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जीवन से पलायन का डरावना सत्य है आत्महत्या

-विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस-

आत्महत्या दुनियाभर में एक गंभीर मुद्दा एवं बड़ी समस्या है। मौजूदा समय में दुनिया भर में इसके मामले खतरनाक दर से बढ़ रहे हैं। ऐसे में इस गंभीर विषय के प्रति लोगों को जागरूक करने एवं आत्महत्या का पलायनवादी विचार छोड़ने के उद्देश्य से हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस (डब्ल्यूएसपीडी) मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 2024 के लिए इस दिवस की थीम ‘चेंजिंग द नैरेटिव ऑन सुसाइड यानी ‘आत्महत्या पर कथ्य बदलना’ रखी गयी है। इस दिन को मनाने का खास मकसद इस बात को लोगों तक पहुंचाना है कि आत्महत्याओं को रोका जा सकता है। साथ ही उन्हें यह भी बताना है कि आत्महत्या के अलावा जीवन में और भी बेहतर विकल्प हैं।

इसके अलावा एक ऐसी समाज-व्यवस्था को बढ़ावा देना है जहां लोग मदद लेने में हिचहिचाए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोग के लिये आगे आये। निश्चित रूप से खुदकुशी सबसे तकलीफदेह हालात के सामने हार जाने का नतीजा होती है और ऐसा फैसला करने वालों के भीतर वंचना का अहसास, उससे उपजे तनाव, दबाव और दुख का अंदाजा लगा पाना दूसरों के लिए मुमकिन नहीं है। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में हर साल आठ लाख लोग आत्महत्या करते हैं, इससे कई गुना अधिक लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं और इसका असर बहुत ज्यादा लोगों पर पड़ रहा है। इसके अलावा, यह 15 और 29 वर्ष की आयु के लोगों की मृत्यु का चौथा सबसे बड़ा कारण है। संयुक्त राज्य अमेरिका में मृत्यु के शीर्ष 10 प्रमुख कारणों में से एक आत्महत्या है, जहां हर 11 मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। भारत में प्रतिवर्ष 135,000 लोग आत्महत्या करते हैं, जो दुनिया की कुल आत्महत्याओं का 17 प्रतिशत हैं। आत्महत्या करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे बुढ़ापा, दीर्घकालिक बीमारियाँ, वित्तीय समस्याएँ, आत्महत्या का पारिवारिक इतिहास, आय में कमी, वैवाहिक अलगाव, नकारात्मक जीवन के अनुभव, विकलांगता की ओर ले जाने वाली शारीरिक बीमारी आदि।

इसके अलावा, कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ आत्महत्या के बढ़ते जोखिम से जुड़ी हुई हैं, जैसे शराब की लत, अवसाद, तनाव, विकार आदि। लोग अवसाद, लाचारी और जीवन में कुछ नहीं कर पाने की हताशा के चलते भी आत्महत्या करते हैं। मौजूदा समय में दुनिया भर में आत्महत्या के मामले खतरनाक दर से बढ़ रहे हैं। आत्महत्यामुक्त समाज-संरचना के लिए लंबे समय से कई तरह की कोशिशें की जा रही हैं। आत्महत्या एक गंभीर मुद्दा है, जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। आत्महत्या एक वैश्विक चुनौती है, जिससे हर साल लाखों लोग प्रभावित होते हैं। इस दिवस के माध्यम से सरकारों, संगठनों, समुदायों और व्यक्तिगत स्तर पर लोगों को आत्महत्या रोकने के लिए कदम उठाने की प्रेरणा दी जाती है।

भारतीय संदर्भ में आत्महत्या एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2021 में आत्महत्या करने वाली महिलाओं में गृहिणियों का अनुपात 51.5 प्रतिशत था। इस संदर्भ में केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक सूची में शीर्ष पर हैं। आत्महत्या की कुल घटनाओं में लगभग 15 प्रतिशत गृहिणियों से संबंधित हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करती है। पिछले दो दशकों में, आत्महत्या की दर 7.9 से बढ़कर 10.3 प्रति 100,000 हो गई है। 2021 की रिपोर्ट पर गौर करें तो उत्तराखंड में एक वर्ष में 717 लोगों ने आत्महत्या की।

इसमें 463 महिलाएं हैं और इसका सबसे बड़ा कारण पारिवारिक समस्या है। ऐसे में मनोविज्ञानियों की सलाह है कि परिवार में सामंजस्य बनाकर ही खुशहाल जिंदगी जीना संभव है। इसके लिए जागरूकता की जरूरत है जिससे की सकारात्मक सोच के साथ संघर्ष करने की सामर्थ्य पैदा हो सके। युवा वर्ग की महत्वाकांक्षा अपनी योग्यता व क्षमता से अधिक हो चुकी है। परिवार पर नियंत्रण नहीं है और न ही सामंजस्य रह गया है। तनाव सहने की क्षमता नहीं है। असफलता का डर और पारिवारिक समस्याएं व्यक्ति को पूरी तरह प्रभावित कर रही है, जिसकी वजह आत्महत्याएं हो रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 36 प्रतिशत लोग गंभीर अवसाद से ग्रस्त हैं इसलिए हमें सबसे पहले अवसाद को दूर करना होगा। आर्थिक संपन्नता के साथ ही मानसिक रूप से स्वस्थ होने पर जोर देना होगा।

