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दिलों को ही नहीं, विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ता है संगीत

-विश्व संगीत दिवस- 21 जून 2025-

संगीत हर इंसान के न सिर्फ शारीरिक, बल्कि भावात्मक एवं मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। यह ईश्वर का मानव को अनमोल उपहार है। क्योंकि एक सुर, जो जोड़ता है दुनिया को बिना बोले, धुनों से रचता है मनुष्य मन की कहानी। संगीत न केवल शांति, सुकून एवं आनन्द का सशक्त माध्यम है बल्कि  यह हमारी भावनाओं को जुबान देता है, यह तनाव कम करता एवं अनेक बीमारियों से मुक्ति भी देता है। संगीत सुनने से मानसिक शांति का अहसास होता है, संगीत दुनिया में हर मर्ज की दवा मानी जाती है। यह दुखी से दुखी इंसान को भी खुश कर देता है, संगीत का जादू एक मरते हुए इंसान को भी खुशी के लम्हे दे जाता है। अलग-अलग संस्कृतियों को जोड़ने में संगीत सबसे असरदार माध्यम है।

संगीत को दुनिया की सबसे आसान और बेहतरीन भाषा मानी जाती है। संगीत की इन्हीं विलक्षण एवं अद्भुत विशेषताओं के कारण ही 21 जून को पूरे विश्व में संगीत दिवस मनाया जाता है। हर साल विश्व संगीत दिवस एक खास थीम के साथ मनाया जाता है। इस वर्ष 2025 की थीम है ‘सद्भाव के माध्यम से उपचार’, जो संगीत की एकजुटता और उत्थान की क्षमता पर जोर देता है। विश्व संगीत दिवस को मनाने का उद्देश्य संगीत विशेषज्ञ व विश्व के संगीत कलाकारों को एक अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर लाकर विश्व एकता, सद्भाव, सौहार्द तथा विश्व शान्ति का सन्देश सारी दुनिया को देना भी है।

संगीत दिवस को ‘फेटे डी ला म्यूजिक’ के नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ है ‘संगीत उत्सव’। विश्व संगीत दिवस 110 देशों में ही मनाया जाता है जिनमें जर्मनी, इटली, मिस्र, सीरिया, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, वियतनाम, कांगो, कैमरून, मॉरीशस, फिजी, कोलम्बिया, चिली, नेपाल, और जापान आदि हैं। विश्व में सदा ही शांति बरकरार रखने के लिए ही फ्रांस में पहली बार 21 जून 1982 में प्रथम विश्व संगीत दिवस मनाया गया था, जिसका श्रेय तात्कालिक सांस्कृतिक मंत्री श्री जैक लो को जाता है। इससे पूर्व अमेरिका के एक संगीतकार योएल कोहेन ने वर्ष 1976 में इस दिवस को मनाने की बात की थी। इस त्यौहार के अलग-अलग देशों में अलग-अलग नाम हैं, उदाहरण के लिए फ्रांस में ‘ला फेते डे ला म्यूजिक’, यूके में ‘मेक म्यूजिक डे’, इटली में ‘फेस्टा डेला म्यूजिका’ या पोलैंड में ‘स्विएटो मुजिकी’। भारत में संगीत जीवन का अभिन्न हिस्सा है, शादी में ढोलक-शहनाई, भजन-मंडली में ढोल-मंजीरा, शास्त्रीय संगीत में तानपूरा, तबला, सरोद, सारंगी का हम सब भरपूर आनंद उठाते हैं। बचपन में संपेरों द्वारा बीन बजाते ही लहराते हुए सांप का खेल भी हमने खूब देखा है। ये संगीत का जादुई प्रभाव ही है कि नवजात शिशु भी झुनझुने की आवाज सुन किलकारी भरने लगता है। श्रीकृष्ण की बांसुरी की मीठी ध्वनि को सुन गोपियों का आकर्षित हो खिंचे चले आना-ये सारे किस्से संगीत की ही महिमा का बखान करते हैं।

विश्व संगीत दिवस पर सभी प्रकार के संगीत का जश्न मनाया जाता है, जिसमें फंक, जैज़, रॉक, शास्त्रीय, लोक, टेक्नो, ब्लूज़ आदि शामिल हैं। भारतीय संगीत प्राचीन काल से भारत मे सुना और विकसित होता संगीत है। शास्त्रीय संगीत आदि काल से है। संगीत के आदि स्रोत भगवान शंकर हैं। उनके डमरू से तथा श्रीकृष्ण की बांसुरी से संगीत के सुर निकले हैं। किंवदन्ति है कि संगीत की रचना ब्रह्माजी ने की थी। ब्रह्माजी ने ज्ञान की देवी सरस्वती को संगीत की सीख दी। मां सरस्वती के कर-कमलों में वीणा की उपस्थिति संगीत की महानता की कहानी स्वयं ही कह जाती है। देवी सरस्वती ने नारदजी को, नारदजी ने महर्षि भरत को तथा महर्षि भरत ने नाट्यकला के माध्यम से जन सामान्य में संगीत को पहुंचाया।

