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बंदूक-संस्कृति से दागदार होती अमेरिकी छवि

दुनिया में स्वयं को सभ्य एवं स्वयंभू मानने वाले अमरीका में बढ़ रही ‘बंदूक संस्कृति’ के साथ-साथ लोगों में बढ़ रही असहिष्णुता, हिंसक मनोवृत्ति और आसानी से हथियारों की सहज उपलब्धता का दुष्परिणाम बार-बार होने वाली दुखद घटनाओं के रूप में सामने आना चिन्ताजनक है। अमेरिका में एक हत्यारे ने गोलियां बरसाकर करीब 21 लोगों को मौत की नींद सुला दिया और कई को जख्मी कर दिया है। तीन स्थानों पर गोलीबारी करने के बाद हत्यारा घटनास्थल से भागने में सफल हुआ है। आश्चर्यकारी है कि दुनिया की सबसे दुरस्त एवं सक्षम अमेरिकी पुलिस एक हत्यारे को पकड़ने में इतनी लाचार हो गई कि उसे सहयोग के लिए आम लोगों से अपील करनी पड़ी।

हिंसा की बोली बोलने वाला, हिंसा की जमीन में खाद एवं पानी देने वाला, दुनिया में हथियारों की आंधी लाने वाला अमेरिका अब खुद हिंसा का शिकार हो रहा है। अमेरिका की आधुनिक सभ्यता की सबसे बड़ी मुश्किल यही रही है कि यहां हिंसा इतनी सहज बन गयी है कि हर बात का जवाब सिर्फ हिंसा की भाषा में ही दिया जाने लगा। वहां हिंसा का परिवेश इतना मजबूत हो गया है कि वहां की बन्दूक-संस्कृति से वहां के लोग अपने ही घर में बहुत असुरक्षित हो गए थे। अमेरिका को अपनी बिगड़ती छवि के प्रति सजग होना चाहिए क्योंकि यह एक बदनुमा दाग है जो उसकी अन्तर्राष्ट्रीय छवि को आघात लगा रहा है।

दुनिया में बंदूक की संस्कृति को बल देने वाले अमेरिका के लिये अब यह खुद के लिये एक बड़ी समस्या बन चुकी हैं। अमेरिका घृणा, अपराध, हिंसा और बंदूक संस्कृति के गढ़ के रूप में पहचान बना रहा है। किसी सिख या किसी मुस्लिम बच्चे की हत्या हो या किसी अश्वेत पर बर्बरता, अमेरिका की स्थिति लगातार निंदनीय, डरावनी एवं असंतुलित होती जा रही है। कोई भी सामान्य सा दिखने वाला आदमी हथियार लेकर आता है और अनेक लोगों की जान ले लेता है। नवीनतम घटना 25 अक्तूबर को देर रात ‘एंड्रोस्कोगिन काऊंटी’ के अंतर्गत पडने वाले लेविस्टन में हुई, इस हादसे का सबसे खराब पहलू यह है कि अनेक लोग भगदड़ की वजह से घायल हुए तो अनेक हत्यारे की गोलियों से गहरी नींद सो गये हैं।

नरसंहार के कथित आरोपी 40 वर्षीय रॉबर्ट कार्ड को पुलिस ने हथियारबंद और खतरनाक व्यक्ति माना है, पर सवाल है कि क्या वह रातों-रात हत्यारा एवं हिंसक हुआ है? हत्यारा रॉबर्ट कार्ड अमेरिकी सेना से जुड़ा रहा है और आग्नेयास्त्र प्रशिक्षक है। मानसिक अस्वस्थता एवं मनो विकारों से ग्रस्त हत्यारे के खिलाफ अनेक शिकायतें पहले भी मिल चुकी थी, प्रश्न है कि उन्हें क्यों नहीं गंभीरता से लिया गया। अमेरिका में आए दिन ऐसी खबरें आती रही कि किसी सिरफिरे ने अपनी बंदूक से कहीं स्कूल में तो कभी बाजार में अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और उसमें नाहक ही लोग मारे गए। अब तो अमेरिकी बच्चों के हाथों में भी बन्दूकें हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण वहां आम लोगों के लिए हर तरह के बंदूकों की सहज उपलब्धता है और इन बन्दूकों का उपयोग मामूली बातों और उन्मादग्रस्त होने पर अंधाधुंध गोलीबारी में होता रहा है, जो गहरी चिन्ता का कारण बनता रहा।

आम जन-जीवन में किसी सिरफिरे व्यक्ति की सनक से किसी बड़ी अनहोनी का अन्देशा हमेशा वहां बना रहता है, वहां की आस्थाएं एवं निष्ठाएं इतनी जख्मी हो गयी कि विश्वास जैसा सुरक्षा-कवच मनुष्य-मनुष्य के बीच रहा ही नहीं। साफ चेहरों के भीतर कौन कितना बदसूरत एवं उन्मादी मन समेटे है, कहना कठिन है। अमेरिका की हथियारों की होड़ एवं तकनीकीकरण की दौड़ पूरी मानव जाति को ऐसे कोने में धकेल रही है, जहां से लौटना मुश्किल हो गया है। अब तो दुनिया के साथ-साथ अमेरिका स्वयं ही इन हथियारों एवं हिंसक मानसिकता का शिकार है। दरअसल, अमेरिका अपने यहां नफरत, मानसिक असंतुलन, विद्रोह एवं असंतोष रोकने के अभियान में नाकाम हो रहा है।

