NEW English Version

अल्पसंख्यकों की असुरक्षा से आतंकवाद तक पाक का यथार्थ

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिया गया हालिया बयान केवल एक जहरीली एवं कड़वी राजनीतिक टिप्पणी ही नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की उस मानसिकता का आईना है, जिसमें भारत के प्रति कटुता, अविश्वास, नफरत और वैचारिक विरोध आज भी गहरे पैठे हुए हैं। जरदारी ने ‘अखंड भारत’ की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय इसमें विश्वास करते हैं, लेकिन वे मुसलमान होने के नाते इससे सहमत नहीं हैं। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान में हिंदुओं के सुरक्षित और सुखी होने का दावा भी किया। सवाल यह है कि दुनिया किसी राष्ट्राध्यक्ष के दावे पर विश्वास करे या आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविकता पर? इतिहास का न्याय भावनाओं से नहीं, तथ्यों से होता है। और पाकिस्तान के संदर्भ में जनसांख्यिकी, अल्पसंख्यकों की स्थिति, धार्मिक स्वतंत्रता और आतंकवाद-ये चारों क्षेत्र ऐसे आईने हैं जिनमें उसकी अपनी तस्वीर साफ दिखाई देती है।
1947 में जब पाकिस्तान वजूद में आया एवं 1951 की जनगणना में पूरे तत्कालीन पाकिस्तान में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 14.6 प्रतिशत थी, पाकिस्तान की 2023 की आधिकारिक जनगणना में ‘हिंदू जाति’ की आबादी 3,867,729 और ‘अनुसूचित जाति’ की आबादी 1,349,487 दर्ज की गई है। कुल आबादी 240.46 मिलियन है। इन दोनों श्रेणियों को जोड़ें तो हिस्सा लगभग 2.17 प्रतिशत बैठता है। अर्थात आज के पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की जनसंख्या हिस्सेदारी अत्यंत सीमित रह गई है। इसके विपरीत भारत की स्थिति को भी तथ्यों के साथ ही देखना चाहिए। भारत की अंतिम प्रकाशित पूर्ण जनगणना 2011 की है। उसमें मुस्लिम आबादी 14.23 प्रतिशत, यानी 17.22 करोड़ दर्ज हुई थी। यही वह बिंदु है जहां भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक अंतर सामने आता है। भारत ने धर्म के आधार पर नागरिकता की अवधारणा को राज्य की नागरिकता का आधार नहीं बनाया। संविधान ने हर नागरिक को समान नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी आस्था के पालन की स्वतंत्रता दी। भारत में मुसलमानों ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका, सेना, शिक्षा, उद्योग, कला, खेल और प्रशासन सहित जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। इसके विपरीत पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्टें गंभीर प्रश्न उठाती हैं। ह्यूमन राइटस वाच की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंसा, मनमानी गिरफ्तारी और सामाजिक दबाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। रिपोर्ट में हिंदुओं, ईसाइयों और अहमदियों सहित अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और जबरन विवाह-धर्मांतरण जैसी समस्याओं का उल्लेख है। 2023 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जरनवाला में ईशनिंदा के आरोपों के बाद चर्चों और ईसाई घरों पर भीड़ के हमले हुए। ह्यूमन राइटस वाच ने पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के इस्तेमाल से अल्पसंख्यकों की संपत्ति पर कब्जे और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के मामलों का भी दस्तावेजीकरण किया है। ऐसे में जरदारी का यह कहना कि पाकिस्तान के हिंदू बहुत खुश हैं, एक झूठा, गुमराह करने वाला एवं भ्रामक राजनीतिक दावा तो हो सकता है, लेकिन उसे व्यापक तथ्यात्मक प्रमाण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। किसी देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं या नहीं, इसका प्रमाण केवल राष्ट्राध्यक्ष का बयान नहीं, बल्कि उनके नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, मंदिरों और पूजा स्थलों की सुरक्षा, कानून के सामने समानता तथा भयमुक्त जीवन है।


भारत में सरकारों के खिलाफ मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यकों के द्वारा आवाज उठाई जा सकती है, न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती है। यही लोकतांत्रिक भारत और धार्मिक-सामुदायिक असुरक्षा से जूझते पाकिस्तान के बीच बुनियादी अंतर है। दूसरा बड़ा प्रश्न पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकवाद का है। पिछले कई दशकों में सीमा पार आतंकवाद भारत की सुरक्षा के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में रहा है। संसद पर हमला, मुंबई हमले, पठानकोट, उरी, पुलवामा और जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंसक घटनाएं इस समस्या का हिस्सा रही हैं। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर कार्रवाई की। विदेश मंत्रालय ने उस समय स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान की जमीन पर चल रहे आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध कार्रवाई की गई क्योंकि पाकिस्तान उन्हें नष्ट करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा था। 2025 में पहलगाम के आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की सुरक्षा नीति में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत दिया।

