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विश्वगुरु बनने की नई इबारत लिखता भागवत का उद्बोधन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के शताब्दी वर्ष पर दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित वार्षिक व्याख्यानमाला केवल एक उत्सव मात्र नहीं था, बल्कि यह आयोजन भारत की आत्मा और उसके भविष्य की एक गहन घोषणा थी। संघ सरचालक मोहन भागवत ने इन व्याख्यानों में जिस स्पष्टता और गंभीरता से अपने विचार रखे, उन्होंने संघ की विचारधारा के प्रति व्याप्त भ्रांतियों का निवारण करने के साथ-साथ भारत को विश्वगुरु बनाने की दिशा में एक नया क्षितिज भी उद्घाटित किया। यह आयोजन संघ के सौ वर्ष की साधना का मूल्यांकन ही नहीं, बल्कि आने वाले सौ वर्षों की दिशा का भी उद्घोष था। नई इबारत लिखते हुए भागवत ने स्पष्ट कहा कि संघ की कार्यप्रणाली का सार है,नए मनुष्य का निर्माण।

यह विचार सुनने में सरल लग सकता है, किंतु इसके निहितार्थ अत्यंत गहरे हैं। समाज और राष्ट्र की सारी समस्याओं का मूल व्यक्ति के भीतर छिपा है। इसीलिये देश के सभी वर्गों को एकसूत्र में जोड़ने के संकल्प के साथ संघ आगे बढ़ेगा क्योंकि जब तक व्यक्ति का चरित्र, दृष्टि और आचरण नहीं बदलते, तब तक कोई भी व्यवस्था स्थायी रूप से परिवर्तित नहीं हो सकती। संघ व्यक्ति-निर्माण के माध्यम से समाज और राष्ट्र को बदलने की दीर्घकालिक साधना कर रहा है। यही कारण है कि संघ के कार्य का परिणाम केवल शाखाओं या कार्यक्रमों में नहीं मापा जा सकता, बल्कि उस अदृश्य लेकिन ठोस नैतिक शक्ति में देखा जा सकता है, जो धीरे-धीरे समाज की दिशा बदल रही है।

हिंदुत्व को लेकर जो भ्रांतियाँ फैलाई जाती रही हैं, उन्हें भी भागवत ने तार्किक ढंग से दूर किया। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व किसी संकीर्ण परिभाषा का नाम नहीं है। यह कोई धर्म विशेष की पूजा-पद्धति या संप्रदाय नहीं है। हिंदुत्व भारतीय जीवन दृष्टि है, वह व्यापक सांस्कृतिक धारा है, जिसमें करुणा, समरसता, सेवा, अहिंसा, सत्य और आत्मानुभूति का सम्मिलन है। हिंदुत्व सबको जोड़ता है, किसी को अलग नहीं करता। यह भारत की आत्मा है और इसी आत्मा के बल पर भारत को विश्वगुरु बनने की पात्रता प्राप्त हो सकती है। इस स्पष्ट व्याख्या ने उस संदेह को भी दूर किया कि संघ का हिंदुत्व राजनीतिक या सत्ता प्राप्ति का साधन है। वास्तव में यह संपूर्ण मानवता को एक सूत्र में बांधने वाली दृष्टि है, जिसमें भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है।

दूसरे दिन के वक्तव्य में भागवत ने और गहराई से विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने पंचकर्म की चर्चा करते हुए कहा कि जैसे आयुर्वेद में पंचकर्म शरीर की शुद्धि का साधन है, वैसे ही समाज की शुद्धि और पुनर्निर्माण के लिए भी पंचकर्म आवश्यक है। उन्होंने पांच आयाम बताए-चरित्र निर्माण, संगठन निर्माण, समरसता, गरीब का उत्थान और आध्यात्मिक जागरण। यह पांचों पहलू किसी भी समाज के स्थायी स्वास्थ्य और विकास के आधार हैं। केवल राजनीतिक सुधार या आर्थिक प्रगति से राष्ट्र महान नहीं बनता, बल्कि तब बनता है जब व्यक्ति का चरित्र शुद्ध हो, समाज संगठित हो, उसमें समरसता हो, कमजोर वर्ग को उत्थान मिले और राष्ट्र का जीवन उच्च आध्यात्मिक मूल्यों से संपन्न हो।

विशेष रूप से गरीब आदमी के उत्थान पर भागवत का जोर उल्लेखनीय था। उन्होंने कहा कि भारत तभी सशक्त होगा जब समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मान और अवसर पहुंचे। यह विचार महात्मा गांधी के ‘अंत्योदय’, विनोबा भावे के ‘सर्वोदय’ और दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानववाद’ की पुनर्स्मृति कराता है। आधुनिक भारत की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास के लाभ समाज के सभी तबकों तक समान रूप से नहीं पहुंचते। अमीर-गरीब की खाई बढ़ती जा रही है। यदि इस खाई को नहीं भरा गया, तो राष्ट्र की प्रगति अधूरी रह जाएगी। भागवत का दृष्टिकोण यह है कि राष्ट्र तभी महान बन सकता है जब उसका सबसे कमजोर नागरिक भी गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जी सके। धर्मों की एकता पर उनका दृष्टिकोण भी उतना ही महत्वपूर्ण था। भारत का इतिहास यही बताता है कि यहां विविधता में एकता की परंपरा रही है। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन-सभी धर्म इस भूमि पर फले-फूले हैं और सभी का मूल संदेश करुणा, सेवा और मानवता रहा है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब धर्म को सत्ता की राजनीति से जोड़ा जाता है। भागवत का कहना था कि यदि हम धर्मों के मूल्यों को देखें तो उनमें कोई टकराव नहीं है। सबका आधार प्रेम, सत्य और सेवा है। यही साझा आधार भारत को एक ऐसा समाज बनाने में सक्षम है, जो विश्व के लिए अनुकरणीय हो।

