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हेडफोन-गेमिंग से बच्चों के बहरे होने का खतरा

टेक्नोलॉजी विकास एवं उससे जुड़े नये-नये उपकरण आधुनिक जीवनशैली को भले ही बहुत आसान कर दिया हो लेकिन इसके अनियंत्रित उपयोग से भारी परेशानियों का सामना भी करना पड़ सकता है। अक्सर देखा जाता है कि जॉब करने वाले माता-पिता अपना टाइम बचाने एवं सुविधा के लिए बच्चों को छोटी उम्र में ही फोन और हेडफोन का उपयोग करने के लिए देते हैं। लेकिन ये उपकरण उनके बच्चों के लिए कितने नुकसानदायक एवं खतरनाक हैं इसका खुलासा नये-नये अध्ययनों से सामने आ रहा है, जो चिन्ताजनक एवं डरावना है। ऐसे ही एक अध्ययन में यह आशंका जतायी गयी है कि लगातार कानों पर मोबाइल व ईयरफोन लगाने का बच्चों की श्रवण शक्ति पर नकारात्मक असर पड़ रहा है और वे बधिरता से ग्रस्त होते जा रहे हैं। रिपोर्ट की मानें तो पिछले कई महीनों में बच्चों के कानों में दर्द, सुनने में परेशानी, बधिरता और संक्रमण की शिकायतें बहुत ज्यादा आ रही हैं। वहीं डॉक्टर्स का कहना है कि इन उपकरणों के उपयोग से कानों पर काफी ज्यादा जोर पड़ता है और घंटो तक तेज आवाज सुनने से सुनने की क्षमता कमजोर पड़ जाती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय भी इस खतरे की पुष्टि कर रहे हैं। इसीलिए अभिभावकों को सर्तक किया गया है कि बहुत अधिक स्क्रीन टाइम और गैजेट्स की तेज ध्वनि से बच्चों की रक्षा करें। दरअसल, डब्ल्यूएचओ की दक्षिण पूर्व एशिया की निदेशक साइमा वाजेद ने कहा है कि दुनिया में 1.40 अरब लोग इस संकट से प्रभावित हुए हैं। जिसमें 40 करोड़ लोग दक्षिण पूर्व एशिया में बधिरता से ग्रस्त हो रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2050 तक 1.6 अरब लोग बधिरता से प्रभावित हो सकते हैं। जिनमें अधिकांश लोग मध्यम व कम आय वर्ग के होंगे।

यूं तो साठ साल के बाद सुनने की क्षमता प्राकृतिक रूप से कम हो जाती है, लेकिन हाल के वर्षों में लगातार कानों में ईयरफोन आदि लगाने से यह संकट बच्चों एवं युवाओं में बढ़ता जा रहा है। खासकर वे बच्चे एवं युवा जो लगातार लेपटॉप व मोबाइल पर गेमिंग व अन्य कार्यक्रम तेज आवाज में घंटों सुनते रहते हैं। पहले कम सुनने की समस्या दिखायी देती है और कालांतर में यह समस्या बहरेपन में तब्दील हो जाती है। दरअसल, कानों पर तकनीकी शोर का इतना अधिक दबाव बढ़ गया है कि बच्चे एवं युवा अपनी सुनने की प्राकृतिक क्षमता खोने लगे हैं। जो एक विश्वव्यापी आसन्न गंभीर संकट को ही दर्शाता है, इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो बहरों की दुनिया बनने से रोकना मुश्किल हो जायेगा।

विज्ञान के अनुसार, हमारे कानों के सुनने की क्षमता निर्धारित है। हमारे कानों के लिए 40 से 60 डेसिबल सुनने की क्षमता निर्धारित की है जो सही है, लेकिन इससे ऊपर यानी 85 से 100 डेसिबल साउंड कानों के लिए खतरनाक है। यूं तो बहरापन उम्र के साथ आता है लेकिन पिछले कुछ दशकों में कम सुनाई देने यानी बहरेपन की समस्या तेजी से युवाओं और बच्चों को अपना शिकार बना रही है और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इस पर चिंता जाहिर की है। युवाओं एवं बच्चों में बढ़ते मोबाइल एवं ईयरफोन के प्रचलन एवं तेज आवाज में गाने एवं संगीत सुनने की लत से पिछले कुछ सालों में बहरेपन का संकट बढ़ता जा रहा है। आंकड़ों की बात करें तो पिछले दशकों में दुनिया में 3.4 करोड़ से अधिक बच्चों में कम सुनाई देने की क्षमता के केस सामने आए हैं।

यह दुनिया की एक भयावह एवं चुनौतीपूर्ण समस्या की ओर बढ़ने का संकेत है, एक पूरी पीढ़ी के बहरे होने की चुनौती को खड़ा कर रहा है। विडंबना यह है कि जीवनशैली में नित-नये आ रहे बदलावों तथा शिक्षा कार्यों के लिये ऑनलाइन रहने की दलील ने बच्चों को मोबाइल-लेपटॉप-ईयरफोन का आदी बना दिया है।  तेज आवाज का संगीत व तरह-तरह के कंसर्ट बच्चों को लुभाते हैं। ऐसे में अभिभावक बच्चों को इस संकट की भयावहता से अवगत कराएं तथा समय-समय पर उनके कानों का चेकअप कराते रहें। कोशिश हो रचनात्मक तरीके से उनकी इस आदत को बदलने का प्रयास किया जाए।

