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भुखमरी है विकास एवं बढ़ती समृद्धि पर बदनुमा दाग

हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2023 के मुताबिक, अरबपति उद्यमियों की संख्या देश में बढ़कर 1319 हो गई है। लेकिन बड़ी बात यह कि पिछले पांच साल में एक हजार करोड़ से अधिक की संपत्ति वाले लोगों का आंकड़ा 76 फीसदी बढ़ गया है। निश्चित ही भारत की आर्थिक प्रगति एक सुखद संकेत है, साल 2047 तक विकासशील देशों के वर्ग से निकलकर भारत विकसित देश हो जायेगा। एक दशक में भारत दसवें नंबर की अर्थव्यवस्था से तरक्की करके दुनिया की पांचवीं आर्थिक महाशक्ति बन गया। अनुमान हैं दो साल के अंदर हम तीसरी आर्थिक शक्ति बन जाएंगे। इन उल्लेखनीय आर्थिक उपलब्धियों के बीच चिन्तनीय मुद्दा अमीरी गरीबी का बढ़ता फासला एवं गरीबों की दुर्दशा का होना है। अमीर अधिक अमीर हो रहे हैं और गरीब अधिक गरीब, यह एक गंभीर चुनौती है। पांच राज्यों में विधानसभा एवं अगल वर्ष लोकसभा में यह चुनावी मुद्दा बनना चाहिए, पर कोई भी राजनीतिक दल यह नहीं कर पा रहे हैं। विपक्ष के सामने इससे अच्छा क्या मुद्दा हो सकता है? राहुल गांधी ने लगातार गरीबों की दुर्दशा और अमीरों की बढ़ती दौलत का सवाल उठाया है। राजनीति से इतर अर्थशास्त्रियों और विश्व की नामचीन संस्थाओं की रपटों में यह सवाल लगातार रेखांकित हो रहा है।

निस्संदेह इस वक्त भारत की आर्थिक विकास दर का सूचकांक दुनिया में सर्वाधिक है। जहां यह भारत के आर्थिक महाशक्ति बनने का संकेत दे रहा है, वही भारत के लिए एक और सूचकांक गरीबी एवं भूखमरी से जुड़ा भी सामने आया है, जो ज्यादा परेशान करने वाला है। भुखमरी एवं गरीबी से जुड़ा यह सूचकांक समृद्धि केे सूचकांक के साथ सामने आया है, जो यह बताता है कि आजादी के अमृत महोत्सव तक की यात्रा का लक्ष्य जिस प्रजातांत्रिक समाजवाद एवं समतावादी समाज संरचना का था, वह कहीं पीछे छूटता जा रहा है। देश में मानवीय मूल्यों और आर्थिक समानता को हाशिये पर डाल दिया गया है और येन-केन-प्रकारेण धन कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृत्ति के बीज हमारी परंपराओं में रहे हैं या यह बाजार के दबाव का नतीजा है? कहीं शासन-व्यवस्थाएं गरीबी दूर करने का नारा देकर अमीरों को प्रोत्साहन तो नहीं दे रही है? इस तरह की मानसिकता राष्ट्र को कहां ले जाएगी? ये कुछ प्रश्न अमीरी गरीबी की बढ़ती खाई और उसके तथ्यों पर मंथन को जरूरी बनाते हैं।

आज भी सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत के लोग नरेन्द्र मोदी सरकार की कार्यकुशलता, उनकी दूरगामी योजनाओं और उसके द्वारा परिणाम लाने की क्षमता में बहुत विश्वास रखते हैं। निश्चित ही गरीबी भी कम हो रही है, लेकिन इसी कड़ी में भुखमरी के सर्वेक्षण में भारत दुनिया के 125 देशों में 111वें स्थान पर होना, चिन्ता को बढ़ाता है। विसंगति यह कि पिछले साल से हर क्षेत्र में विकास की घोषणाओं के बावजूद भुखमरी का यह रैंक बढ़ कैसे गया? पिछले साल 121 देशों में भारत 107वें स्थान पर था। आंकड़े बता रहे हैं कि हमारे यहां बड़ी संख्या में नवजात बच्चों का वजन नहीं बढ़ पाता। उन्हें पर्याप्त पोषक भोजन नहीं मिल पाता। समय से पहले और कम वजन के बच्चे पैदा हो रहे हैं। वहीं हम गर्व से कहते हैं कि दुनिया में सर्वाधिक युवाओं का देश है भारत। युवा-श्रमशक्ति हमारे पास है। हम देश व दुनिया भर के लिए इस श्रमशक्ति की सस्ती दर पर आपूर्ति कर सकते हैं। देश में भुखमरी से न मरने देने की गारंटी तो दी जाती है लेकिन हर काम करने योग्य व्यक्ति को उचित रोजगार की गारंटी नहीं दी जाती, यह बड़ी विसंगति एवं विडम्बना है।

