NEW English Version

प्रकाशन उद्योग पर संकट: डाक शुल्क में भारी वृद्धि से उत्पन्न समस्याएँ

 – डाक सेवा महंगा होने से देश में साक्षरता, शिक्षा और बौद्धिक विकास को भारी झटका लगेगा

 नई दिल्ली। नये साल के तोहफे के तौर पर सरकार ने आम पाठक और प्रकाशकों को ऐसा तोहफा दिया है कि ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले प्रकाशन उद्योग के सामने अंधेरा छा गया है। साथ ही पाठकों को भी अब किताबों को पढने के लिए मोटी कीमत चुकानी पड़ेगी, जिसका असर देश में साक्षरता, शिक्षा और बौद्धिक विकास को भारी झटका लगेगा। दरअसल डाक विभाग ने छपी किताबों को डाक से भेजने के शुल्क में 18 दिसम्बर 2024 से एक दो नहीं बल्कि करीब 7 (सात) गुने तक की बढोतरी कर दी है। इसको लेकर देशभर के तीन सौ से ज्यादा प्रकाशकों के संगठन भारतीय प्रकाशक संघ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर इस इंडस्ट्री (प्रकाशन उद्योग और पाठकों को) को बचाने की गुहार लगाई है। दरअसल नई नियम के अनुसार एक किलो किताब को भेजने के लिए पहले जहां 30 रुपये शुल्क चुकाना होता था अब नये नियम के अनुसार 111 रुपये 40 पैसा देना होगा। पांच किलो के लिए पहले 70 रुपये का शुल्क देना होता था अब इतने वजन के लिए 489 रुपये देना होगा। 

भारतीय प्रकाशन उद्योग (एफआईबी)  ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि पंजीकृत पुस्तक डाक (आरबीपी) सेवा (अब इसे रजिस्र्टड पोस्ट कर दिया गया है) को बंद करने के फैसले से इंडस्ट्री गंभीर चिंता और निराशा में डूब गई है। इस अचानक, अघोषित नीति परिवर्तन ने पूरे प्रकाशन उद्योग को चौंका दिया है और व्यथित कर दिया है। एफआईबी से जुड़े डायमंड पॉकेट बुक्स के निदेशक नरेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि सरकार का यह फैसला प्रकाशन उद्योग के साथ-साथ लोगों की पढने की रूचि को भी प्रभावित करेंगी। इसके साथ ही किताबें इतनी महंगी हो जाएगी कि उसे खरीदना आम आदमी के बस की नहीं होगी। इससे सरकार की देश को शिक्षित करने की योजनाएं भी प्रभावित होंगी।

नरेन्द्र कुमार वर्मा
नरेन्द्र कुमार वर्मा

नरेन्द्र कुमार वर्मा ने कहा कि एफआईबी ने इस मसले को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखा है और उनसे आग्रह किया है कि इस फैसले को वापस लिया जाए। उन्होंने कहा कि पहले तीन फीसद जीएसटी लिया जा रहा था उसे अचानक से बढाकर 18 फीसद कर दिया गया है। उन्होंने सवाल किया कि जिस देश के बच्चों को ज्ञान अर्जित करने पर जीएसटी देना पड़ेगा वह देश कैसे शिक्षित होगा। उन्होंने कहाकि प्रति 10 रुपये किलो के हिसाब से किताब भेजने का शुल्क लगता था, जिसमें 17 रुपये फिक्स चार्ज था और तीन रुपये जीएसटी। इस तरह एक किलो किताब को भेजने में 30 रुपये खर्च बैठता था अब उसके लिए 111.40  रुपये चुकाना पड़ रहा है। जिसमें एक किलो के लिए 80/-, 17/- रुपये फिक्स चार्ज और जीएसटी के लिए 14.4 रुपये देना पड़ रहा है। 

एफआईबी के अध्यक्ष नवीन गुप्ता का कहना है कि पंजीकृत पुस्तक डाक सेवा प्रकाशकों के लिए जीवन रेखा थी – निजी और सरकारी दोनों – जो पुस्तकों, पाठ्यपुस्तकों, पत्रिकाओं और अन्य शैक्षिक सामग्रियों को भारत के सबसे दूरदराज के इलाकों में वितरित करने के लिए सस्ती और कुशल साधन प्रदान करती थी। उन्होंने कहा कि रजिस्र्टड  बुक पोस्ट का नाम बदल कर रजिस्र्टड पोस्ट कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि कीमतों में सात गुने तक की की वृद्धि करने के निर्णय के गंभीर परिणाम होंगे। प्रकाशकों पर बोझ बढेगा और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।  शिक्षा के क्षेत्र में बाधाएँ आयेगी और साक्षर और शिक्षित भारत के आपके सपने को नुकसान पहुंचेगा। भारत के बौद्धिक परिदृश्य का विकास अवरुद्ध होगा। क्षेत्रीय और स्थानीय साहित्य के लिए यह खतरा होगा। एफआईबी ने पीएम से आग्रह किया है कि वह सब्सिडी दरों के साथ पंजीकृत पुस्तक डाक सेवा को बहाल करें शिक्षा और प्रकाशन उद्योग को बचाए। 

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »