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जब कछुए नाचते हैं, तो धरती मुस्कुराती है ,वर्ल्ड टर्टल्स डे इस साल मना रहा है अपनी 25वीं वर्षगांठ

दुनिया भर में 23 मई को मनाया जाता है वर्ल्ड टर्टल्स डे यानी विश्व कछुआ दिवस, ये केवल रेंगने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि प्रकृति की मौन शक्ति हैं, जो तटीय जीवन, समुद्री इकोसिस्टम और पारंपरिक लोक मान्यताओं में गहरे बसे हैं। इस वर्ष अपनी 25वीं वर्षगांठ मना रहा है। इस साल की थीम — “डांसिंग टर्टल्स रॉक! ” — एक उत्सव है इन अद्भुत जीवों के लिए, जिन्होंने करोड़ों सालों से धरती पर जीवन को संतुलित रखा है।

धीमी चाल, मगर गहरी पहचान की पुरानी जीवंत विरासत

कछुए 20 करोड़ साल से धरती पर हैं — यानी ये डायनासोर से भी पुराने हैं। लेकिन आज, इनका अस्तित्व खतरे में है। तेजी से होती शहरीकरण, समुद्री प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा, अवैध शिकार और जलवायु परिवर्तन ने इन शांत जीवों को “लुप्तप्राय” बना दिया है। दुनिया के कई हिस्सों में इनकी संख्या तेजी से घट रही है, और भारत भी इससे अछूता नहीं है।

  • ओडिशा के तट पर जन्म लेती एक उम्मीद
    भारत के पूर्वी तट पर स्थित ओडिशा का गहिरमाथा समुद्री तट, हर साल एक अनोखे प्राकृतिक चमत्कार का साक्षी बनता है — जब लाखों की संख्या में ओलिव रिडली कछुए अंडे देने तट पर आते हैं। ये वही कछुए हैं, जिन्हें आईयूसीएन (रेड डाटा बुक) में “वल्नरेबल” घोषित किया गया है। लेकिन इसी धरती पर एक नया प्रयास हो रहा है, जो इन कछुओं को सुरक्षित भविष्य देने की दिशा में मील का पत्थर बन रहा है।
  • धामरा पोर्ट: जहां विकास के साथ होता है संरक्षण

ओडिशा का धामरा पोर्ट, जो अदाणी समूह द्वारा संचालित है, एक मिसाल बन चुका है — जहां औद्योगिक तरक्की के साथ-साथ प्राकृतिक जैव-विविधता का संरक्षण भी प्राथमिकता पर है। इस पोर्ट ने ओलिव रिडली कछुओं के संरक्षण के लिए कई इनोवेशन किए हैं। यहां की लाइटिंग व्यवस्था विशेष रूप से “डार्क स्काई फ्रेंडली” है, ताकि समुद्र की ओर कोई रोशनी न जाए और नवजात कछुए भ्रमित न हों। यह पूरा सिस्टम आईयूसीएन के विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। पोर्ट की ड्रेजिंग प्रक्रिया भी पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल है। अत्याधुनिक मशीनें जैसे टीएसएचडी (ट्रेलर सक्शन हॉपर ड्रेजर) का उपयोग किया जाता है, जिससे समुद्री जीवन पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। कछुओं के प्रवासन काल में पोर्ट वन विभाग को समुद्री ट्रॉलर उपलब्ध कराता है, ताकि गश्त बढ़े और शिकार पर लगाम लग सके। यहां तक कि पोर्ट का नेविगेशन चैनल भी कछुओं की भीड़ वाले क्षेत्र से दूर तय किया गया है।

मछुआरा समुदायों को जोड़ता एक सतत प्रयास

धामरा पोर्ट के संरक्षण प्रयास केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं हैं। स्थानीय मछुआरा समुदाय को इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है। उन्हें मैंग्रोव और कछुआ संरक्षण पर जागरूक किया गया है, ताकि वे न केवल कानून से, बल्कि अपने दिल से इन जीवों की रक्षा करें। गहिरमाथा क्षेत्र में मछली पकड़ने वाली नावों के प्रवेश को रोकने के लिए समुद्र में बॉय मार्किंग की गई है। यह एक ऐसा उदाहरण है, जहां विकास, संरक्षण और समुदाय एक साथ चलते हैं। संरक्षण को लंबे समय तक चलाने के लिए धामरा पोर्ट ने एक नई योजना का प्रस्ताव रखा है — ओलिव रिडली और खाड़ी मगरमच्छ अनुसंधान केंद्र, जो ओडिशा सरकार के सहयोग से स्थापित किया जा सकता है।

यह केंद्र ना केवल वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देगा, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को भी इस संवेदनशील समुद्री जीवन से जोड़ने का माध्यम बनेगा। साल 2024-25 में गहिरमाथा में करीब 6.04 लाख ओलिव रिडली कछुओं के घोंसले रिकॉर्ड किए गए। यह आंकड़ा न केवल प्रकृति की वापसी का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जब उद्योग और पर्यावरण मिलकर चलें, तो दोनों के हित संभव हैं। विश्व कछुआ दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि एक आह्वान है सोच बदलने का। यह हमें बताता है कि विकास का असली अर्थ तभी है जब उसमें प्रकृति की साझेदारी हो। कछुए हमें सिखाते हैं — धीरे चलो, मगर गहराई से चलो। उनकी यात्रा लंबी है, लेकिन अब उनकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। इस बार, जब कछुए नाचें, तो हम भी नाचें — इस धरती के लिए, इस जीवन के लिए, और उन अनमोल प्रजातियों के लिए जिनके बिना प्रकृति अधूरी है।

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