स्वार्थ साधते सब फिरें, करते जग व्यवहार।
माया परदा है पड़ा, तमस घिरा उजियार।।
रहे चाहते देह को, नख शिख सुघर सजाय।
मोह काम जीते रहे, ईश्वर सहज भुलाय।।
मैं-मैं जग करता रहा, परम तत्व को छोड़।
सतगुरु कह चल मायके, माया बंधन तोड़।।
सतगुरु हैं सुख औषधी, मिटें सकल जग ताप।
परम तत्व से जा मिलें, काट कुलिस भव चाप।।
सेमर-जग में मन लगा, परम पिता को भूल
दारा धन सुत चाह में, छोड़ दिया सुखमूल।।

शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)