगाड़ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण कहीं भीषण गर्मी और सूखे का प्रकोप है, तो कहीं अतिवृष्टि, बाढ़, चक्रवात और भूस्खलन जनजीवन को तहस-नहस कर रहे हैं। हिमनदों का पिघलना, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और मौसम के बदलते मिजाज भी मानवता के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।प्राकृतिक आपदाओं का हर विनाशकारी दृश्य हमें एक ही संदेश देता है..*प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके मानव सभ्यता सुरक्षित नहीं रह सकती।* धरती की चेतावनी को अनसुना करना अब केवल पर्यावरण की उपेक्षा नहीं, बल्कि अपने ही भविष्य को संकट में डालना है।
प्रकृति में भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और चक्रवात जैसी घटनाएं प्राकृतिक प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। लेकिन इन घटनाओं से होने वाली तबाही का दायरा मानव की गतिविधियों से बहुत बढ़ सकता है। बाढ़ के मैदानों में बेतरतीब निर्माण, पहाड़ों पर अनियोजित विकास, जंगलों का विनाश, जल निकासी के प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण और कमजोर निर्माण व्यवस्था किसी प्राकृतिक खतरे को बड़ी आपदा में बदल सकती है।
जब पहाड़ों को उनकी सहनशक्ति से अधिक खोदा जाता है, जंगलों को बेरहमी से काटा जाता है और नदियों के प्रवाह को बाधित किया जाता है, तब प्रकृति का संतुलन बिगड़ना स्वाभाविक है। मिट्टी का कटाव बढ़ता है, जलस्रोत प्रभावित होते हैं और अनेक क्षेत्रों में भूस्खलन तथा बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है। इसी प्रकार, जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ता ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु परिवर्तन को तेज करता है, जिससे कई प्रकार की चरम मौसमी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।यह समझना जरूरी है कि हर प्राकृतिक आपदा का कारण मानव गतिविधियां नहीं हैं, लेकिन मानव की लापरवाही उसके प्रभावों को कहीं अधिक विनाशकारी बना सकती है। इसलिए केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव की व्यवस्था करना पर्याप्त नहीं है। हमें उन गलतियों को भी रोकना होगा, जो लोगों और बस्तियों को आपदाओं के प्रति असुरक्षित बनाती हैं। कल्पना कीजिए कि यदि धरती स्वयं अपनी व्यथा व्यक्त कर पाती, तो वह अपने बच्चों से क्या कहती? शायद उसकी करुण पुकार कुछ ऐसी होती,…..
“मेरे बच्चों के नाम मेरी अंतिम पुकार ”
प्रिय मानव!
मैं तुम्हारी धरती हूं। वही धरती, जिसने तुम्हें अपनी गोद में जन्म दिया, तुम्हारे लिए अन्न उपजाया, नदियों के रूप में जल दिया, वनों से प्राणवायु दी और पर्वतों की छाया में तुम्हें आश्रय प्रदान किया। मेरी मिट्टी में तुम्हारे सपने अंकुरित हुए, मेरे आकाश के नीचे तुम्हारी सभ्यताएं विकसित हुईं और मेरी गोद में तुम्हारे जीवन की अनगिनत कहानियां लिखी गईं। लेकिन आज मैं अपने ही बच्चों के हाथों घायल हूं। तुम्हारे लोभ ने मेरे हरे-भरे जंगलों को निगल लिया। तुम्हारी लापरवाही ने मेरी नदियों को कचरे और रसायनों से भर दिया। तुम्हारे धुएं ने मेरी वायु को दूषित किया और तुम्हारे अनियंत्रित दोहन ने मेरे पर्वतों तथा धरती की कोख को छलनी कर दिया। मेरे हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। मेरे वन्यजीव अपने आश्रय खो रहे हैं। मेरी नदियां कहीं प्रदूषण से कराह रही हैं, तो कहीं बाढ़ के रूप में विनाशकारी रूप धारण कर रही हैं। कहीं खेत पानी के लिए तरस रहे हैं, तो कहीं वही पानी घरों और बस्तियों को डुबो रहा है। क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारे विकास की कीमत कौन चुका रहा है? जब तुम बिना आवश्यकता एक पेड़ काटते हो, तो केवल एक वृक्ष नहीं गिरता, बल्कि असंख्य जीवों का आश्रय भी छिन जाता है। जब तुम नदियों में कचरा बहाते हो, तो केवल जल दूषित नहीं होता, बल्कि जीवन की एक पूरी शृंखला प्रभावित होती है। जब तुम प्रकृति की