NEW English Version

आदिवासी जनजीवन के नये जन्म का उजाला

-डॉ. गणि राजेन्द्र विजयजी के 49वें जन्म दिवस पर 19 मई 2024-

सुखी परिवार अभियान के प्रणेता, आदिवासी जनजीवन के मसीहा एवं प्रख्यात जैन संत गणि राजेन्द्र विजय पिछले 36 वर्षों से आदिवासी विषयों एवं मुद्दों को लेकर सक्रिय है, उन्होंने आदिवासी जनजीवन के उन्नयन एवं विकास के लिये अनेक जनकल्याणकारी गतिविधियों-योजनाओं जिनमें शिक्षा, सेवा, चिकित्सा एवं आर्थिक उन्नयन के उपक्रम किये हैं, जो आदिवासी जन-जीवन में उतरती रोशनी है। हाल ही में गुजरात में 4400 करोड़ की परियोजनाओं का शुभारंभ करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आनलाइन कवांट की आदिवासी महिलाओं से बातचीत करते हुए गणि राजेन्द्र विजय को जिस स्नेह एवं आत्मीयता से याद किया, समूचे देश ने यह परिदृश्य देखा और उनकी सेवाओं को महसूस किया।

मोदी का इस तरह इस संत पुरुष को याद करना,उनके गौरव को, उनकेे होने का भान कराता हैं। इस वर्ष गणि राजेन्द्र विजयजी अपने जन्म दिन 19 मई, 2024 को गुजरात के आदिवासी क्षेत्र कवांट में देश के पहले कौशल विकास विश्वविद्यालय ‘भगवान आदिनाथ आदिवासी कौशल विश्वविद्यालय’ के बीज को आकार देने को तत्पर हो रहे हैं, जिससे भारत के कौशल का दुनिया में डंका बजेगा एवं आदिवासी जनजीवन विकास की एक नई गाथा लिखने को तत्पर हो सकेगा।

निश्चित ही गणि राजेन्द्र विजयजी आदिवासी समाज को उचित दर्जा दिलाने एवं उनकी समस्याओं के समाधान के लिये तत्पर है। वे स्वयं समर्थ एवं समृद्ध है, अतः शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिये स्वयं आगे आएं। एक तरह से एक संतपुरुष के प्रयत्नों से एक सम्पूर्ण पिछडा एवं उपेक्षित आदिवासी समाज स्वयं को आदर्श रूप में निर्मित करने के लिये तत्पर हो रहा है, यह एक अनुकरणीय एवं सराहनीय प्रयास है। लेकिन इन आदिवासी लोगों को राजनीतिक संरक्षक भी मिले, इसके लिये वे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से सम्पर्क स्थापित कर आदिवासी जीवन के दर्द से उन्हें अवगत कराया एवं इस बार के लोकसभा चुनाव में आदिवासी लोगों को सक्रिय किये हुए है। भारतीय समाज में जिन आदर्शों की कल्पना की गई है, वे भारतीयों को आज भी उतनी ही श्रद्धा से स्वीकार हैं। मूल्य निष्ठा में जनता का विश्वास अभी तक समाप्त नहीं हुआ। व्यक्ति अगर अकेला भी हो पर नैतिकता का पक्षधर हो और उसका विरोध कोई ताकतवर कुटिलता और षड्यंत्र से कर रहा हो तो जनता अकेले आदमी को पसन्द करेगी। इन्हीं मूल्यों की प्रतिष्ठापना, गणि राजेन्द्र विजय के मिशन एवं विजन का उद्देश्य है।