भागवत के विचार निश्चित रूप से भारत की सांस्कृतिक परंपरा और संघ की कार्यप्रणाली को नई स्पष्टता देते हैं, लेकिन यहां यह प्रश्न भी उठता है कि इन विचारों को व्यवहार में उतारने की राह कितनी सरल है? समाज की जटिलताओं, जातीय और धार्मिक तनावों, राजनीतिक स्वार्थों और आर्थिक विषमताओं के बीच नया मनुष्य बनाना एक दीर्घकालिक साधना है। आलोचक कहते हैं कि संघ के पास विचार तो हैं, लेकिन उनकी जड़ें अभी तक समाज के सभी वर्गों तक गहराई से नहीं पहुँची हैं। विशेषकर अल्पसंख्यक समुदायों में संघ के प्रति संदेह आज भी विद्यमान है। इसलिए केवल वक्तव्यों से नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी कार्यों से यह भरोसा पैदा करना होगा कि संघ का हिंदुत्व वास्तव में सर्वसमावेशी है। इसी तरह गरीब के उत्थान और धर्मों की एकता की बातें विचारणीय हैं, किंतु यह भी देखना होगा कि क्या संघ और उससे जुड़े संगठन इस दिशा में ठोस योजनाएं और परिणाम दे पा रहे हैं? आलोचक यह प्रश्न उठाते हैं कि विकास की मुख्यधारा में गरीबों की स्थिति सुधारने में सामाजिक संगठनों से अधिक भूमिका सरकार की रही है। अतः यदि संघ इन बिंदुओं को अपनी कार्ययोजना का मूल बनाए, तो उसे केवल नैतिक आह्वान से आगे बढ़कर व्यावहारिक नीतियां और कार्यक्रम तैयार करने होंगे। तभी यह दृष्टि प्रभावी सिद्ध होगी और भारत सचमुच उस दिशा में बढ़ सकेगा, जिसकी परिकल्पना व्याख्यानमाला में की गई।

आज की वैश्विक परिस्थितियों पर दृष्टि डालें तो भागवत के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। दुनिया हिंसा, आतंकवाद, युद्ध और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ से त्रस्त है। पर्यावरण संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जा रहा है। मानसिक तनाव और आत्मकेंद्रित जीवन-शैली ने मानव को भीतर से खोखला कर दिया है। इन परिस्थितियों में भारत ही वह देश है, जो एक वैकल्पिक जीवन-दर्शन दे सकता है। भारत के पास भौतिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिक समृद्धि की धरोहर है। यही धरोहर भारत को विश्वगुरु बनने की पात्रता प्रदान करती है। संघ की शताब्दी वर्ष की यह व्याख्यानमाला केवल संघ के स्वयंसेवकों के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व के लिए एक संदेश है। यह संदेश है-नए मनुष्य का निर्माण करना, गरीब को उठाना, धर्मों को जोड़ना, समाज में समरसता स्थापित करना और हिंदुत्व की व्यापक जीवन दृष्टि के आधार पर विश्व को दिशा देना। यह केवल भाषण नहीं, बल्कि एक संकल्प है। यदि भारत को सचमुच विश्वगुरु बनना है, तो यह संकल्प पूरे समाज का होना चाहिए।

संघ को लेकर लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उसकी विचारधारा संकीर्ण है, वह केवल बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें अल्पसंख्यकों के लिए कोई स्थान नहीं है। भागवत के इन वक्तव्यों ने यह स्पष्ट कर दिया कि संघ का दृष्टिकोण न तो संकीर्ण है और न ही बहिष्कृत करने वाला। संघ का हिंदुत्व सर्वसमावेशी है, जिसमें सभी धर्म और सभी आस्थाएं स्थान पा सकती हैं। इसका उद्देश्य सत्ता की राजनीति नहीं, बल्कि समाज का नैतिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण है। संघ की शताब्दी का यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि आज भारत का भविष्य एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है।

एक ओर आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियां और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा है, तो दूसरी ओर आंतरिक चुनौतियां भी हैं-सामाजिक असमानता, जातीय तनाव, धार्मिक विद्वेष और मूल्यहीन राजनीति। इन चुनौतियों का समाधान केवल बाहरी सुधारों से नहीं, बल्कि भीतर से परिवर्तन लाने से होगा। यही संघ की कार्यप्रणाली है और यही भागवत का संदेश है। नये क्षितिज की ओर व्याख्यानमाला एक निष्कर्ष की ओर ही नहीं, बल्कि एक प्रश्न की ओर भी ले जाती है, क्या हम भारत को केवल भौतिक अर्थों में शक्तिशाली बनाना चाहते हैं या उसे वास्तव में विश्वगुरु बनाना चाहते हैं? यदि उत्तर दूसरा है, तो हमें भागवत के सन्देश को क्रियान्विति का धरातल देना ही होगा। दुनिया के लिये अपनेपन का नजरिया विकसित करना होगा, सौदे का नहीं।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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