एफबीआई की वार्षिक अपराध रिपोर्ट रेखांकित करती है कि बंदूक संस्कृति एवं इससे जुड़ी हिंसा बहुत व्यापक हो गई है। पिछले साल अमेरिका में लगभग पांच लाख हिंसक अपराधों में बंदूकों का इस्तेमाल किया गया था। वर्ष 2020 में बंदूक संस्कृति अमेरिकी बच्चों की मौत का मुख्य कारण बन गई और 2022 में हालात और बदतर हो गए। जान गंवाने वाले बच्चों की संख्या 12 प्रतिशत बढ़ गई। इन हालातों में अमेरिका किस तरह दुनिया का आदर्श बन सकता है। जबकि दुनिया अमेरिकी संस्कृति का अनुसरण करती है, वहीं अमेरिका तमाम देशों की सामाजिक व मानवाधिकार रिपोर्ट जारी करता है। अमेरिका अगर अपनी कथनी-करनी का भेद मिटाने की ओर बढ़े, तो उसके साथ-साथ दुनिया को ज्यादा फायदा होगा।

राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार अमरीका में ‘बंदूक संस्कृति’ बढ़ाने में वहां की नकारात्मक राजनीति की बड़ी भूमिका है। आम जनता तो हथियारों पर अंकुश लगाने के पक्ष में है परंतु अपने निहित स्वार्थों के कारण अमरीका में हथियारों को बढ़ावा देने वाली वहां की सशक्त हथियार लॉबी और राजनीति से जुड़े लोग इस पर अंकुश नहीं लगने देते। जब भी बंदूक संस्कृति पर नियंत्रण करने की बात उठती है तो हथियार रखने के संवैधानिक अधिकार की कट्टर समर्थक मानी जाने वाली ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के नेता और उनके समर्थक इसके विरोध में उतर आते हैं जिनके सामने डैमोक्रेटिक पार्टी बेबस होकर रह जाती है। पिछले साल जून में भारी तादाद में लोगों ने सड़कों पर उतर कर बंदूकों की खरीद-बिक्री से संबंधित कानून को बदलने की मांग की। जरूरत इस बात की है कि इस समस्या के पीड़ितों को राहत देने के साथ-साथ बंदूकों के खरीददार से लेकर इसके निर्माताओं और बेचने वालों पर भी सख्त कानून के दायरे में लाया जाए। विडम्बना देखिये कि अमेरिका दुनिया का सबसे अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित देश है लेकिन उसके नागरिक सबसे अधिक असुरक्षित और भयभीत नागरिक हैं। वहां की जेलों में आज जितने कैदी हैं, दुनिया के किसी भी देश में नहीं हैं। ऐसे कई वाकये हो चुके हैं कि किसी रेस्तरां, होटल या फिर जमावड़े पर अचानक किसी सिरफिरे ने गोलीबारी शुरू कर दी और बड़ी तादाद में लोग मारे गए।

खुद सरकार की ओर से कराए गए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया था कि अमेरिका में सत्रह साल से कम उम्र के करीब तेरह सौ बच्चे हर साल बंदूक से घायल होते हैं। अमेरिकी प्रशासन को ‘बंदूक संस्कृति’ ही नहीं बल्कि हथियार संस्कृति पर भी अंकुश लगाना होगा, अब तो दुनिया को जीने लायक बनाने में उसे अपनी मानसिकता को बदलना होगा। किसी भी संवेदनशील समाज को इस स्थिति को एक गंभीर समस्या के रूप में देखना-समझना चाहिए। यह बेवजह नहीं है कि जिस अमेरिका में ज्यादातर परिवारों के पास अलग-अलग तरह की बंदूकें रही हैं, वहां अब इस हथियार की संस्कृति के खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं।  देर आये दुरस्त आये की कहावत के अनुसार अमेरिका की आंखे खुले तो अमेरिका के साथ दुनिया को एक शांति एवं अहिंसा का सन्देश जायेगा।

‘मन जो चाहे वही करो’ की मानसिकता वहां पनपती है जहां इंसानी रिश्तों के मूल्य समाप्त हो चुके होते हैं, जहां व्यक्तिवादी व्यवस्था में बच्चे बड़े होते-होते स्वछन्द हो जाते हैं। ‘मूड ठीक नहीं’ की स्थिति में घटना सिर्फ घटना होती है, वह न सुख देती है और न दुःख। ऐसी स्थिति में आदमी अपनी अनंत शक्तियों को बौना बना देता है। यह दकियानूसी ढंग है भीतर की अस्तव्यस्तता को प्रकट करने का। ऐसे लोगों के पास सही जीने का शिष्ट एवं अहिंसक सलीका नहीं होता। वक्त की पहचान नहीं होती। ऐसे लोगों में मान-मर्यादा, शिष्टाचार, संबंधों की आत्मीयता, शांतिपूर्ण सहजीवन आदि का कोई खास ख्याल नहीं रहता। भौतिक सुख-सुविधाएं ही जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है। अमेरिकी नागरिकों में इस तरह का एकाकीपन उनमें गहरी हताशा, तीव्र आक्रोश और विषैले प्रतिशोध का भाव भर रहा है। वे मानसिक तौर पर बीमार हो जाते हैं और अपने पास उपलब्ध खतरनाक एवं घातक बन्दूकों का इस्तेमाल कर हत्याकांड कर बैठते हैं।

ललित गर्ग
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