22 अप्रैल 2025 के हमले में 26 लोगों की हत्या के बाद 7 मई को भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत सरकार ने इसे आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध लक्षित और नियंत्रित कार्रवाई बताया।  यह परिवर्तन केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। भारत ने आतंकवाद के साथ-साथ उसके वित्तीय और नशीले पदार्थों के नेटवर्क पर भी ध्यान केंद्रित किया है। सरकार ने विदेशी तत्वों द्वारा नशीले पदार्थों को सीमा पार भेजकर ‘नार्को-टेरर’ को वित्त उपलब्ध कराने की बात कही है। यहां भारत की चुनौती केवल सीमा पर बंदूक लेकर खड़े आतंकवादी से नहीं है। चुनौती उस पूरे तंत्र से है जिसमें आतंकवाद, हथियार, ड्रोन, नशीले पदार्थ, फर्जी सूचनाएं और सामाजिक विभाजन-सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि आतंकवाद और बातचीत को समानांतर रास्तों पर नहीं चलाया जा सकता। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट कार्रवाई और 2025 का ऑपरेशन सिंदूर अलग-अलग घटनाएं जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे एक समान संदेश दिखाई देता है-भारत अब आतंकवाद को केवल सहने या निंदा करने तक सीमित नहीं रहेगा। इस बदले हुए भारत की तस्वीर पाकिस्तान की बेचैनी को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा उत्पादन, डिजिटल बुनियादी ढांचा, वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक प्रभाव लगातार बढ़े हैं। आज भारत को विश्व राजनीति में केवल दक्षिण एशिया की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तान की समस्या केवल यह नहीं है कि भारत उससे आर्थिक और सामरिक रूप से आगे निकल रहा है, उसकी बड़ी समस्या यह है कि भारत अपनी बहुलतावादी लोकतांत्रिक पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है।


जरदारी का बयान इसलिए भी विचारणीय है कि पाकिस्तान को भारत के भीतर की विविधता पर टिप्पणी करने से पहले अपने घर के भीतर झांकना चाहिए। भारत में मुसलमानों की आबादी बढ़ती आबादी का तथ्य स्वयं बताता है कि भारत में मुस्लिम समुदाय का अस्तित्व, विस्तार और सामाजिक जीवन किसी ‘समाप्ति’ की कहानी नहीं है। दूसरी ओर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर आज भी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं गंभीर चिंता व्यक्त कर रही हैं। इसलिए दुनिया के उन देशों को भी पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो केवल रणनीतिक या राजनीतिक हितों के कारण उसकी हर बात का समर्थन करते हैं। किसी राष्ट्र का मूल्यांकन उसके भाषणों से नहीं, उसके व्यवहार से होना चाहिए। यदि कोई देश एक तरफ आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिबद्धता जताए और दूसरी तरफ उसकी धरती से सक्रिय आतंकी नेटवर्क लगातार पड़ोसी को निशाना बनाते रहें, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को केवल कूटनीतिक शब्दों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। भारत की शक्ति का अर्थ किसी धर्म या देश के प्रति घृणा नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई है। भारत के मुसलमान भी उतने ही भारतीय हैं जितने हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अन्य समुदाय। आज पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न भारत नहीं, बल्कि स्वयं पाकिस्तान है-वह कब यह स्वीकार करेगा कि आतंकवाद को विदेश नीति का औजार बनाना अंततः उसी समाज को अस्थिर करता है जिसने उसे जन्म दिया? पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों की हिंसा का दंश स्वयं वहां के नागरिक भी झेल रहे हैं। ह्यूमन राइटस वाच के अनुसार 2025 में पाकिस्तान में विभिन्न उग्रवादी संगठनों के हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए। जरदारी को भारत के ‘अखंड भारत’ की चिंता करने से पहले अपने वर्तमान पाकिस्तान की अखंडता, शांति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए। इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जो राष्ट्र भारत की एकता पर प्रश्न उठाता है, वह स्वयं आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक विभाजन से जूझता रहा है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »