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नशे का व्यापार मानवता का दुश्मन

-26 जून विश्व नशीली दवाओं का निषेध दिवस-

मनुष्य नशीले पदार्थों का सेवन कई युगों से करता चला आ रहा है। नशीले पदार्थ हमेशा उसके लिये आनंद की वस्तु रहे है। पर अब जबकि हम इक्कीसवी शताब्दी में हैं ये नशीले  पदार्थ आनंद की बजाय बर्बादी के वस्तु बन गये हैं। आज न केवल नशीले पदार्थों के प्रकार बढ़े हैं, बल्कि उनका सेवन करने वालों की संख्या भी बढ़ी है। हमारे ही देश  में पिछले कुछ दशकों में नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों की संख्या में जबर्दस्त वृद्धि हुई है। हमारे यहां प्रतिदिन लाखों गैलन शराब पी ली जाती है जिस पर अरबों रुपया खर्च होता है। इसके अलावा लोग भांग, गांजा, चरस, अफीम, तम्बाखू सहित कई प्रकार के नशीले दवाएं सिरप टेबलेट आदि नशीले पदार्थों के सेवन से देश, परिवार और स्वयं के बर्बादी का कारण बन जाते हैं। नशे की प्रवृत्ति से स्वास्थ्य में गिरावट, कार्य कुशलता में कमी और अनेक मानसिक विकृतियां उत्पन्न होने से सारा समाज समस्याग्रस्त है।

कुछ वर्षो पूर्व तक शराब, भांग, गांजा, तंबाखू, अफीम, चरस ही नशीले पदार्थों के रूप में जाने जाते थे। लेकिन अब नशे की दुनिया में कई दूसरे ही नाम चलन में है। और वे नशीले पदार्थों का प्रभाव कहीं ज्यादा घातक है। नए नशीले पदार्थों में माफीन, हेरोईन, हशीश, स्नैक,एल. एस. डी., मैण्ड्रेक्स ब्राउन सुगर कई प्रकार के सिरप और टेबलेट आदि नाम काफी प्रचलित हो चुके है। जहां इनकी कीमत बहुत ज्यादा है, वहीं इनका नशा गांजा, भांग, अफीम जैसे पुराने नशीले पदार्थों से कई गुना ज्यादा है।

 नशे की ओर आदमी ज्यादातर तीन कारणों से बढ़ता देखा गया है।

(1) मनुष्य नशे की और तब बढ़ता है जब वह परेशान व समस्याग्रस्त होता है। नशा आदमी को कुछ क्षणों के लिये वास्तविक जिंदगी की समस्याओं से दूर कल्पना लोक में ले जाता है। आदतन नशा करने वालों में ऐसे लोगों की संख्या सबसे ज्यादा देखने को मिलती है,

(2) कई लोग नशे को शौक के रूप में अपनाते देखे गये हैं लेकिन बाद में नशे के गुलाम हो जाते हैं। एक बार नशे का चस्का लग जाने के बाद इससे छुटकारा पाना असंभव नहीं तो बहुत कठिन  जरुर है।

(3) कुछ मात्रा में लोग सफलता  पाने के लिए नशे को अपनाते हैं। हालांकि यह जरूर कुछ अटपटा लगता है. सुनने में, लेकिप अब यह बात बिलकुल स्पष्ट हो गई है कि ओलंपिक सहित दूसरी  अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल स्पर्धाओं  में खिलाड़ियों द्वारा नशीले पदार्थो का सेवन किया जाता है। परीक्षाओं के समय विद्यार्थीगण भी ऐसी कई घातक दवाओं का  घड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। 

आज पूरी दुनिया में मुख्यतः  नशीले पदार्थों के बाजार के रूप में और उनके उत्पादक देशों के रुप में पाकिस्तान बंगलादेश अफगानिस्तान और  मैक्सिको आदि देश बदनाम हो चुके हैं। ये  देश इस समय ब्राउन सुगर, हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों के सबसे बड़े उत्पादक हैं। भारत में अब इन नशीले पदार्थों की खपत काफी बढ़ गई है। शराब से राज्यों को होने वाली करोड़ों रुपये की आबकारी आय का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर चढ़ रहा है। इसके अलावा अफीम, गांजा, ब्राउन सुगर का उपयोग भी खतरनाक गति से बढ़ा है।

आज देश में शांति और व्यवस्था की काफी बढ़चढ़ कर बातें की जाती हैं तथा योजनायें भी बनाई जाती है। लेकिन इसके मूल कारण को समझने की जरा भी प्रयास नहीं किया जाता। रोग नष्ट करने के लिये उनको जड़ से उखाड़ कर फेंकना होगा, केवल ऊपर से पत्तों को उखाड़ देने से कोई लाभ नहीं होता। नशीले पदार्थों का बढ़ता उपयोग राष्ट्रीय चिंता का विषय है। नशा बंदी के लिये कुछ”वर्ष पूर्व बनाई गई कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं। मात्र कानून बना देने से ही इस बुराई का विनाश नहीं किया जा सकता। इसके लिये एक प्रबल जनमत जागृत करने की महती आवश्यकता है।

जहां तक नये नशीले पदार्थों का सवाल है ये देश में तस्करी के द्वारा पहुंचते हैं अतः सरकार को इस पर कठोरता से रोक लगाना चाहिये। और नशे का व्यापार करने वालो के लिये कानून में मौत की सजा का प्रावधान होना चाहिये। हमारे देश में शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री पर लगे टैक्सों से सरकार को करोड़ों रुपयों की आय प्रतिवर्ष होती है। अतः सरकारें भी अपने राज्यों में करोड़ों रुपयों के लालच में इस समस्या पर काबू पाने के लिये इमानदार प्रयास नहीं करती अगर देश को नशे के क्रूर पंजों से बचाना है तो करों के रूप में मिलने वाली अपार धनराशि का त्याग करना ही पडेगा। आज जैसे बिहार राज्य ने अपने पूरे राज्य भर में पूर्ण रूप से नशा बंदी लागू की है वह  प्रशंसनीय कदम है। इससे बहुत कुछ सकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है।

 नशा करने से अपराध पवृत्ति को भी बल मिलता है तथा अनैतिक कार्यों की वृद्धि होती है। अतः सरकार को कठोर नियमों द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर नशा आदि पर कड़े प्रतिबंध शीघ्र लगाने चाहिये नशाबंदी केवल एक नारा बनकर न रह जाये।

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