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साहित्यिक संस्था हिन्दी की गूँज ने “सावन की फुहार” कार्यक्रम का आयोजन आभासी पटल पर किया

दिल्ली, देश की अग्रणी साहित्यिक संस्था हिन्दी की गूँज ने बीते रविवार की शाम को “सावन की फुहार” कार्यक्रम का आयोजन आभासी पटल पर किया। इस कार्यक्रम में देश- विदेश से कवियों ने अपने मनोहर गीत व कविताओं से पटल से जुड़े सभी श्रोताओं को आनंदित कर घर के अंदर ही वर्षा की फुहारों से सराबोर कर दिया।

कार्यक्रम का प्रारंभ मंजू शर्मा माधुरी ने अपनी मधुर वाणी से मां सरस्वती की वंदना- ” हे शारदे मां , अज्ञानता से हमें तार दे मां “ से किया।

पश्चिम बंगाल से जुड़ी अलका सोनी ने सावन में हरी चूड़ियों को रेखांकित करते हुए “कौन देश से उड़कर आते , नयनों के काजल से बादल” गीत प्रस्तुत करते हुए पटल को सावन के रस में डुबो दिया। ग्रेटर नोएडा से जुड़ी अर्चना सिंह ने कहा, “नदियां , झरना झील , समंदर , सभी बस गए मन के अंदर”। मध्य प्रदेश से जुड़े श्री श्याम सुंदर श्रीवास्तव ने सावन में नवल वधू की मनोदशा का वर्णन अपनी मखमली आवाज में इन पंक्तियों से किया “घूघट में शरमा गये , युगल नशीले नैन”। उनके पावस गीत “प्यास धरती की बुझाने , श्याम घन चित चोर आए “ ने सभी को सावन की फुहारों से रसमग्न कर दिया। गुजरात से जुड़ी डॉ .रानी गुप्ता ने सावन के झूलों , नई नवेली दुल्हन की चाहत से संबंधित सावन में प्रकृति के श्रंगार का वर्णन इन शब्दों में किया:

मोर पपीहा नाचे,
कुहु कुहु कोयल गाये ,
फूलों की बगिया ,
तब मन को महकाए

मुंबई से वर्षा महेश ने अपनी प्रस्तुति मन को भाव विभोर करने वाले महिया से की। उनके गीत,

अरमानों की गागरी को तुम भर कर फिर ना लाना,
  सतरंगी सपनों के अरमाँ दिखलाकर, 
   तुम फिर न चले जाना

ने सभी को मंत्र मुग्ध किया। हिन्दी की गूँज की मीडिया प्रभारी ममता श्रीवास्तव ने सावन के विरह का वर्णन करते हुए रचना प्रस्तुत की,

सुबह सुहानी , शाम रूहानी लगने लगी,
मेरा दिल धड़कने लगा,
ये तेरे गीत का असर था,
या कोई ओर बात थी।

हरिद्वार से जुड़े भूदत शर्मा ने कार्यक्रम को सनातन से जोड़ते अपनी रचना, “है अमृत धारा जिसे कहते हैं गंगा , उसकी ही गोद में तो खेले है तिरंगा “ प्रस्तुत की।

मैं बादल हूँ तुम पुरवा हो
है आज मिलन तो कल बिछुड़न
है रेत भरा  मुट्ठी जीवन,
जितना थामा उतनी फिसलन

 
मंजु शर्मा माधुरी ने सावन में शिव भक्ति को अभिव्यक्ति दी,

सावन का महीना आया, मद मस्त ये मौसम लाया,
जिसने ध्याया शिव को, मन वांछित  फल पाया।

नीदरलैंड से जुड़ी ऋतु शर्मा ननन पांडे ने प्रवासी भारतीयों द्वारा सावन के झूले, फूलों की बहार, अमिया की डाली, तीज, घेवर सभी के आनंद से वंचित रहने की पीढ़ा को व्यक्त करते हुए कहा,

परदेश में न तीज है न त्योहार है ,
परदेश लगता सूना संसार है

डॉक्टर वर्षा सिंह ने सर्वप्रथम अपनी पारंगत विधा में कुछ दोहे प्रस्तुत करते हुए कहा,

विरहन जब ये जान ले, मेघ भी रखे पाँव,
बादल से वो जिद करे, ले जा साजन गाँव।


इसके साथ ही उन्होनें सावन का मनमोहक गीत ‘ काले मेघा छाए , रिम झिम वर्षा लाए प्रस्तुत कर माहौल को सावन के रंग में रंग दिया । हिन्दी की गूंज के संयोजक व कार्यक्रम के प्रणेता नरेंद्र सिंह नीहार ने अपने निराले अंदाज में विरह की अग्नि में जल रही नायिका की मनोदशा का वर्णन करते हुए रचना प्रस्तुत की:

बहुत दिनों के बाद सजन ,
लौट के आए आज सजन
आँखों का काजल कहता है ,
उड़ता ये आँचल कहता है
अधरों की लाली कहती है ,
कानों की बाली कहती है
चुपके से बोला दर्पण

कार्यक्रम का रोचक और रसमय संचालन डॉ. ममता श्रीवास्तव और डॉ.वर्षा सिंह के द्वारा किया गया। हिन्दी की गूंज के संरक्षक गिरीश जोशी के धन्यवाद से कार्यक्रम का समापन हुआ । दो घंटे तक चले कार्यक्रम में सभी श्रोताओं ने अपनी प्रतिक्रियाओं से साहित्यकारों का उत्साह वर्धन किया । कार्यक्रम में संदेश भेजने वालों में कामता प्रसाद, निर्मला जोशी, उर्मिला रौतेला, डॉ संजय सिंह, तरुणा पुंडीर, प्रमोद चौहान,विमला रस्तोगी, रामकुमार पांडेय, अतुल खरे विवेक सिंह आदि की मुख्य भूमिका रही।

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