गणि राजेन्द्र विजय एक ऐसा व्यक्तित्व है जो आध्यात्मिक विकास और नैतिक उत्थान के प्रयत्न में तपकर और अधिक निखरा है। वे आदिवासी जनजीवन के उत्थान और उन्नयन के लिये लम्बे समय से प्रयासरत हैं और विशेषतः आदिवासी जनजीवन में शिक्षा की योजनाओं को लेकर जागरूक है, इसके लिये सर्वसुविधयुक्त करीब 12 करोड की लागत से एकलव्य आवासीय माडल विद्यालय का निर्माण होकर विगत दो दशकों से शिक्षा की नई उपलब्धियां एवं कीर्तिमान उनके प्रयत्नों से स्थापित कर रहा है। वर्ष 2007 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस विद्यालय एवं अन्य योजनाओं का शुभारंभ करीब डेढ़ लाख आदिवासी लोगों के बीच किया, इतनी विशाल आदिवासी उपस्थिति गणिजी के इस क्षेत्र में प्रभाव को दर्शा रही थी। उनके नेतृत्व में अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित है, जिनमें कन्या शिक्षा के लिये ब्राह्मी सुन्दरी कन्या छात्रावास का कुशलतापूर्वक संचालन हो रहा हैं। इसी आदिवासी अंचल में जहां जीवदया की दृष्टि से गौशाला संचालित है तो चिकित्सा और सेवा के लिये चलयमान चिकित्सालय भी अपनी उल्लेखनीय सेवाएं दे रहा है। आदिवासी जनजीवन की आर्थिक उन्नति एवं स्वावलम्बन के लिये वे सुखी परिवार ग्रामोद्योग भी संचालित कर रहे हैं। अपने इन्हीं व्यापक उपक्रमों की सफलता के लिये वे कठोर साधना करते हैं और अपने शरीर को तपाते हैं। अपने कार्यक्रमों में वे आदिवासी के साथ-साथ आम लोगों में शिक्षा के साथ-साथ नशा मुक्ति एवं रूढ़ि उन्मूलन की अलख जगाते हैं। उनके प्रयत्नों का उद्देश्य है शिक्षा एवं पढ़ने की रूचि जागृत करने के साथ-साथ आदिवासी जनजीवन के मन में अहिंसा, नैतिकता एवं मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था जगाना है। हर आदमी अपने अन्दर झांके और अपना स्वयं का निरीक्षण करे। आज मानवता इसलिए खतरे में नहीं है कि अनैतिकता बढ़ रही है। अनैतिकता सदैव रही है- कभी कम और कभी ज्यादा। सबसे खतरे वाली बात यह है कि नैतिकता के प्रति आस्था नहीं रही।

  त्याग, साधना, सादगी, प्रबुद्धता एवं करुणा से ओतप्रोत गणि राजेन्द्र विजयजी आदिवासी जाति की अस्मिता की सुरक्षा के लिए तथा मानवीय मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने के लिए सतत प्रयासरत हैं। मानो वे दांडी पकडे़ गुजरात के उभरते हुए ‘गांधी’ हैं। इसी आदिवासी माटी में 19 मई, 1974 को एक आदिवासी परिवार में जन्में गणि राजेन्द्र विजयजी मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था में जैन मुनि बन गये। बीस से अधिक पुस्तकें लिखने वाले इस संत के भीतर एक ज्वाला है, जो कभी अश्लीलता के खिलाफ आन्दोलन करती हुए दिखती है, तो कभी जबरन धर्म परिवर्तन कराने वालों के प्रति मुखर हो जाती है। कभी जल, जमीन, जंगल के अस्तित्व के लिये मुखर हो जाती है। इस संत ने स्वस्थ एवं अहिंसक समाज निर्माण के लिये जिस तरह के प्रयत्न किये हैं, उनमें दिखावा नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, प्रचार-प्रसार की भूख नहीं है, किसी सम्मान पाने की लालसा नहीं है, किन्हीं राजनेताओं को अपने मंचों पर बुलाकर अपने शक्ति के प्रदर्शन की अभीप्सा नहीं है। अपनी धून में यह संत आदर्श को स्थापित करने और आदिवासी समाज की शक्ल बदलने के लिये प्रयासरत है और इन प्रयासों के सुपरिणाम देखना हो तो कंवाट, बलद, रंगपुर, बोडेली आदि-आदि आदिवासी क्षेत्रों में देखा जा सकता है।