सीमाओं की अनदेखी करते हो, तब अपने ही भविष्य की सुरक्षा को कमजोर करते हो। मैं तुमसे कुछ असंभव नहीं मांग रही। बस इतना चाहती हूं कि तुम मुझे उपभोग की वस्तु नहीं, जीवन का आधार समझो। मेरे जंगलों को बचाओ, नदियों को स्वच्छ रखो, जल का सम्मान करो, पशु-पक्षियों के आश्रय सुरक्षित करो और विकास की ऐसी राह चुनो, जिसमें प्रकृति का विनाश नहीं, उसका संरक्षण हो। याद रखो, मैं सुरक्षित रहूंगी, तभी तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा। मेरे घाव भरने का समय अभी है। यदि तुमने मेरी पुकार को अनसुना किया, तो आने वाली पीढ़ियां तुमसे पूछेंगी कि जब धरती संकट में थी, तब तुमने उसकी रक्षा के लिए क्या किया था? मैं तुम्हारी शत्रु नहीं, तुम्हारी जननी हूं। मुझे जीतने का नहीं, मुझे बचाने का प्रयास करो। समय रहते संभल जाओ। मेरे आंसुओं को बहने से रोको। मुझे फिर से हरा-भरा, स्वच्छ और जीवन से परिपूर्ण बना दो।
तुम्हारी अपनी
धरती मां
प्रत्येक वर्ष 13 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण दिवस* हमें यह समझने का अवसर देता है कि आपदाओं से होने वाली जनहानि और आर्थिक क्षति को कम करने के लिए पूर्व तैयारी, वैज्ञानिक नियोजन और सामूहिक जिम्मेदारी कितनी आवश्यक है। इसका उद्देश्य केवल आपदाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना नहीं, बल्कि जोखिम को पहचानकर उसे कम करने के लिए ठोस कदम उठाना भी है। आपदा प्रबंधन का अर्थ केवल संकट के समय राहत सामग्री बांटना, घायलों को अस्पताल पहुंचाना और प्रभावित लोगों का पुनर्वास करना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य आपदा आने से पहले ही ऐसी व्यवस्थाएं तैयार करना है, जिनसे जान-माल की क्षति न्यूनतम हो सके। इसके लिए सबसे पहले प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना होगा। वनों की कटाई पर प्रभावी नियंत्रण, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पौधारोपण, जलस्रोतों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह की रक्षा जैसे उपाय पर्यावरणीय संतुलन को मजबूत कर सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भूगर्भीय परिस्थितियों का आकलन किए बिना निर्माण कार्यों से बचना होगा। नदियों के बाढ़ क्षेत्रों और भूस्खलन की आशंका वाले स्थानों पर बस्तियां बसाने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन और सुरक्षा मानकों का पालन आवश्यक है। इसी प्रकार, उद्योगों और वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करना, स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहित करना, ऊर्जा की बचत करना और कचरे का उचित निस्तारण करना भी हमारी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

प्रकृति का संरक्षण आपदा जोखिम कम करने का एक महत्वपूर्ण आधार है, लेकिन इसके साथ वैज्ञानिक तैयारी और मजबूत व्यवस्थाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। भूकंपरोधी भवन निर्माण, सुरक्षित जल निकासी, बाढ़ नियंत्रण की प्रभावी योजनाएं, मौसम संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली और समय पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की व्यवस्था अनेक जीवन बचा सकती है।विद्यालयों, महाविद्यालयों, कार्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। लोगों को यह जानकारी होनी चाहिए कि भूकंप के समय क्या करना है, बाढ़ की चेतावनी मिलने पर कहां जाना है और चक्रवात जैसी परिस्थितियों में स्वयं तथा अपने परिवार की सुरक्षा कैसे करनी है। स्थानीय प्रशासन, आपदा प्रबंधन दल, स्वास्थ्य सेवाओं, स्वयंसेवी संगठनों और नागरिकों के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है। विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांगजनों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। विकास योजनाओं में आपदा जोखिम का आकलन अनिवार्य होना चाहिए।सड़क, बांध, भवन, खनन परियोजना या किसी बड़ी औद्योगिक इकाई की स्थापना करते समय केवल आर्थिक लाभ को आधार नहीं बनाया जा सकता। यह भी देखना होगा कि उसका पर्यावरण, स्थानीय समुदाय और भविष्य की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
पर्यावरण संरक्षण का दायित्व केवल सरकार, वैज्ञानिकों या पर्यावरणविदों का नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपने दैनिक व्यवहार में छोटे-छोटे बदलाव करके इस दिशा में योगदान दे सकता है। पानी और बिजली की अनावश्यक बर्बादी रोकना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, कचरे को इधर-उधर न फेंकना, सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता देना, पेड़-पौधों की देखभाल करना और स्थानीय जलस्रोतों को स्वच्छ रखना ऐसे कदम हैं, जिनका सामूहिक प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।पौधारोपण के साथ पौधों को बड़ा होने तक सुरक्षित रखना भी जरूरी है। केवल पौधे लगाने के आंकड़े बढ़ाने से पर्यावरण सुरक्षित नहीं होगा; हमें उनकी नियमित देखभाल और स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप प्रजातियों के चयन पर भी ध्यान देना होगा। बच्चों में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना विकसित करनी होगी। उन्हें यह समझाना होगा कि नदी केवल पानी की धारा नहीं, जंगल केवल लकड़ियों का भंडार नहीं और पहाड़ केवल खनिजों के स्रोत नहीं हैं। ये सभी जीवन के संतुलन को बनाए रखने वाली प्राकृतिक व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं।
धरती का संरक्षण वास्तव में मानवता का संरक्षण है। यदि हम आज पर्यावरण को बचाने के लिए संकल्पबद्ध होते हैं, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा, निर्मल जल और सुरक्षित जीवन का उपहार दे सकते हैं। आज मानवता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां विकास और विनाश के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी हो गया है। जिस विकास के लिए जंगल उजाड़ दिए जाएं, नदियों को प्रदूषित कर दिया जाए, पहाड़ों को खोखला कर दिया जाए और भविष्य की पीढ़ियों के हिस्से का प्राकृतिक संसाधन समाप्त कर दिया जाए, वह विकास नहीं, बल्कि आने वाले संकट की नींव है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करना विकास का विरोध नहीं है। वास्तविक विकास वही है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण की सुरक्षा, सामाजिक न्याय और आने वाली पीढ़ियों के हितों का ध्यान रखा जाए। प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं, लेकिन वैज्ञानिक तैयारी, पर्यावरण संरक्षण, सुरक्षित निर्माण और समय पर चेतावनी से उनके विनाशकारी प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक तत्परता, सामाजिक सहभागिता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी चारों का समन्वय आवश्यक है। धरती हमें बार-बार चेतावनी दे रही है। बदलता मौसम, सूखते जलस्रोत, उजड़ते जंगल, प्रदूषित नदियां और चरम मौसमी घटनाएं हमें आत्ममंथन के लिए विवश कर रही हैं। अब भी समय है कि हम अपने स्वार्थ और अहंकार से ऊपर उठें तथा प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का मार्ग अपनाएं।
आइए, धरती की इस करुण पुकार को अपना संकल्प बनाएं…
मेरे घाव भर दो,
मेरी सांसें लौटा दो।
सूने वन फिर हरे बनाओ,
नदियों को निर्मल कर जाओ।
जल, जंगल, जीवन बचाओ,
लोभ-अहंकार त्याग जाओ।।
याद रखिए, धरती के बिना मानव जीवन की कल्पना असंभव है। प्रकृति हमारी सुविधा की वस्तु नहीं, हमारे अस्तित्व का आधार है। यदि हम इसी तरह उसके संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते रहे, तो सचमुच मानवता अपने ही कर्मों से निर्मित बारूद के ढेर पर बैठी होगी।
इसलिए अब भी समय है; धरती की कदर कर लो, प्रकृति को बचा लो और अपने भविष्य को सुरक्षित कर लो। क्योंकि धरती बचेगी, तभी जीवन बचेगा और जीवन बचेगा, तभी मानव सभ्यता का अस्तित्व कायम रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस