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देश की आजादी का मसीहा : पंडित मदन मोहन मालवीय

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम देश के उन गिने-चुने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में से है, जो उच्च से उच्चतम और छोटा एवं निकृष्टम हर कार्य हर  क्रियाकलापों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया, जो देश की आजादी की राह में बढ़ता हो, और जिसकी मंजिल स्वंतंत्रता और स्वराज हो। उन्होंने कभी भी किसी काम से गुरेज नहीं किया। कभी किसी कार्य को छोटा नहीं समझा।

पंडितजी कभी नेता बनकर तो कभी अनुयायी बनकर तो कभी सर्वेसर्वा बनकर तो कभी उदासीन बनकर देश की सेवा की। पंडित मदन मोहन कांग्रेस पार्टी के सक्रिय सदस्य बन गये। उन्होंने देश की आजादी के लिये स्थानीय एवं व्यक्तिगत प्रयास भी किया, पर उनका विचार था कि कांग्रेस जैसी स्थापित एवं लोकप्रिय संस्था का सदस्य बनने से उन्हें एक अच्छा एवं मजबूत मंच मिल जायेगा, जिससे अपने कार्यों को व्यापक रूप से किया जा सकेगा। उन्हें मालूम था कि कांग्रेस पार्टी अंग्रेजी हुकूमत की नाक में नकेल डाली हुई हैं, वह ब्रिटिश सरकार को स्वतंत्रता से कुछ करने नहीं दे रही है। यही कारण था कि उसकी सारे देश में लोकप्रियता काफी बढ गई थी। बस इन्ही सब वजहों से पंडितजी ने इस मचं पर आना स्वीकार किया। इसके बाद वे निरंतर इसकी सेवा करते रहे।

पंडित मालवीय का व्यक्तित्व  बडा ही निराला था। वह कभी भी कुछ भी चौंकाने वाले कार्य करते रहते थे। वे कभी कांग्रेस के असहयोग आंदोलन या सत्याग्रह की आलोचना करते थे, तो कभी स्वयं आंदोलन कारी बन जाते थे, या सत्याग्रही बन कर जेल चले जाते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि वह हर प्रकार से भारत की आजादी के लिये प्रयत्नशील रहते थे।

मालवीयजी अपने निश्चय के बडे पक्के थे। उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही रहकर उसका विरोध किया, परंतु कांग्रेस से कभी अलग नहीं हुए। जिस काम को वे ठीक समझते, उसमें चाहे कोई उनका साथ दे या न दे, पर उसमें अडिग रूप से लगे रहते थे। काशी का हिन्दू विश्वविद्यालय उनके ही प्रयत्नों का जीता जागता प्रमाण है। इन्होंने शैक्षिक विकास के लिये भी बड़ा उल्लेखनीय कार्य किया। खासकर शैक्षणिक गतिविधियों के लिये उन्होंने दूरदूर तक का भ्रमण किया एवं इसके प्रति लोगों को जागरुक किया।

मालवीयजी को कांग्रेस ने दो दो बार अपने अधिवेशनों का सभापति बनाया। 1916 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन लखनऊ में हुआ। इस अधिवेशन में गरमदल तथा नरम दल वालों के मतभेद जो पूर्व से कायम थे, वह खत्म हो गये। लोकमान्य तिलक तथा उनके साथी और अनुयायी पुनः कांग्रेस में आ गये। उसी अधिवेशन में कांग्रेस तथा लीग ने सुधारों की एक योजना बनाई। यह योजना लखनऊ पैक्ट के नाम से विख्यात है। लखनऊ अधिनवेशन में मुस्लिम लीग के नेताओं ने भी भाग लिया। कांग्रेस ने इस समय स्वराज प्राप्ति की योजना बनाई।

पुनः 1918 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन दिल्ली में हुआ। जिसके सभापति महामना पंडित मदन मोहन मालवीय बनाये गये। यह अधिवेशन बडा शानदार तथा सफल रहा जिसके ‘पंडित मालवीय की अथक प्रयत्न लगी थी। कांग्रेस ने इस अधिवेशन में जोरदार शब्दों में स्वराज्य की मांग रखी और यह भी अपील की कि उसकाम को पूरा करने के लिए हिन्दू और मुसलमानों को कन्धे से कन्धा मिलाकर काम करना चाहिये। महामना मालवीयजी ने हिन्दु मुस्लिम एकता के लिये इस अधिवेशन में बडी मार्मिक अपील की।

       गांधीजी द्वारा चलाये गये असहयोग आंदोलन के स्थगित हो जाने के बाद 1923 ई में पार्टी की एक बैठक इलाहाबाद में हुई। इसी बैठक में पार्टी का विधान तथा कार्यक्रम निश्चित किया गया, जिसमें मालवीय जी के तर्कों एवं विचारों को प्रमुखता से स्थान दिया गया। पार्टी का तात्कालिक लक्ष्य औपनिवेशिक स्वराज्य और अंतिम लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता रखा गया। 1924 ई. में भारत में चुनाव हुये। स्वराज्य पार्टी ने खूब जोर लगाकर चुनाव लड़ा। कई प्रांतों में इस दल को बहुमत प्राप्त हो गया। स्वराज्य, पार्टी ने तब बड़े ही… धडल्ले से सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाई, परंतु गवर्नर को जो अधिकार दिये गये थे उसके कारण इनका वो प्रभाव नहीं हो सका। इसी बीच चितरंजन दास की मृत्यु हो गई इससे स्वराज पार्टी को जबरदस्त धक्का लगा। उनकी मृत्यु के बाद स्वराज पार्टी में प्रभावशाली नेताओं की कमी हो गई। पंडित मदन मोहन मालवीय भी अपने कुछ  मतान्तरों के कारण स्वराज्य पार्टी से अलग हो गये। जिससे स्वराज्य पार्टी के कमर ही टूट गई। और सरकार भी उसकी उपेक्षा करने लगी। पंडित जी ने पुन: सामाजिक जन जागरण का कार्य राष्ट्रीय स्तर पर फैलाना प्रारंभ किया। उनके महानतम प्रयासों के कारण ही देश ने स्वतंत्रता का वह दिन देखा जिसकी प्रभात बेला को देखने के लिये ही कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने जीवन की आहुति दे दी थी।

       – सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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