गणि राजेन्द्र विजयजी परिवार को सुदृढ़ बनाने के लिये ही सुखी परिवार फाउण्डेशन के द्वारा संचालित सुखी परिवार अभियान को लेकर सक्रिय है। मेरा सौभाग्य है कि वर्ष 2006 से संचालित इस फाउण्डेशन का संस्थापक महामंत्री बनने से लेकर वर्तमान में अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। गणिजी की सर्वाेच्च प्राथमिकता है कि सबसे पहले परिवार संस्कारवान बने, माता-पिता संस्कारवान बने, तभी बच्चे संस्कारवान चरित्रवान बनकर घर की, परिवार की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकेंगे। अगर बच्चे सत्पथ से भटक जाएंगे तो उनका जीवन अंधकार के उस गहन गर्त में चला जाएगा जहां से पुनः निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा। बच्चों को संस्कारी बनाने की दृष्टि से गणि राजेन्द्र विजय विशेष प्रयास कर रहे हैं।

भारत को आज सांस्कृतिक क्रांति का इंतजार है। यह कार्य सरकार तंत्र पर नहीं छोड़ा जा सकता है। सही शिक्षा और सही संस्कारों के निर्माण के द्वारा ही परिवार, समाज और राष्ट्र को वास्तविक अर्थों में नैतिक एवं चरित्रसम्पन्न बनाया जा सकता है। मेरी दृष्टि में गणि राजेन्द्र विजयजी के उपक्रम एवं प्रयास आदिवासी अंचल में एक रोशनी का अवतरण है, यह ऐसी रोशनी है जो हिंसा, आतंकवाद, नक्सलवाद, माओवाद जैसी समस्याओं का समाधान बन रही है। अक्सर हम राजनीति के माध्यम से इन समस्याओं का समाधन खोजते हैं, जबकि समाधान की अपेक्षा संकट गहराता हुआ प्रतीत होता है। क्योंकि राजनीतिक स्वार्थों के कारण इन उपेक्षित एवं अभावग्रस्त लोगों का शोषण ही होते हुए देखा गया है। गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में आदिवासी समाज कृतसंकल्प है रोशनी के साथ चलते हुए इस आदिवासी अंचल के जीवन को उन्नत बनाने एवं संपूर्ण मानवता को अभिप्रेरित करने के लिये।

गणि राजेन्द्र विजयजी के आध्यात्मिक आभामंडल एवं कठोर तपचर्या का ही परिणाम है आदिवासी समाज का सशक्त होना। सर्वाधिक प्रसन्नता की बात है कि अहिंसक समाज निर्माण की आधारभूमि गणि राजेन्द्र विजयजी ने अपने आध्यात्मिक तेज से तैयार की है। अनेक बार उन्होंने खूनी संघर्ष को न केवल शांत किया, बल्कि अलग-अलग विरोधी गुटों को एक मंच पर ले आये। जबकि गुट व्यापक हिंसा एवं जनहानि के लिये तरह-तरह के हथियार लिये एक दूसरे को मारने के लिये उतावले रहते थे। हिंसा की व्यापक संभावनाओं से घिरे इस अंचल को अहिंसक बनाना एक क्रांति एवं चमत्कार ही कहा जायेगा।

सचमुच आदिवासी लोगों को प्यार, करूणा, स्नेह एवं संबल की जरूरत है जो गणिजी जैसे संत एवं सुखी परिवार अभियान जैसे मानव कल्याणकारी उपक्रम से ही संभव है, सचमुच एक रोशनी का अवतरण हो रहा है, जो अन्य हिंसाग्रस्त क्षेत्रों के लिये भी अनुकरणीय है। गणि राजेन्द्र विजयजी की विशेषता तो यही है कि उन्होंने आदिवासी उत्थान को अपने जीवन का संकल्प और तड़प बना लिया है। आदिवासी जन-जीवन में भी बहुत उजाले हैं, लेकिन इन उजालों को छीनने के प्रयास हुए हैं, हो रहे हैं और होते रहेंगे। आज बाहरी खतरों से ज्यादा भीतरी खतरे हैं। हिंसा और अलगाव की कई चुनौतियां हैं, जो समाधान चाहती है। पर गलत प्रश्न पर कभी भी सही उत्तर नहीं मिला करते। जब रोटी की जरूरत हो तो रोटी ही समाधान बनती है। रोटी के बिना आप किसी सिद्धान्त को ताकत का इंजेक्शन नहीं बना सकते।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »