07 नवंबर 2026 नरक चतुर्दशी
भारतीय संस्कृति में पर्व और त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाले प्रेरणास्रोत भी हैं। दीपावली से पूर्व मनाया जाने वाला नरक चतुर्दशी का पर्व इसी आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाए जाने वाले इस पर्व को नरक चौदस, रूप चतुर्दशी और छोटी दीपावली के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हमें बाहरी स्वच्छता के साथ अंतर्मन को निर्मल बनाने तथा जीवन से नकारात्मकता दूर करने की प्रेरणा देता है।
नरक चतुर्दशी से जुड़ी प्रमुख पौराणिक मान्यता भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नरकासुर नामक अत्याचारी असुर ने अपने अहंकार और शक्ति के मद में अनेक निर्दोष लोगों को पीड़ित किया था। उसने देवताओं तथा ऋषियों को भी परेशान किया और अनेक कन्याओं को बंदी बना लिया था। अंततः भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध कर उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। यह कथा अन्याय पर न्याय, अहंकार पर विनम्रता और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देती है। इसका मूल भाव यह है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य दूसरों को भयभीत करना नहीं, बल्कि निर्बलों की रक्षा करना है। जब सत्ता, सामर्थ्य और संपन्नता लोककल्याण के स्थान पर अत्याचार का माध्यम बन जाते हैं, तब उनका अंत निश्चित हो जाता है।
नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। परंपरागत रूप से इस दिन प्रातःकाल अभ्यंग स्नान अर्थात तेल लगाकर स्नान करने की प्रथा है। इसे शारीरिक स्वच्छता, आरोग्य और सौंदर्य से जोड़कर देखा जाता है। विभिन्न क्षेत्रों में इस दिन स्नान, दीपदान तथा पूजा की अलग-अलग परंपराएँ प्रचलित हैं। लेकिन रूप का वास्तविक अर्थ केवल चेहरे की सुंदरता या बाहरी आकर्षण तक सीमित नहीं है। मनुष्य का श्रेष्ठ रूप उसके विचारों, व्यवहार, संवेदनशीलता और चरित्र में दिखाई देता है। ईर्ष्या, द्वेष, छल, अहंकार और घृणा से भरा मन बाहरी सजावट के बावजूद सुंदर नहीं हो सकता। इसलिए नरक चतुर्दशी हमें स्वयं से प्रश्न करने का अवसर देती है कि हमने अपने भीतर कितनी करुणा, कितनी सहिष्णुता और कितनी मानवीय संवेदना को स्थान दिया है।

यदि हम इस पर्व के संदेश को वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखें, तो नरक की अवधारणा का एक व्यापक अर्थ सामने आता है। भ्रष्टाचार, हिंसा, नशे की प्रवृत्ति, सामाजिक भेदभाव, महिलाओं के प्रति अपराध, बुजुर्गों की उपेक्षा और मानवीय मूल्यों का पतन ऐसी स्थितियाँ हैं, जो समाज के जीवन को कष्टमय बनाती हैं। जब किसी घर में प्रेम के स्थान पर कलह, विश्वास के स्थान पर संदेह और सहयोग के स्थान पर स्वार्थ का वातावरण बन जाता है, तब उस घर की सुख-शांति प्रभावित होती है। इसी प्रकार जब समाज में संवेदनहीनता बढ़ती है, तब विकास के तमाम साधन उपलब्ध होने के बावजूद मानवीय जीवन की गुणवत्ता कमजोर पड़ने लगती है। ऐसे में नरक चतुर्दशी का संदेश केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें अपने आचरण में भी ऐसा प्रकाश उत्पन्न करना चाहिए, जो दूसरों के जीवन से निराशा और पीड़ा का अंधकार दूर कर सके।
दीपावली से पहले घरों और आसपास के स्थानों की सफाई करने की भारतीय परंपरा का अपना सामाजिक महत्त्व है। स्वच्छ वातावरण स्वस्थ जीवन का आधार है। नरक चतुर्दशी के अवसर पर घर, आँगन, गलियों और सार्वजनिक स्थलों को स्वच्छ रखने के साथ कचरे का उचित निपटान करना भी आवश्यक है। आज जब वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और प्लास्टिक कचरा गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियाँ बन चुके हैं, तब त्योहारों को पर्यावरण के अनुकूल मनाना समय की आवश्यकता है। मिट्टी के दीपक जलाना, अनावश्यक बिजली की खपत से बचना, अत्यधिक धुआँ उत्पन्न करने वाले पटाखों से दूरी रखना और जरूरतमंदों के साथ खुशियाँ बाँटना इस पर्व को अधिक सार्थक बना सकता है। हमें यह भी समझना होगा कि उत्सव की वास्तविक सुंदरता शोर और प्रदर्शन में नहीं, बल्कि शांति, सद्भाव और सामूहिक आनंद में निहित है।
नरक चतुर्दशी दीपावली के स्वागत का अवसर भी है। यह पर्व हमें अपने घरों को प्रकाशित करने के साथ उन जीवनों में भी आशा का दीप जलाने की प्रेरणा देता है, जहाँ अभाव, अकेलापन और निराशा का अंधकार है। किसी जरूरतमंद परिवार की सहायता करना, किसी बुजुर्ग का हालचाल पूछना, बच्चों के चेहरों पर मुस्कान लाना अथवा किसी निराश व्यक्ति को सांत्वना देना भी दीपोत्सव की भावना को जीवंत बनाता है। त्योहार तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है, जब उसकी खुशियाँ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचती हैं।भारतीय संस्कृति की यही विशेषता है कि वह व्यक्तिगत आनंद को सामाजिक कल्याण से जोड़ती है। नरक चतुर्दशी हमें इसी मानवीय दृष्टिकोण को अपनाने का अवसर प्रदान करती है।
नरक चौदस का वास्तविक संदेश आत्मावलोकन और आत्मशुद्धि है। हमें अपने भीतर छिपे उन दुर्गुणों को पहचानना होगा, जो हमारे व्यक्तित्व, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक जीवन को प्रभावित करते हैं। क्रोध के स्थान पर क्षमा, स्वार्थ के स्थान पर सेवा, घृणा के स्थान पर प्रेम और अहंकार के स्थान पर विनम्रता को अपनाना ही इस पर्व की सार्थक साधना है। दीपक की लौ हमें स्मरण कराती है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की एक छोटी-सी किरण भी उसे चुनौती दे सकती है। इसी प्रकार मनुष्य का एक सद्कर्म, एक संवेदनशील विचार और एक सच्चा प्रयास किसी के जीवन में परिवर्तन ला सकता है। नरक चतुर्दशी पर हम केवल अपने घरों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और सामाजिक परिवेश को भी प्रकाशित करने का संकल्प लें। यही इस पर्व की सच्ची पूजा और दीपावली के स्वागत की सबसे सुंदर तैयारी होगी।
मन के तम को दूर कर, सद्भावों के दीप जलाएँ,
द्वेष मिटाकर हृदय से, प्रेम-सुमन हर ओर खिलाएं,
केवल घर ही क्यों सजें, जीवन भी उजियारा हो,
नरक चौदस का पुण्य पर्व, मानवता का सहारा हो।।
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”, एवीके न्यूज सर्विस