इतिहास केवल अतीत का लेखा-जोखा नहीं होता, वह किसी राष्ट्र की आत्मा का दर्पण भी होता है। यदि इतिहास के पन्नों पर धूल जम जाए, तो पीढ़ियां अपने गौरव, संघर्ष और स्वाभिमान की जड़ों से कटने लगती हैं। भारत के इतिहास में हल्दीघाटी का युद्ध ऐसा ही एक प्रसंग है, जिसे लेकर वर्षों से अनेक मत, व्याख्याएं और विवाद सामने आते रहे हैं। अब उदयपुर में 17 जून को आयोजित होने जा रहे विशाल कार्यक्रम के माध्यम से इस ऐतिहासिक युद्ध के संबंध में नए तथ्यों और प्रमाणों को जनमानस के समक्ष रखने का प्रयास किया जा रहा है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की उपस्थिति में आयोजित इस राष्ट्र चेतना संकल्प सभा का उद्देश्य केवल एक ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सत्य को पुनः स्थापित करना भी है, जिसे अनेक इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने लंबे समय से प्रमाणित करने का प्रयास किया है।
हल्दीघाटी : युद्ध नहीं, स्वाभिमान का उद्घोष
18 जून 1576 को मेवाड़ के महाराणा प्रताप और मुगल सम्राट अकबर की ओर से सेनापति राजा मानसिंह के नेतृत्व वाली सेना के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ था। सामान्यतः इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इसे अनिर्णायक युद्ध बताया गया, किंतु अनेक इतिहासकारों का मत है कि युद्ध के तत्कालीन परिणामों, युद्ध के बाद की परिस्थितियों और मुगल सेना की रणनीतिक विफलताओं का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि महाराणा प्रताप की सैन्य क्षमता और संघर्ष भावना ने मुगलों को निर्णायक सफलता से वंचित रखा।

यह फोटो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) द्वारा निर्मित है
इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा, कर्नल जेम्स टॉड और कई आधुनिक शोधकर्ताओं ने उल्लेख किया है कि यदि युद्ध में मुगल सेना विजयी हुई होती, तो मेवाड़ तत्काल मुगल शासन के अधीन आ जाता। किंतु वास्तविकता यह है कि महाराणा प्रताप ने न केवल अपने अधिकांश क्षेत्र को बाद में पुनः प्राप्त किया, बल्कि जीवनपर्यंत अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। यही तथ्य उनके संघर्ष को असाधारण बनाता है।
घोड़ों का मांस खाने की कथा : इतिहास या मिथक?
वर्षों से यह कथा प्रचारित होती रही कि युद्ध के बाद महाराणा प्रताप जंगलों में भटकते रहे, घास की रोटी खाते रहे और मुगल सेना ने उन्हें लगभग परास्त कर दिया था। दूसरी ओर कई शोधकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी अनेक कथाएं बाद के साहित्यिक और औपनिवेशिक लेखन में अतिरंजित रूप से जोड़ी गईं। युद्ध के बाद की वास्तविक स्थिति यह थी कि मुगल सेना को गोगुंदा क्षेत्र में लंबे समय तक रुकना पड़ा। अनेक ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि उन्हें रसद संकट का सामना करना पड़ा और स्थानीय जनता के प्रतिरोध के कारण आपूर्ति बाधित हुई। उन्हें घोड़े का मांस खाना पड़ा। यही वह तथ्य है जिसके आधार पर कुछ इतिहासकार यह निष्कर्ष निकालते हैं कि युद्ध का मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक लाभ महाराणा प्रताप के पक्ष में था।

![India Divided [Paperback] Prasad, Rajendra](https://m.media-amazon.com/images/I/31zJRfyiO3L._SL160_.jpg)