06 नवंबर -धनतेरस : धन, आरोग्य और समृद्धि का पर्व
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाले सांस्कृतिक संदेश भी हैं। धनतेरस ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो दीपावली के उल्लास का शुभारंभ करता है। इस अवसर पर घरों की साफ-सफाई, दीप प्रज्ज्वलन, पूजा-अर्चना और खरीदारी की परंपरा देखने को मिलती है। बाजारों में रौनक बढ़ जाती है और परिवार अपने सामर्थ्य के अनुसार नई वस्तुएं खरीदकर उत्सव में सहभागी बनते हैं। लेकिन धनतेरस का वास्तविक अर्थ केवल सोना, चाँदी, बर्तन अथवा अन्य वस्तुओं की खरीदारी तक सीमित नहीं है। इस पर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष आरोग्य, श्रम, सदाचार और संतुलित जीवन के प्रति सम्मान है। धन जीवन को सुविधाजनक बना सकता है, लेकिन स्वस्थ शरीर, शांत मन, पारिवारिक सद्भाव और सामाजिक संवेदना के बिना संपन्नता अधूरी रह जाती है।
धनतेरस को धनत्रयोदशी भी कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व दीपावली से जुड़ी उत्सव-परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है। अनेक परिवार इस दिन घरों की सफाई करते हैं, दीप जलाते हैं और शुभता तथा समृद्धि की कामना से पूजा-अर्चना करते हैं। धनतेरस के साथ भगवान धन्वंतरि की आराधना विशेष रूप से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश के साथ प्रकट हुए थे। उन्हें आयुर्वेद और आरोग्य का देवता माना जाता है। यह मान्यता स्वास्थ्य को जीवन की अमूल्य निधि मानने की भारतीय परंपरा को रेखांकित करती है। समुद्र मंथन की कथा भारतीय पौराणिक साहित्य में सहयोग, संघर्ष, धैर्य और प्राप्त उपलब्धियों के विवेकपूर्ण उपयोग का प्रतीकात्मक संदेश भी देती है। धनतेरस के अवसर पर इन मूल्यों का स्मरण हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि जीवन में अर्जित संपत्ति का उपयोग केवल व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं के लिए ही नहीं, बल्कि परिवार और समाज के कल्याण के लिए भी होना चाहिए।
धनतेरस का सबसे महत्वपूर्ण संदेश स्वास्थ्य के महत्व से जुड़ा है। जीवन में धन अर्जित करने के लिए मनुष्य निरंतर परिश्रम करता है, लेकिन यदि वह अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करता रहे, तो उसकी उपलब्धियों का आनंद भी सीमित हो सकता है। भगवान धन्वंतरि की आराधना हमें याद दिलाती है कि स्वास्थ्य की रक्षा के लिए नियमित दिनचर्या, संतुलित भोजन, पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और समय पर चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक हैं। त्योहारों की व्यस्तता में भी इन आदतों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।आज जीवनशैली से जुड़ी समस्याएँ, शारीरिक निष्क्रियता, असंतुलित भोजन और तनाव अनेक लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में धनतेरस को आरोग्य जागरूकता से जोड़ना सार्थक होगा। परिवार इस अवसर पर स्वास्थ्य परीक्षण, नियमित व्यायाम और संतुलित आहार अपनाने का संकल्प ले सकते हैं। यह भी आवश्यक है कि परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों के प्रति सम्मान रखते हुए उपचार के संबंध में वैज्ञानिक प्रमाणों और योग्य चिकित्सकों की सलाह को महत्व दिया जाए। किसी भी गंभीर बीमारी में केवल धार्मिक अनुष्ठान अथवा घरेलू उपायों पर निर्भर रहना उचित नहीं है। आस्था और विवेक का संतुलन ही स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदार दृष्टिकोण है।

धनतेरस पर सोना, चाँदी, बर्तन, आभूषण और घरेलू उपयोग की वस्तुएँ खरीदने की परंपरा प्रचलित है। अनेक लोग इसे शुभ आरंभ का प्रतीक मानते हैं। बाजारों में सजावट, रोशनी और ग्राहकों की आवाजाही त्योहार की आर्थिक गतिविधियों को गति देती है। इस अवसर पर स्थानीय व्यापारियों, कारीगरों, स्वर्णकारों, कुम्हारों और छोटे दुकानदारों को भी रोजगार तथा आय के अवसर मिलते हैं। मिट्टी के दीपक बनाने वाले कारीगरों की मेहनत भारतीय उत्सव परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय उत्पादों की खरीदारी से छोटे व्यवसायों और पारंपरिक शिल्प को प्रोत्साहन मिल सकता है। हालाँकि खरीदारी को शुभता का एकमात्र मापदंड मानना उचित नहीं है। हर परिवार की आर्थिक स्थिति अलग होती है। किसी के लिए सोना खरीदना संभव है, तो किसी के लिए एक छोटा दीपक या उपयोगी घरेलू वस्तु खरीदना ही पर्याप्त होता है। पर्व की सार्थकता खर्च की राशि से नहीं, बल्कि उसमें निहित भावना और जिम्मेदारी से तय होती है। त्योहारों के दौरान आकर्षक विज्ञापनों और बाजार के दबाव में अनावश्यक खरीदारी से बचना चाहिए। अपनी जरूरतों और बजट के अनुसार खर्च करना, बचत का ध्यान रखना तथा कर्ज लेकर दिखावे की वस्तुएँ खरीदने से बचना आर्थिक विवेक का परिचायक है।
भारतीय जीवन-दर्शन में धन का व्यापक अर्थ है। स्वास्थ्य, ज्ञान, समय, श्रम, परिवार, मित्रता, प्रतिष्ठा और संतोष भी जीवन की महत्वपूर्ण संपत्तियाँ हैं। आर्थिक समृद्धि के साथ नैतिकता और मानवीयता का समावेश हो, तभी धन समाज के लिए कल्याणकारी बन सकता है।
यदि किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त संपत्ति है, लेकिन वह परिवार को समय नहीं दे पाता, दूसरों के प्रति संवेदनशील नहीं है और निरंतर तनाव में रहता है, तो उसकी संपन्नता का अर्थ अधूरा रह जाता है। इसके विपरीत सीमित साधनों वाला व्यक्ति भी संतोष, स्वस्थ संबंधों और ईमानदार श्रम के माध्यम से समृद्ध जीवन जी सकता है। धनतेरस का अवसर हमें यह विचार करने की प्रेरणा देता है कि धन अर्जित करने के साधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना उसका उपयोग। ईमानदार श्रम, पारदर्शिता, सामाजिक उत्तरदायित्व और दूसरों के अधिकारों का सम्मान आर्थिक जीवन की बुनियाद होने चाहिए।
त्योहार परिवारों को एक साथ आने, पुराने मतभेद दूर करने और संबंधों में आत्मीयता बढ़ाने का अवसर देते हैं। धनतेरस पर परिवार के बुजुर्गों का सम्मान, बच्चों को परंपराओं की जानकारी और जरूरतमंदों के साथ सहयोग की भावना उत्सव को अधिक अर्थपूर्ण बनाती है। समाज में अनेक परिवार ऐसे हैं, जिनके लिए त्योहार की आवश्यक वस्तुएँ जुटाना भी कठिन होता है। ऐसे में जरूरतमंद परिवारों को राशन, वस्त्र, दवाइयां अथवा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना धनतेरस के संदेश को मानवीय स्वरूप देता है। दान का उद्देश्य किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि सहयोग और समानुभूति के साथ उसकी आवश्यकता पूरी करना होना चाहिए। सार्वजनिक प्रदर्शन की अपेक्षा संवेदनशीलता के साथ की गई सहायता अधिक मूल्यवान है।
धनतेरस और दीपावली के अवसर पर घरों और बाजारों में रोशनी तथा सजावट का विशेष महत्व होता है। इस उत्साह के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी जरूरी है। ऊर्जा की बचत करने वाली रोशनी, मिट्टी के दीपक, पुनः उपयोग योग्य सजावटी सामग्री और कम कचरा उत्पन्न करने वाले विकल्प अपनाए जा सकते हैं। प्लास्टिक की अनावश्यक सजावट, एक बार इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं और अत्यधिक पैकेजिंग से बचना चाहिए। बाजारों में खरीदारी करते समय टिकाऊ और उपयोगी वस्तुओं को प्राथमिकता देने से संसाधनों की बर्बादी कम की जा सकती है। दीपावली की रोशनी तभी अधिक सुंदर लगेगी, जब हमारे आसपास की हवा, पानी और धरती भी सुरक्षित रहें। उत्सव की खुशी किसी अन्य व्यक्ति के स्वास्थ्य अथवा पर्यावरण की कीमत पर नहीं होनी चाहिए।
आज उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति के बीच त्योहारों के मूल संदेश को समझना पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। सामाजिक माध्यमों पर महँगी खरीदारी और भव्य सजावट का प्रदर्शन देखकर कई परिवार अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करने के दबाव में आ जाते हैं। ऐसे वातावरण में धनतेरस हमें संयम, विवेक और वास्तविक जरूरतों की पहचान का संदेश देता है। समृद्धि का अर्थ दूसरों से अधिक खर्च करना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। परिवारों को बच्चों में बचत, श्रम का सम्मान, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता जैसे मूल्य विकसित करने चाहिए। यही संस्कार आने वाली पीढ़ियों को जिम्मेदार नागरिक बनाने में सहायता करेंगे।
धनतेरस भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जो धन और आरोग्य के महत्व को एक साथ सामने लाता है। भगवान धन्वंतरि की आराधना स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की प्रेरणा देती है, जबकि खरीदारी की परंपरा श्रम, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के महत्व को रेखांकित करती है। इस पर्व को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है कि हम अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खरीदारी करें, स्वास्थ्य की देखभाल करें, स्थानीय कारीगरों को प्रोत्साहित करें और जरूरतमंदों के साथ खुशियाँ बाँटें। पर्यावरण के अनुकूल उत्सव मनाकर हम अपनी परंपराओं को वर्तमान समय की आवश्यकताओं के अनुरूप भी बना सकते हैं।
धनतेरस पर दीप जलाते समय हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हमारे घरों में समृद्धि के साथ सद्भाव भी हो, हमारी उपलब्धियों के साथ विनम्रता भी हो और हमारी खुशियों में दूसरों के लिए स्थान भी हो।
क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति केवल संचित धन नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर, शांत मन, ईमानदार श्रम, संतुष्ट हृदय और संवेदनशील समाज है।

वरिष्ठ पत्रकार / साहित्यकार / अधिवक्ता, एवीके न्यूज सर्विस