गरीबी-अमीरी के असंतुलन को कम करने की दिशा में काम करने वाली वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने अपनी आर्थिक असमानता रिपोर्ट में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति देते हुए इसे घातक बताया है। आज देश एवं दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, भारत में भी ऐसी तस्वीर दुनिया की तुलना में अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी के निर्देशन में बनी गतवर्ष की वर्ल्ड इनिक्वालिटी रिपोर्ट भी भारत की आर्थिक विषमता की तस्वीर पेश करती है। इसके अनुसार 2021 में भारत के हर वयस्क व्यक्ति की औसत आय प्रतिमाह 17 हजार के करीब थी। लेकिन देश की निचली आधी आबादी की औसत मासिक आय 5 हजार भी नहीं थी, जबकि ऊपर के 10 प्रतिशत व्यक्तियों की औसत मासिक आय 1 लाख के करीब थी। शीर्ष पर बैठे 1 प्रतिशत की प्रति व्यक्ति मासिक आय लगभग चार लाख रुपए थी। क्या देश एवं दुनिया में गैर बराबरी घट रही है या बढ़ रही है? वर्ल्ड इनिक्वालिटी रिपोर्ट बताती है कि नब्बे के दशक से लेकर अब तक पूरी दुनिया में गैर बराबरी बढ़ी है। भारत में अमीर और गरीब के बीच खाई और भी तेजी से बढ़ी है।

अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘फोर्ब्स’ दुनिया के धनाढ्य बिलियनेयर लोगों की लिस्ट छापती है। फोर्ब्स की भारत के 100 सबसे अमीरों की सूची के अनुसार, मुकेश अंबानी एवं गौतम अडानी के बाद सूची में सॉफ्टवेयर टाइकून शिव नादर 29.3 बिलियन डॉलर की संपत्ति के साथ तीसरे स्थान पर हैं, इसके बाद सावित्री जिंदल की संपत्ति में 46 प्रतिशत की वृद्धि के साथ वह 24 बिलियन डॉलर वाली चौथे स्थान पर रहीं। शीर्ष पांच में एवेन्यू सुपरमार्ट्स के राधाकिशन दमानी का भी नाम है, जिनकी संपत्ति पहले के 27.6 बिलियन डॉलर से घटकर 23 बिलियन डॉलर हो गई है। फोर्ब्स की सूची हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2023 के एक दिन बाद आई जिसमें भी ऐसा ही डेटा दिखाया गया था। हुरुन की सूची के अनुसार भी, मुकेश अंबानी ने गौतम अडानी को पीछे छोड़ते हुए सबसे अमीर भारतीय का खिताब फिर से हासिल कर लिया है। व्यक्तिगत तौर पर यह बात अब खास मायने नहीं रखती कि कौन किस नंबर पर है, क्योंकि दौलत का यह उठाव एक सामूहिक टेªेंड बन चुका है।

पूंजी का बहाव भारत जैसे देशों की तरफ हो रहा है, जिनकी इकॉनमी कई लोकल और ग्लोबल वजहों से बूम कर रही है। इस लिहाज से इस दौलत का जितना रिश्ता निजी उद्यम, हौसले और अक्लमंदी का है, उतना ही उस बदलाव से भी है, जिसे हम ‘नए भारत की कहानी’ कहते हैं। फिलहाल हम इस बहस में नहीं पड़े कि इन उद्यमियों ने भारत को बनाया है या भारत में होना इन उद्यमियों की कामयाबी की असली वजह है। कुल मिलाकर इतना तय है कि हम इस टेªेंड को भारत की कामयाबी के तौर पर देख सकते हैं। क्योंकि नागरिक अपने देश की नुमाइंदी ही करते हैं। जैसे बिल गेट्स की कामयाबी अमेरिका की प्रतिभा की कामयाबी है, वैसे ही रिलायंस, अडानी, या दूसरी कंपनियों की कामयाबी भारतीय उद्यमशीलता की कामयाबी है। लेकिन हर कामयाबी अपने साथ नाकामियों का हिसाब भी लेकर चलती है, असंतुलन को न्यौतती हैं।

हमारे देश में जरूरत यह नहीं है कि चंद लोगों के हाथों में ही बहुत सारी पूंजी इकट्ठी हो जाये, पूंजी का वितरण ऐसा होना चाहिए कि विशाल देश के लाखों गांवों को आसानी से उपलब्ध हो सके। लेकिन क्या कारण है कि महात्मा गांधी को पूजने वाले सत्ताशीर्ष का नेतृत्व उनके ट्रस्टीशीप के सिद्धान्त को बड़ी चतुराई से किनारे कर रखा है। यही कारण है कि एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी, भुखमरी, कुपोषण तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गईं। अर्थ की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, विलास और स्वार्थ से जोड़ दिया। नई आर्थिक प्रक्रिया को आजादी के बाद दो अर्थों में और बल मिला। एक तो हमारे राष्ट्र का लक्ष्य समग्र मानवीय विकास के स्थान पर आर्थिक विकास रह गया। दूसरा सारे देश में उपभोग का एक ऊंचा स्तर प्राप्त करने की दौड़ शुरू हो गई है। इस प्रक्रिया में सारा समाज ही अर्थ प्रधान हो गया है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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