हेल्थ एक्सपर्ट का कहना है कि सामान्य तौर पर 60 साल के बाद लोगों में सुनने की क्षमता कम होने लगती है। लेकिन जिस तरह की जीवनशैली आज के युवा एवं बच्चे अपना रहे हैं, उससे कम उम्र में ही ये क्षमता कमजोर हो रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ईयरफोन और हैडफोन को बताया जा रहा है। नए जमाने में हैडफोन और ईयरफोन भले ही काफी उपयोगी हों लेकिन इनका ज्यादा इस्तेमाल करने से युवा एवं बच्चें बहरेपन के रिस्क में आ रहे हैं। माना जा रहा है कि जितने ज्यादा डेसिमल में हेडफोन यूज किया जाएगा, उतना ही ज्यादा कानों को नुकसान होगा। जिस तरह से आजकल के युवा एवं बच्चे हैडफोन और ईयरफोन का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे उनके कान तेज आवाज के संपर्क में लगातार रहते हैं और इससे कान की नाजुक मांसपेशियों को नुकसान पहुंच रहा है एवं बेहरेेपन की समस्या उग्र से उग्रतर होती जा रही है।

दरअसल, सबसे बड़ा संकट यह है कि आज मोबाइल फोन, लेपटोप, हैडफोन और ईयरफोन एक आवश्यक बुराई बन चुका है। आज नई पीढ़ी इस संबंध में मां-बाप एवं शिक्षकों की नसीहतों एवं हिदायतों पर ध्यान कम ही देती है। ऐसे में स्कूल-कालेजों में शिक्षकों व सामाजिक अभियानों से जुड़े लोगों को जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार भी इसके लिये जागरूक करें। विभिन्न सूचना माध्यमों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से बच्चों को जागरूक करने के लिये मुहिम चलाने का कुछ लाभ जरूर मिल सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि हरदम कानों पर मोबाइल व ईयरफोन तथा बड्स आदि लगाना स्टेटस सिंबल बन गया। व्यक्ति खुद व्यस्त होने का दिखावा करता रहता है।

वैसे भी महानगरों व भीड़भाड़ वाले इलाकों में ध्वनि प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है। जिसके खतरों को लेकर समाज में जागरूकता के प्रचार-प्रसार की सख्त जरूरत होती है। बच्चों को लेकर अभिभावकों व शिक्षकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है, क्योंकि उनके लंबे जीवन पर बहरेपन का संकट मंडराने का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। आधुनिक सुनने के उपकरणों एवं तेज़ आवाज़ से कान की नसों और हियरिंग सेल्स को नुकसान हो सकता है, जिससे बहरापन भी हो सकता है। एक समय था जब कम  सुनाई देने की शिक़ायत बुजुर्ग किया करते थे, लेकिन बदलती जीवनशैली के कारण कम उम्र में भी लोगों में यह समस्या होने लगी है। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से सुनने की क्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है।

मानव जीवन में सुनने की क्षमता का अक्षुण्ण रहना जीवन की परिपूर्णता का परिचायक है। इस सचाई को नहीं नकारा जा सकता कि श्रवण यानी सुनने की क्षमता जीवन को नया आकार देने, मानसिक दरिद्रता का निवारण करने तथा ऊंचे ध्येय की पूर्ति हेतु आगे बढ़ने की सही चाबी है। जैसे दवा रोग नाशक होती है, पर गलत दवा के सेवन से रोग घटने की अपेक्षा अधिक बढ़ जाता है, वैसे ही गलत जीवनशैली, गलत तरीको से जीने, गलत तरीके से सुनने की क्षमता का उपयोग करने, अनियंत्रित शोर-शराबे को सुनने से जीवन में विकृतियां एवं परेशानियां घुस जाती है और अनेक तरह के श्रवण रोगों का हमला होने लगता है। इसलिये सुनने की क्षमता का सम्यक् उपयोग जरूरी है। देखना और सुनना- ये दोनों ही जीवन-विकास एवं ज्ञान-वृद्धि के माध्यम है। पर सुनना अधिक शक्तिशाली साधन है, क्योंकि आंखों में जो दृश्य प्रतिबिम्बित होते हैं, वे तात्कालिक होते हैं। श्रवण-पथ से ही हम ज्ञान के साथ-साथ दीर्घकालिक अनुभवों को आत्मसात कर सकते हैं। इसलिये श्रवण-पथ या सुनने की क्षमता पर हो रहे हमलों को हम गंभीरता से ले अन्यथा सुनने की पंगुता हमारे जीवन का अभिशाप बन सकती है।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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