वहीं जिस तरह किशोरों में पढ़ाई के दबाव से आत्महत्या के मामले बढ़ गए हैं। इसे लेकर भी अभिभावकों से लेकर समाज को नए सिरे विचार करना होगा। बच्चों को शुरुआत से ही उसकी पसंद के करियर के साथ जीवन के झंझावतों को झेलने के लिए भी प्रेरित करते रहना होगा। आजकल कई लोग मानसिक समस्याओं का शिकार हो रहे हैं। इन दिनों लोग अपनी लाइफस्टाइल में बदलाव की वजह से कई सारी समस्याओं का शिकार होते जा रहे हैं। दुनियाभर में तनाव और डिप्रेशन से कई सारे जूझ रहे हैं। यह एक तरह का गंभीर मानसिक विकार है, जिसके सही इलाज न मिलने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। डिप्रेशन के शिकार कई लोग खुदकुशी तक कर लेते हैं।

इधर तीन-चार दशकों में चिकित्सा विज्ञान की प्रगति से जहां बीमारियों से होने वाली मृत्यु संख्या में कमी आयी है, वहीं इस वैज्ञानिक प्रगति, भौतिकवादी जीवनशैली एवं तथाकथित विकास के बीच आत्महत्याओं की संख्या पहले से अधिक हो गई है। चिंता की बात यह भी है कि आज के सुविधाभोगी एवं प्रतिस्पर्धी जीवन ने तनाव, अवसाद, असंतुलन को बढ़ावा दिया है, अब सन्तोष धन का स्थान अंग्रेजी के मोर धन ने ले लिया है। जब सुविधावादी मनोवृत्ति, कैरियर एवं बी नम्बर वन की दौड़ सिर पर सवार होती हैं और उन्हें पूरा करने के लिये साधन, सामर्थ्य एवं परिस्थितियां नहीं जुटा पाते हैं, या काम का दबाब अति हो जाता है, तब कुंठित, तनाव एवं अवसादग्रस्त व्यक्ति को अन्तिम समाधान आत्महत्या में ही दिखता है।

सिनेमा में हंसता-खेलता और सार्वजनिक जीवन में लोगों का पसंदीदा बन गया कलाकार आखिर किसी दिन अचानक खुदकुशी कर लेता है। मगर किसी भी स्थिति में जीवन खो देने के बजाय हालात से लड़ना और उसका हल निकालना ही बेहतर रास्ता होता है, यह सीख कौन देगा? पर मुख्य सवाल यही रह जाता है कि आमतौर पर सभी सुविधाओं एवं समृद्धताओं के शिखर पर स्थापित एवं अपने आसपास कई स्तर पर समर्थ लोगों की दुनिया में सार्वजनिक रूप से अक्सर मजबूत दिखने के बावजूद कोई व्यक्ति भीतर से इतना कमजोर क्यों हो जाता है कि जिंदगी के उतार-चढ़ाव या झटकों को बर्दाश्त नहीं कर पाता? पर वे कौन-सी और कैसी असामान्य परिस्थितियां इन कलाकारों के सामने रही कि उन्होंने उनसे बचने या टकराने के बजाय जिंदगी की हार यानी आत्महत्या का रास्ता चुना?

जो परिवार तलाक, अलगाव, आर्थिक कलह एवं अभावों, रिश्तों के कलह के कारण टूटी हुयी स्थिति में होते हैं उनमें भी आत्महत्या की घटनाएं अधिक पायी जाती हैं। राजनैतिक उथल-पुथल और व्यापार में नुकसान, आर्थिक तंगी भी आत्महत्या का कारण बनती है। किसानों की फसल की तबाही और कर्ज की अदायगी की चिंता से हो रही आत्महत्या भी गंभीर समस्या बन गई है। कर्ज लेकर घी पीने की जीवनशैली ने भी सबकुछ दांव पर लगा दिया है। औद्योगीकरण तथा नगरीकरण में वृद्धि भी इसके कारण है। भौतिक मूल्यों के बढ़ते हुए प्रभाव ने सामाजिक सामंजस्य की नई समस्याओं को जन्म दिया है। लेकिन आत्महत्या किसी भी सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के भाल  पर एक बदनुमा दाग है, कलंक हैं।

टायन्बी ने सत्य कहा हैं कि कोई भी संस्कृति आत्महत्या से मरती है, हत्या से नहीं।’ आत्महत्या की इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण स्थितियों पर नियंत्रण जरूरी है। इसके लिये जब कोई व्यक्ति ऐसी स्थितियों से गुजर रहा होता है, तो उसमें आस-पड़ोस, रिश्तेदार, दोस्त, सहकर्मी आदि उसे उनसे बाहर निकालने का प्रयास करते हैं। मगर हैरानी की बात है कि अब समाज अपनी यह भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहा है। इस चिंताजनक स्थिति से निपटने के लिए सरकार के स्तर पर कारगर उपाय जुटाने की दरकार है। जिंदगी ख़ुद को सुधारने का एक मौका हर किसी को जरूर देती है, लेकिन सुसाइड तो जिंदगी ही छीन लेती है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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