सूरदास की पदावली, तुलसीदास की चौपाई, मीरा के भजन, कबीर के दोहे, संत नामदेव की सिखानियाँ, संगीत सम्राट तानसेन, बैजु बाबरा, कवि रहीम, संत रैदास संगीत को सदैव जीवित रखेंगे। इस संगीत का प्रारंभ वैदिक काल से भी पूर्व का है। इस संगीत का मूल स्रोत वेदों को माना जाता है। पंडित शारंगदेव कृत ‘संगीत रत्नाकर’ ग्रंथ मे भारतीय संगीत की परिभाषा ‘गीतम, वादयम् तथा नृत्यं त्रयम संगीतमुच्यते’ कहा गया है। गायन, वाद्य वादन एवम् नृत्य; तीनों कलाओं का समावेश संगीत शब्द में माना गया है। तीनो स्वतंत्र कला होते हुए भी एक दूसरे की पूरक है।

भारतीय संगीत के दो प्रकार प्रचलित है; प्रथम कर्नाटक संगीत, जो दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रचलित है और दूसरा हिन्दुस्तानी संगीत शेष भारत में लोकप्रिय है। भारतवर्ष की सारी सभ्यताओं में संगीत का बड़ा महत्व रहा है। धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं में संगीत का प्रचलन प्राचीन काल से रहा है। इस रूप में, संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा मानी जाती है। वैदिक काल में आध्यात्मिक संगीत को मार्गी तथा लोक संगीत को ‘देशी’ कहा जाता था। कालांतर में यही शास्त्रीय और लोक संगीत के रूप में दिखता है। भारत में संगीत मुगल बादशाहों की छत्रछाया में और कर्नाटक संगीत दक्षिण के मन्दिरों में सर्वाधिक विकसित हुआ। इसी कारण दक्षिण भारतीय कृतियों में भक्ति रस अधिक मिलता है और हिन्दुस्तानी संगीत में श्रृंगार रस। संगीत अशांति के अंधेरों में शांति का उजाला है। यह अंतर्मन की संवेदनाओं में स्वरों का ओज है।

संगीत मनोरंजन का जरिया ही नहीं, बल्कि यह देशों-दुनिया की संस्कृति को भी समझने में मदद करता है। खुशी हो या फिर गम, संगीत दिल को सुकून देता है। कहते हैं संगीत की कोई भाषा नहीं होती, यह सरहदों के पार होता है, दिल से निकलकर दिल तक पहुंचता है। संगीत को प्रेम की भाषा भी कहा जाता है। किसी के दिन की शुरूआत संगीत से होती है तो किसी की रात संगीत पर खत्म हो जाती है। संगीत दिल को खुशी देने का काम करता है। संगीत सिर्फ सात सुरों में बंधा नहीं होता। इसे बांधने के लिए विश्व की सीमाएं भी कम पड़ जाती हैं। अगर इसे महसूस करें तो दैनिक जीवन में संगीत ही संगीत भरा है-कोयल की कूक, पानी की कलकल, हवा की सरसराहट, मन्दिर की झंकार, हर जगह संगीत ही तो है, बस जरूरत है तो इसे महसूस करने की। किसी के लिए संगीत का मतलब अपने दिल को शांति देना है तो कोई अपनी खुशी का संगीत के द्वारा इजहार करता है। प्रेमियों के लिए तो संगीत किसी रामबाण या ब्रह्मास्त्र से कम नहीं। संगीत में मूड ठीक करने की अद्भुत ताकत होती है। अच्छा संगीत बेचैनी कम करता है। शोध कहते हैं कि घंटों काम कर रहे व्यक्ति का कुछ देर अच्छा संगीत सुनना उनकी रचनात्मकता व कार्यक्षमता को बढ़ा सकता है।

संगीत को लेकर हुए अध्ययनों में पता चला है कि संगीत शरीर में बदलाव लाता है, जो स्वास्थ्य में सुधार एवं शांति स्थापित करता है। इसके अलावा जो मरीज अवसाद और निराशा के शिकार होते हैं, उन्हें इससे बाहर निकालने के लिए संगीत थेरेपी दी जाती है। संगीत मन और शरीर दोनों को ही आराम पहुंचाता है। संगीत अमूर्त कला है पर उसमें निहित शांति, सौन्दर्य एवं संतुलन की अनुभूति विरल है। संगीत, ध्वनि का ऐसा लयबद्ध व्यवहार है जो हमें अपने आपसे जोड़ने में सहायक सिद्ध होता है। भारतीय संस्कृति में भी विभिन्न वाद्य-यंत्रों एवं उनसे उत्पन्न ध्वनि, राग-रागिनियों का विशिष्ट महत्त्व है। यूं तो सृष्टि के कण-कण में संगीत है फिर चाहे यह बहती हुई नदिया की धारा हो या किनारे से टकराकर लौटती समंदर की प्रचंड लहरें। बहती हुई हवा और उस पर झूमते-लहराते पत्ते भी हृदय के इसी तरंगित साज को अभिव्यक्ति देते प्रतीत होते हैं। कुल मिलाकर संगीत हमारी आत्मा में इस तरह रच-बस चुका है कि इसके बिना जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। बहुत से लोगों को किसी दर्द को कम करने या फिर दर्द से जूझने के लिए भी संगीत सहायक साबित होता है। इससे मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक दर्द भी कम होता महसूस होता है। आपकी कोमल भावनाओं की सहज, सुन्दर अभिव्यक्ति है, संगीत। इन्हीं पलों को उल्लास के साथ जीने के लिए प्रेरणा देता है विश्व संगीत दिवस।

ललित गर्ग
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